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मिजोरम में बढ़ता तस्करी का कारोबार, सीमा से बाजार तक फैला नेटवर्क

पूर्वोत्तर में अवैध सामान की आवाजाही का बना एक संवेदनशील क्षेत्र

Krishna Das Parth

आइजोल : म्यांमार से लगती अंतरराष्ट्रीय सीमा के कारण मिजोरम लंबे समय से पूर्वोत्तर में अवैध सामान की आवाजाही का एक संवेदनशील क्षेत्र बना हुआ है। हालिया कार्रवाई में चंफाई जिले के रुआंटलांग इलाके से करीब 17.89 करोड़ रुपये की विदेशी मूल की सुपारी और पोस्ता दाना बरामद होना इस समस्या के पैमाने की ओर फिर ध्यान खींचता है। असम राइफल्स, राजस्व आसूचना निदेशालय (DRI), पुलिस और सीमा शुल्क विभाग की संयुक्त कार्रवाई में 1.25 लाख किलोग्राम से अधिक सुपारी और 25,440 किलोग्राम पोस्ता दाना जब्त किया गया। यह कार्रवाई ऐसे समय हुई है जब पिछले कुछ महीनों में मिजोरम और उससे जुड़े पूर्वोत्तर के मार्गों पर विदेशी मूल की सुपारी, मादक पदार्थ, सिगरेट और अन्य प्रतिबंधित सामान की लगातार बरामदगी हुई है। उपलब्ध सरकारी आंकड़े बताते हैं कि यह केवल छिटपुट तस्करी नहीं, बल्कि सीमा पार से लेकर गोदामों और फिर दूसरे राज्यों के बाजारों तक फैले नेटवर्क का हिस्सा है।

छह महीने में लगातार बड़ी बरामदगी

मई से सितंबर 2026 के बीच केंद्रीय एजेंसियों और सुरक्षा बलों की प्रमुख कार्रवाइयों को देखें तो तस्वीर काफी स्पष्ट होती है। मई में DRI ने मिजोरम और असम में करीब 60,000 किलोग्राम विदेशी मूल की तस्करी की सुपारी जब्त की थी। इन मामलों में पांच लोगों को गिरफ्तार किया गया था। जांच में सुपारी को म्यांमार से मिजोरम सीमा के रास्ते भारत लाए जाने की बात सामने आई। जून में DRI ने पूर्वोत्तर में विदेशी मूल की तस्करी की सिगरेट की करीब 71 लाख स्टिक जब्त कीं। इनकी अनुमानित कीमत करीब 14 करोड़ रुपये थी और चार लोगों को गिरफ्तार किया गया। इनमें मिजोरम के जोखावथर सेक्टर से 45 लाख से अधिक सिगरेट स्टिक की बरामदगी शामिल थी। इसी महीने प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने चंफाई में कथित म्यांमार मूल की सुपारी तस्करी से जुड़े नौ ठिकानों पर छापे मारे। ED की जांच में 970 करोड़ रुपये से अधिक के कथित अपराध से अर्जित धन की पड़ताल सामने आई। एजेंसी के अनुसार, नेटवर्क में म्यांमार से सुपारी लाकर स्थानीय गोदामों में रखने और फिर फर्जी दस्तावेजों के जरिए उसे वैध स्थानीय कारोबार के रूप में दिखाने का आरोप है। जुलाई में असम राइफल्स और राज्य की एजेंसियों ने मिजोरम में चार अलग-अलग अभियानों में 40 टन से अधिक तस्करी की सुपारी, 2.18 किलोग्राम मेथामफेटामाइन और 468 ग्राम हेरोइन जब्त की। इन कार्रवाइयों में सात लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें दो म्यांमार के नागरिक थे। जब्त सामान की कुल अनुमानित कीमत 14.2 करोड़ रुपये से अधिक बताई गई। अगस्त में DRI ने मिजोरम और असम से जुड़े अभियानों में करीब 10 टन विदेशी मूल की सुपारी, 11 टन पोस्ता दाना और 15 किलोग्राम मेथामफेटामाइन जब्त किया। मेथामफेटामाइन मामले में तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया। एजेंसी के अनुसार, नशीले पदार्थ म्यांमार से चंफाई-जोखावथर सेक्टर के रास्ते भारत में लाए गए थे। और सितंबर में, 23-24 सितंबर की कार्रवाई में DRI ने चंफाई के रुआंटलांग के आसपास तीन गोदामों से 1,25,680 किलोग्राम विदेशी मूल की सुपारी और 25,440 किलोग्राम पोस्ता दाना बरामद किया। इसी मामले से जुड़ी एक अन्य कार्रवाई में 16,257 किलोग्राम पोस्ता दाना ले जा रहे दो ट्रकों को पकड़ा गया और चार लोगों को गिरफ्तार किया गया। दोनों अभियानों में कुल जब्ती करीब 20.31 करोड़ रुपये बताई गई है।

सिर्फ सीमा पार करना नहीं, पूरा सप्लाई नेटवर्क

तस्करी का मॉडल केवल सीमा पार से सामान भारत में पहुंचाने तक सीमित नहीं दिखाई देता। ED की जांच के अनुसार, म्यांमार से सूखी सुपारी तियाउ नदी और जोखावथर-चंफाई के आसपास के सीमा क्षेत्रों से भारत लाई जाती थी। इसके बाद स्थानीय सहयोगियों के जरिए उसे गोदामों में जमा किया जाता और फिर असम की ओर भेजा जाता था। जांच एजेंसी ने आरोप लगाया है कि कुछ मामलों में फर्जी ई-वे बिल, नकली दस्तावेज और फर्जी खरीद रिकॉर्ड के जरिए विदेशी सुपारी को स्थानीय कृषि उत्पाद के रूप में दिखाने की कोशिश की गई। इसके बाद माल को मिजोरम से बाहर भेजने के लिए परिवहन नेटवर्क का इस्तेमाल किया जाता था। जुलाई की ED कार्रवाई में भी जांच एजेंसी ने म्यांमार से मिजोरम, फिर असम और आगे पश्चिम बंगाल तथा उत्तर प्रदेश तक फैले नेटवर्क की जांच की बात कही थी। एजेंसी के मुताबिक इस नेटवर्क में आपूर्तिकर्ता, स्थानीय सूत्रधार, वित्तपोषक, खरीदार और परिवहन संचालक अलग-अलग भूमिकाओं में काम कर रहे थे।

सुपारी की तस्करी में इतना पैसा क्यों?

सुपारी की तस्करी के पीछे सबसे बड़ा आर्थिक कारण कीमत और घरेलू मांग का अंतर है। भारत में सुपारी की खपत काफी अधिक है और विदेशी मूल की सस्ती सुपारी को घरेलू बाजार में बेचने से तस्करों को कीमत का अंतर लाभ के रूप में मिलता है। प्रवर्तन एजेंसियों ने भी विदेशी सुपारी की तस्करी को घरेलू उत्पादकों के लिए नुकसान और सरकारी राजस्व के लिए चुनौती बताया है। इसके अलावा, सुपारी को देश के विभिन्न हिस्सों में पहुंचाने के बाद उसकी असली उत्पत्ति छिपाना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। जांच में सामने आए फर्जी बिल और दस्तावेजों के इस्तेमाल के आरोप बताते हैं कि नेटवर्क केवल सीमा पर निर्भर नहीं है, बल्कि लॉजिस्टिक्स और कागजी लेन-देन का भी सहारा लेता है।

भौगोलिक स्थिति बनती है बड़ी चुनौती

मिजोरम की करीब 510 किलोमीटर लंबी म्यांमार सीमा और पहाड़ी, दुर्गम भूभाग सीमा प्रबंधन को चुनौतीपूर्ण बनाता है। सभी इलाकों में निगरानी और सड़क संपर्क समान नहीं होने के कारण सुरक्षा एजेंसियों के लिए हर संभावित रास्ते पर लगातार नजर रखना कठिन होता है। सीमा पार पारंपरिक और वैध आवाजाही तथा स्थानीय व्यापार की मौजूदगी भी इस क्षेत्र को जटिल बनाती है। इसी वजह से प्रशासन के सामने चुनौती केवल तस्करी रोकने की नहीं, बल्कि वैध व्यापार और अवैध आवाजाही के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखने की भी है। सितंबर में ही लॉन्गतलाई के उपायुक्त ने म्यांमार सीमा पर सीमा पार व्यापार और माल परिवहन की निगरानी कड़ी करने की जरूरत पर जोर दिया था। यह दिखाता है कि समस्या केवल एक जिले तक सीमित नहीं है।

मादक पदार्थों की तस्करी से भी जुड़ता जा रहा नेटवर्क

मिजोरम में चुनौती केवल सुपारी तक सीमित नहीं है। म्यांमार की सीमा से आने वाले रास्तों का इस्तेमाल मेथामफेटामाइन, हेरोइन और अन्य नशीले पदार्थों की तस्करी के लिए भी किया जा रहा है। जुलाई में 2.18 किलोग्राम मेथामफेटामाइन और 468 ग्राम हेरोइन की बरामदगी हुई थी, जबकि अगस्त में DRI ने 15 किलोग्राम मेथामफेटामाइन जब्त किया। इससे सीमा पर काम करने वाली एजेंसियों के सामने एक ही समय में अलग-अलग तरह के तस्करी नेटवर्क से निपटने की चुनौती है। सुपारी और अन्य कृषि उत्पादों की तस्करी जहां मुख्य रूप से आर्थिक लाभ और सीमा शुल्क चोरी से जुड़ी है, वहीं मादक पदार्थों का नेटवर्क संगठित अपराध और अंतरराष्ट्रीय ड्रग तस्करी से भी जुड़ सकता है।

कार्रवाई के बावजूद धंधा क्यों नहीं रुक रहा?

लगातार हो रही जब्ती से यह संकेत मिलता है कि केवल माल पकड़ लेना पूरे नेटवर्क को खत्म करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके पीछे कई कारण सामने आते हैं—पहला, सीमा की भौगोलिक चुनौती। नदी, जंगल और पहाड़ी इलाकों में निगरानी कठिन है। दूसरा, भारी मुनाफा। सस्ती विदेशी सुपारी और बड़े घरेलू बाजार के बीच कीमत का अंतर तस्करी को आर्थिक रूप से आकर्षक बनाता है। तीसरा, संगठित नेटवर्क। जांच एजेंसियों को ऐसे मामलों में केवल सीमा पार आपूर्तिकर्ता ही नहीं, बल्कि स्थानीय भंडारण, परिवहन, वित्तपोषण और देश के दूसरे हिस्सों में खरीददारों की भूमिका भी मिल रही है। चौथा, फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल। ED की जांच में फर्जी ई-वे बिल और दस्तावेजों के इस्तेमाल के आरोप सामने आए हैं, जिससे तस्करी के माल को वैध व्यापार का रूप देने की कोशिश की जाती है। पांचवां, सीमा के दोनों ओर सक्रिय नेटवर्क। म्यांमार में माल जुटाने से लेकर मिजोरम में उसे लेने और फिर असम तथा अन्य राज्यों तक पहुंचाने के लिए अलग-अलग स्तरों पर लोग जुड़े होने के आरोप हैं। ऐसे नेटवर्क में एक खेप पकड़े जाने के बाद दूसरी खेप का रास्ता बदलना संभव होता है।

अब चुनौती सिर्फ जब्ती नहीं, नेटवर्क तोड़ने की

मिजोरम में पिछले कुछ महीनों की कार्रवाइयों से एक बात स्पष्ट है कि सुरक्षा एजेंसियां सीमा पर लगातार कार्रवाई कर रही हैं। लेकिन 1.25 लाख किलोग्राम से अधिक सुपारी की एक साथ बरामदगी यह भी दिखाती है कि सीमा पार से माल की आपूर्ति और देश के भीतर उसका वितरण करने वाला तंत्र पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। ऐसे में प्रभावी कार्रवाई का अगला स्तर केवल ट्रक, गोदाम या खेप पकड़ने तक सीमित न रहकर पूरे वित्तीय और लॉजिस्टिक नेटवर्क की पहचान, फर्जी दस्तावेजों की जांच और अंतिम खरीदारों तक पहुंचने पर निर्भर करेगा। जून और जुलाई में ED की मनी लॉन्ड्रिंग जांच इसी दिशा में आगे बढ़ती दिखाई दी। मिजोरम के लिए यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि तस्करी का असर केवल सीमा सुरक्षा तक सीमित नहीं है। विदेशी सुपारी की अवैध आमद घरेलू उत्पादकों, वैध कारोबार और सरकारी राजस्व को प्रभावित करती है, जबकि उसी सीमा मार्ग से मादक पदार्थों की आवाजाही सुरक्षा और सामाजिक दोनों स्तरों पर अलग चुनौती पैदा करती है।

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