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IWT : भारत का कड़ा रुख, सिंधु जल समझौता अब पुराने फॉर्मूले पर नहीं चलेगा

सरकारी सूत्रों का दावा- आतंकवाद और बदलती परिस्थितियों के बीच मौजूदा स्वरूप में सिंधु जल संधि बहाल नहीं होगी; भारत ने समझौते की शर्तों में बदलाव को बताया जरूरी।

नई दिल्ली: सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को लेकर भारत ने अपना रुख और सख्त कर दिया है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, सीमा-पार आतंकवाद के चलते स्थगित की गई संधि मौजूदा स्वरूप में दोबारा लागू नहीं होगी। भारत का स्पष्ट मानना है कि यदि इस समझौते को आगे जारी रखना है तो पानी के बंटवारे के मौजूदा प्रावधानों में बदलाव अनिवार्य होगा।

सूत्रों के अनुसार, अब गेंद पूरी तरह पाकिस्तान के पाले में है। यदि वह आतंकवाद पर प्रभावी कार्रवाई नहीं करता और समझौते की समीक्षा के लिए तैयार नहीं होता, तो भारत भविष्य में इस संधि से स्थायी रूप से अलग होने जैसे विकल्प पर भी विचार कर सकता है।

भारत का कहना है कि पाकिस्तान को सिंधु जल संधि के तहत भारत की तुलना में कहीं अधिक पानी मिलता है, लेकिन उसने दशकों में जल भंडारण और प्रबंधन का पर्याप्त ढांचा विकसित नहीं किया। सार्वजनिक आंकड़ों के अनुसार पाकिस्तान को संधि के तहत 135 मिलियन एकड़ फीट (MAF) पानी आवंटित है, जबकि भारत के हिस्से में 33 MAF पानी आता है।

सरकारी सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि पाकिस्तान हर साल बड़ी मात्रा में पानी का उपयोग ही नहीं कर पाता और कई बार 30 से 35 MAF तक पानी सीधे अरब सागर में बह जाता है। यह मात्रा भारत के हिस्से में मिलने वाले पानी से भी अधिक है।

भारत का यह भी कहना है कि उसने पहलगाम आतंकी हमले से पहले ही संधि की समीक्षा की मांग उठाई थी। इसके पीछे बदलती जनसंख्या, स्वच्छ ऊर्जा की जरूरतें और पर्यावरणीय परिस्थितियों को आधार बनाया गया था।

सूत्रों का कहना है कि भारत किसी ऐसे समझौते को मौजूदा रूप में जारी नहीं रख सकता जो उसके हितों के अनुरूप न हो। फिलहाल सिंधु जल संधि पर लगी रोक जारी रहेगी और इसे बहाल करने के लिए कोई समयसीमा तय नहीं की गई है।

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