सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : हाई कोर्ट के जस्टिस राजाशेखर मंथा और जस्टिस अजय कुमार गुप्ता के डिविजन बेंच ने उम्रकैद की सजा को खारिज कर दिया। इसके साथ ही कहा है कि अगर पीटिशनर के खिलाफ कोई अन्य मामला नहीं है तो उसे रिहा किया जाए। हत्या के एक मामले में सेशन कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनायी थी। डिविजन बेंच ने अपने आदेश में कहा है कि प्रोसिक्यूशन मामले को साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा है। इसके साथ ही सवाल किया है कि पीटिशनर खुद के बेगुनाह साबित करने की जिम्मेदारी क्यों उठाएगा। इसके खिलाफ पीटिशनर ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी।
एडवोकेट अनिर्वाण मित्रा ने यह जानकारी देते हुए बताया कि महेश केसरी ने यह अपील दायर की थी। बर्दवान दुर्गापुर के एडिशनल सेशन जज ने उसे उम्रकैद की सजा सुनायी थी। यह घटना 2011 की है। बर्दवान के हरिपुर अंतर्गत चिचुरिया बाजार के एक मोबाइल व इलेक्ट्रोनिक की दुकान से मुक्ति बाबरी नामक एक युवक का गला कटा शव मिला था। मृतक के पिता लाल मोहन बाबरी ने बर्दवान थाने में एफआईआर दर्ज करायी थी। पुलिस ने इस मामले में चार्जशीट दाखिल की और एडिशनल सेशन जज ने अभियुक्त को उम्रकैद की सजा सुना दी। पुलिस ने महेश केसरी को ही इस मामले में अभियुक्त करार दिया था। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि जिस दुकान से शव बरामद हुआ था वह सार्वजनिक स्थल है और ग्राहकों की लगातार आवाजाही बनी रहती है। ऐसे में पीटिशनर के पास विशेष जानकारी होने की बात साबित नहीं होती है। इसके साथ ही डिविजन बेंच ने कहा है कि इस मामले में साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 को लागू नहीं किया जा सकता है। प्रोसिक्यूशन आरोपों को साबित करने में नाकाम रहा है। लिहाजा पीटिशनर को दोषी ठहराना न्यायिक सिद्धांत के खिलाफ है। लिहाजा निचली अदालत का फैसला रद्द किया जाता है।