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"अब मोटापा नहीं, युवा और पतले लोग भी दिल के दौरे की चपेट में"

अस्पताल की इमरजेंसी में अब 20-30 के युवा भी पहुंच रहे

मुनमनु, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : 29 सितंबर को विश्व हृदय दिवस के अवसर पर हृदय रोग विशेषज्ञों ने यह स्पष्ट किया कि हृदय रोग केवल मोटे या अधिक वजन वाले लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि युवा, दुबले-पतले और 'फिट' दिखने वाले लोग भी अब तेजी से इसकी चपेट में आ रहे हैं। इस वर्ष की थीम ‘एक भी धड़कन न छोड़ें’ रही, जो हृदय स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर बल देती है।

छिपे हुए जोखिम कारक भी उतने ही घातक

बीएम बिड़ला हार्ट रिसर्च सेंटर के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. धीमान कहाली ने कहा कि यह एक आम भ्रांति है कि केवल मोटे लोगों को ही दिल की बीमारी होती है। उन्होंने बताया, “कई बार हम ऐसे मरीज देखते हैं जो न तो मोटे हैं और न ही अधिक वजन वाले, फिर भी वे दिल के दौरे जैसी घातक समस्याओं से पीड़ित होते हैं।”
उन्होंने मधुमेह, धूम्रपान, हाई ब्लड प्रेशर, पारिवारिक इतिहास, तनाव और लॉन्ग कोविड जैसे वायरस के प्रभाव को भी बड़े जोखिम कारक बताया।

कम उम्र में बढ़ रहा हृदय रोग का खतरा

फोर्टिस अस्पताल के कार्डियोथोरैसिक वैस्कुलर सर्जरी निदेशक डॉ. के.एम. मंदाना के अनुसार, अब 30 साल से कम उम्र के युवाओं में भी गंभीर हृदय समस्याएं देखी जा रही हैं। "एक समय था जब हृदय रोग को बुजुर्गों की बीमारी माना जाता था, लेकिन अब 20 के दशक के युवा भी आपातकालीन कक्षों में दिल की समस्याओं के साथ पहुँच रहे हैं," उन्होंने कहा।

चेतावनी के संकेतों को न करें नज़रअंदाज़

चार्नक हॉस्पिटल्स के कार्डियोलॉजी निदेशक डॉ. तपोब्रत डे ने कहा कि युवा अक्सर सीने में भारीपन, थकान, या साँस फूलने जैसी समस्याओं को मामूली समझकर टाल देते हैं। उन्होंने बताया कि असामान्य पसीना, चक्कर आना, तेज़ धड़कन जैसे लक्षणों को हल्के में लेना खतरनाक हो सकता है।

आनुवंशिकता और जीवनशैली दोनों जिम्मेदार

डॉक्टरों के अनुसार, आज की जीवनशैली जिसमें लंबा कार्य समय, लगातार तनाव, जंक फूड, व्यायाम की कमी, धूम्रपान, शराब और नशीली दवाओं का सेवन शामिल है हृदय पर बुरा असर डाल रही है। डॉ. मंदाना ने कहा, “आज का युवा शरीर को उसकी चरम सीमा तक धकेल रहा है।”

तनाव बन रहा है युवाओं के लिए 'साइलेंट किलर'

बीएम बिड़ला हार्ट रिसर्च सेंटर के कार्डियोलॉजी निदेशक डॉ. अंजन सियोतिया ने कहा कि तनाव अब किशोरावस्था से ही असर दिखा रहा है। “छात्र छोटी उम्र से ही पढ़ाई, प्रतिस्पर्धा और सामाजिक दबाव के कारण तनाव में जी रहे हैं, जो आगे चलकर हृदय रोग का कारण बन रहा है,” उन्होंने कहा।

कोलकाता में 40 से कम आयु के हृदय रोगी बढ़े

विशेषज्ञों का कहना है कि कोलकाता जैसे महानगरों में अब लगभग एक-चौथाई हृदय रोगी 40 वर्ष से कम आयु के हैं। इन मामलों में कोरोनरी आर्टरी डिजीज, अतालता और कार्डियक अरेस्ट जैसी जानलेवा स्थितियाँ तेजी से सामने आ रही हैं।

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