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बदलते दौर में बैंड-बाजे की धुन हुई मद्धम

बैंड कलाकारों की आमदनी में 40–50% गिरावट

मुनमुन, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : कभी शादियों और समारोहों की शान समझे जाने वाले बैंड-बाजे की गूंज अब पहले जैसी नहीं रही। पहले घर से बारात निकलते ही ढोल, ताशे और तुरही की तेज धुनें माहौल को खुशी से भर देती थीं लेकिन समय बदलने के साथ मनोरंजन के साधन बदलते गए और इसी कड़ी में डीजे संस्कृति ने पारंपरिक बैंड-बाजे की जगह तेजी से ले ली। हालात ये हैं कि जहां पहले शादियों में केवल बैंड-बाजा ही सबसे पहली पसंद हुआ करता था, वहीं अब डीजे और हाई-फाई साउंड सिस्टम हावी हो चुके हैं। इसके बावजूद बैंड-बाजे से जुड़े कलाकार अपनी परंपरा को जीवित रखने में लगे हुए हैं।

बैंड कलाकारों की आमदनी में 40–50% गिरावट

सेंट्रल एवेन्यू स्थित बैंड कलाकार नौशाद आलम का कहना है कि पहले की तुलना में 40–50% तक की कमी आई है। पहले जहां लोग शादी-ब्याह या बारात के लिए 41, 51 या इससे अधिक सदस्यों की टीम बुक करते थे, वहीं अब 8, 10 या 12 सदस्यों की छोटी टीम से ही काम चलाया जा रहा है। इसका सीधा असर बैंड कलाकारों की आय पर पड़ा है। राजा साहब ने बताया कि चाहे डीजे और हाई-फाई साउंड सिस्टम कितना भी आ जाए, लेकिन बैंड-बाजा का ट्रेंड कभी खत्म नहीं हो सकता। अशोक साव ने कहा कि आज भी शादी समारोह में बैंड-बाजा को शुभ माना जाता है। पहले पश्चिम बंगाल में मारवाड़ी, गुजराती, बिहारी और बंगाली में यह ट्रेंड था, लेकिन अब सिर्फ बंगाली इसे अपनाए हुए हैं।

पारंपरिक संस्कृति को बचाए रखने का जज्बा

हालांकि परिस्थितियां कठिन हैं, फिर भी बैंड कलाकार इस परंपरा को जिंदा रखे हुए हैं। उनका कहना है कि बैंड-बाजे से जुड़ी कला सिर्फ एक व्यवसाय नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही विरासत है। परिवारों ने इसे जीवन भर निभाया है और भविष्य में भी इसे जारी रखने का प्रयास करेंगे। बैंड कलाकार का मानना हैं कि बदलाव समय का नियम है, लेकिन वे उम्मीद करते हैं कि लोगों में फिर से पारंपरिक संगीत के प्रति आकर्षण बढ़ेगा। बैंड की धुनें केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि भारतीय शादियों की सांस्कृतिक पहचान हैं। अगर सरकार और समाज थोड़ी मदद करे, तो इस कला को नई ऊर्जा मिल सकती है। बदलते दौर की चुनौतियों के बीच भी बैंड-बाजे की धुनें अभी मरी नहीं हैं। उम्मीद है कि एक दिन फिर बारातें पारंपरिक संगीत की लय पर थिरकती नजर आएंगी।

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