हावड़ा के बेलगछिया में रथयात्रा में शामिल हुए विधायक रुद्रनील घोष 
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हावड़ा में गूंजे 'जय जगन्नाथ' के सुर

निधि, सन्मार्ग संवाददाता

हावड़ा : ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध हावड़ा शहर में गुरुवार को रथयात्रा का भारी उत्साह देखा गया。 हावड़ा मैदान, आंदुल, कदमतल्ला, लिलुआ, बेलूर, बाली और सांकराइल क्षेत्र की गलियां भगवान जगन्नाथ की जयजयकार से गूंज उठीं。 इस पावन अवसर पर हावड़ा मैदान शरत सदन के सामने व कई जगहों पर श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए जलछत्र, स्वास्थ्य और पेयजल सहायता शिविर लगाए गए। इनका उद्घाटन राज्य मंत्री उमेश राय और विधायक रुद्रनील घोष ने किया। इस दौरान मंत्री ने कहा कि ऐतिहासिक शहर हावड़ा में इस बार रथ पर्व की धूम देखने लायक रही और प्रशासन द्वारा की गई व्यवस्था सराहनीय है。

114 रथों की सुरक्षा में तैनात रहे 800 पुलिसकर्मी

सुरक्षा और सुगम यातायात के लिए पुलिस कमिश्नर (सीपी) अखिलेश चतुर्वेदी, हावड़ा नगर निगम की कमिश्नर तेजस्वी राणा और डीसी हेडक्वार्टर चंदन घोष सहित आला अधिकारियों ने खुद सुरक्षा व्यवस्था और पुलिस कैंपों का निरीक्षण किया। हावड़ा कमिश्नरेट के अंतर्गत इस बार कुल 114 भव्य रथयात्रा निकाली गईं, जिनकी सुरक्षा के लिए लगभग 800 पुलिसकर्मियों के साथ भारी संख्या में सिविक पुलिसकर्मियों की तैनाती रही। भीड़ को देखते हुए सांकराइल और डोमजूड़ के हाई रोड पर भारी वाहनों के मार्ग में बदलाव किया गया। इस अवसर पर शरत सदन, बेलगछिया, जगन्नाथ घाट, बेंटरा, शिवपुर के वैष्णवबाड़ी और इच्छापुर आनंदपुरी आश्रम इलाकों में विशेष मेलों का आयोजन हुआ।

धरोहर: जमींदारी वैभव की कहानी बयां करते ऐतिहासिक रथ

हावड़ा के प्राचीन इतिहास और जमींदारी वैभव का प्रतीक बेंटरा रथतला का 'पालचौधरी बाड़ी' का रथ आज भी लोगों के आकर्षण का मुख्य केंद्र बना हुआ है। इस ऐतिहासिक हवेली के सामने सुंदर तालाब और मठ इस विरासत की गवाही देते हैं। वहीं, घोषपाड़ा स्थित 'बागुई बाड़ी' का रथ भी लगभग 125 वर्ष से अधिक पुराना है, जिसकी शुरुआत वर्ष 1897 में जमींदार प्रियनाथ घोष के नेतृत्व में हुई थी। लोहा और सागौन की लकड़ी से बने इस नक्काशीदार रथ को आज भी श्रद्धालु रस्सी से खींचकर हावड़ा मैदान तक ले जाते हैं। लगभग 100 वर्ष पहले रथयात्रा के दिन कष्टिपाथर की श्री कृष्ण मूर्ति का पैर खंडित होने के बाद यहाँ नई मूर्ति स्थापित की गई थी। इस शुभ दिन राधा-कृष्ण को विशेष अन्न भोग व सब्जियां अर्पित की जाती हैं और घोष परिवार के वर्तमान सदस्य इस अनमोल धरोहर को जीवित रखे हुए हैं।

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