नयी दिल्ली : ‘लैंसेट काउंटडाउन’ की एक शीर्ष अधिकारी का कहना है कि जलवायु अनुकूलन की प्रक्रिया तेजी से गर्म होती धरती के हिसाब से जोर नहीं पकड़ पा रही है। लेकिन वित्तीय संसाधनों की कमी अब भी इसे गति देने की दिशा में आने वाली मुख्य बाधाओं में से एक बनी हुई है।
जलवायु परिवर्तन पर 10वीं संकेतक रिपोर्ट
स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन पर 10वीं संकेतक रिपोर्ट के सिलसिले में बातचीत में ‘लैंसेट काउंटडाउन’ की कार्यकारी निदेशक मरीना रोमानेलो ने कहा कि पेरिस समझौते के लागू होने के बाद से स्वास्थ्य प्रणालियों और जलवायु अनुकूलन के क्षेत्र में कुछ प्रगति जरूर हुई है, लेकिन यह उम्मीदों के मुताबिक नहीं रही है।
जलवायु अनुकूलन से आशय जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए उठाये जाने वाले कदमों से है, जिनमें इसके वर्तमान और भविष्य में पड़ने वाले प्रभावों से निपटना, संभावित नुकसान को कम करना और उभरते अवसरों का लाभ उठाना शामिल है। रोमानेलो ने कहा कि ताजा रिपोर्ट में कई मोर्चों पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव बढ़ने और तीव्र होने की बात सामने आयी है।
वैश्विक जलवायु वित्त उन जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त साबित नहीं हो रहा है, जो देशों को लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा करने और जान बचाने के लिए चाहिए। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्रयासों और उनमें मिली कुछ प्रगति के बावजूद इसके प्रभाव लगातार बढ़ रहे हैं, नतीजतन वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन से जुड़ी बीमारियों का बोझ बढ़ रहा है।
चीन, अमेरिका, रूस और भारत में बच्चे और बुजुर्ग प्रभावित
रिपोर्ट के अनुसार चीन, अमेरिका और रूस के साथ-साथ भारत भी उन शीर्ष देशों में शामिल है, जहां संवेदनशील आयु समूहों के लोगों को (बच्चे और बुजुर्ग) का लू से सबसे ज्यादा सामना होता है।
इसमें कहा गया है कि 2025 में वैश्विक स्तर पर लू वाले दिनों की कुल संख्या में कमी आयी और बुजुर्गों के मामले में यह 2024 के ऐतिहासिक उच्चतम स्तर 15.3 अरब व्यक्ति-दिन और शिशुओं के मामले में 2.3 अरब व्यक्ति-दिन से काफी घट गयी।
रिपोर्ट के अनुसार 2025 रिकॉर्ड में दर्ज दूसरा ऐसा साल था, जिसमें दोनों संवेदनशील आयु वर्गों के लोगों को लू का प्रकोप सबसे अधिक झेलना पड़ा। इसमें कहा गया है कि 2025 में बुजुर्गों को 10.8 अरब व्यक्ति-दिन और बच्चों को 1.1 अरब व्यक्ति-दिन लू का सामना करना पड़ा। कम संसाधनों वाले देशों की मदद करें संपन्न देश रोमानेलो ने कहा कि जब तक हर देश सुरक्षित नहीं हो जाता, तब तक कोई भी देश जलवायु परिवर्तन के स्वास्थ्य प्रभावों से सुरक्षित नहीं रहेगा।
यहां तक कि अधिक संसाधनों वाले संपन्न देशों के लिए भी यह फायदेमंद है कि वे अपना ज्ञान साझा करें और कम संसाधनों वाले देशों की मदद करें, ताकि वे भी आगे बढ़ सकें और जलवायु परिवर्तन के तेजी से बढ़ते प्रभावों से बच सकें। उन्होंने कहा कि देश अनुकूलन पर जितना कम खर्च करेंगे और उस दिशा में जितनी कम प्रगति करेंगे, उन्हें जानमाल का उतना ही अधिक नुकसान उठाना पड़ेगा।