खास बात यह है कि मकानों के पुनर्निर्माण की योजना में 80 फीसदी खर्च सरकार वहन कर रही है, जबकि शेष 20 फीसदी राशि भवन मालिकों को बिना ब्याज के ऋण के रूप में उपलब्ध कराई जा रही है। इससे स्थानीय लोगों पर आर्थिक बोझ कम हुआ है और पुराने वडनगर को नया स्वरूप मिल रहा है।
करीब 41 हजार की आबादी वाले इस ऐतिहासिक कस्बे में मंदिर, मस्जिद, दरगाह और विभिन्न समुदायों की मौजूदगी के बीच विकास की यह तस्वीर वडनगर की बहुलतावादी सामाजिक संरचना को भी सामने रखती है। Sanmarg की Special Coverage में पढ़िये ....प्रधानमंत्री की जन्मस्थली वडनगर में विरासत और विकास किस तरह साथ-साथ आगे बढ़ रहे हैं।