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इंडिया ऑटिज्म सेंटर ने जीवनभर देखभाल संवाद किया आयोजित

ऑटिज्म इन प्रैक्टिस से जागरूकता और मार्गदर्शन सत्र आयोजित

Samaavesh योजना अंतर्गत आजीवन आवासीय देखभाल दृष्टि प्रस्तुत गई

मुनमुन, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : इंडिया ऑटिज्म सेंटर (IAC) एक अग्रणी गैर-लाभकारी संगठन ने विश्व ऑटिज्म जागरूकता माह के अवसर पर “ऑटिज्म इन प्रैक्टिस” नामक विशेष संवाद श्रृंखला का आयोजन किया। इस पहल का उद्देश्य ऑटिज्म और संबंधित विकासात्मक स्थितियों से जुड़े व्यक्तियों के लिए दीर्घकालिक, समावेशी और सशक्त देखभाल मॉडल को बढ़ावा देना था। कार्यक्रम का मुख्य केंद्र IAC की महत्वाकांक्षी योजना “Samaavesh” रहा, जिसके अंतर्गत आजीवन आवासीय देखभाल पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने की दृष्टि प्रस्तुत की गई।

इस कार्यक्रम में अनेक बहु-विषयक विशेषज्ञों ने भाग लिया, जिनमें डॉ. सुदीप साहा, डॉ. अरिजीत चटोपाध्याय, डॉ. जशोधरा चौधरी, डॉ. मौसमी मुखर्जी, डॉ. अबीर मुखर्जी, डॉ. नंदिता चटोपाध्याय, डॉ. कौशांबी बसु, डॉ. प्रदीप परिया, डॉ. एमडी साहिदुल आरफिन और डॉ. सिद्धार्थ नंदी शामिल रहे। कार्यक्रम का शुभारंभ इंडिया ऑटिज्म सेंटर के निदेशक एवं सीईओ जयशंकर नटराजन के मुख्य संबोधन से हुआ। इसके बाद ऑक्युपेशनल थेरेपी पर विशेष सत्र डॉ. मनीष समनानी द्वारा संचालित किया गया, जिसमें कार्यात्मक स्वतंत्रता बढ़ाने की व्यावहारिक रणनीतियां साझा की गईं।

पोषण विशेषज्ञों ने बच्चों के विकास में आहार की भूमिका समझाई

“मेडिसिन्स एंड बियॉन्ड” सत्र का संचालन डॉ. रुद्रजीत सिन्हा ने किया, जिसमें विभिन्न विशेषज्ञों ने मिलकर ऑटिज्म देखभाल में चिकित्सा, व्यवहारिक और चिकित्सीय दृष्टिकोणों के संतुलन पर चर्चा की। इसके साथ ही बाल न्यूरोलॉजी में नवीन उपचार पद्धतियों और प्रारंभिक निदान के महत्व पर भी प्रकाश डाला गया। पोषण संबंधी सत्र में प्रो. डॉ. कल्पना दत्ता ने बच्चों की आहार आवश्यकताओं, भोजन संबंधी चुनौतियों और विकास में पोषण की भूमिका पर विस्तार से जानकारी दी। कार्यक्रम में अभिभावक संवाद सत्र भी आयोजित हुआ, जिसमें नीलांजना रामभोथु और सुमित्रा पॉल बक्शी ने अपने अनुभव साझा किए। व्यवहार संशोधन पर रंजना चक्रवर्ती ने किशोरों के लिए भावनात्मक नियंत्रण और सामाजिक कौशल विकास की रणनीतियां बताईं। डॉ. रुद्रजीत सिन्हा ने कहा कि प्रारंभिक हस्तक्षेप और सामाजिक स्वीकार्यता से ऑटिज्म से जुड़े व्यक्तियों का जीवन अधिक समावेशी बन सकता है। वहीं डॉ. मनीष समनानी ने इसे एक सहयोगात्मक और सीखने योग्य मंच बताया। अंत में IAC ने स्पष्ट किया कि Samaavesh के माध्यम से दीर्घकालिक, सम्मानजनक और संरचित जीवन सुनिश्चित करना उनका प्रमुख लक्ष्य है।

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