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सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बाद हरीश राणा की "इच्छामृत्यु" की प्रक्रिया शुरू

कई चरणों में पूरी होगी प्रक्रिया, 2–3 हफ्ते लगने की संभावना

32 वर्षीय हरीश राणा के लिए पैसिव यूथेनेशिया (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की प्रक्रिया शुरू हो गई है, जिसे हाल ही में Supreme Court of India ने मंजूरी दी थी। यह प्रक्रिया पूरी होने में दो से तीन सप्ताह तक का समय लग सकता है।

गाज़ियाबाद (उत्तर प्रदेश) के निवासी हरीश राणा 2013 से कोमा में हैं। वह चंडीगढ़ में इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान एक इमारत की चौथी मंजिल से गिर गए थे, जिससे उन्हें गंभीर सिर की चोट लगी थी। शनिवार को उन्हें दिल्ली के All India Institute of Medical Sciences के डॉ. बीआर अंबेडकर इंस्टीट्यूट रोटरी कैंसर हॉस्पिटल के पेलिएटिव केयर यूनिट में शिफ्ट किया गया।

11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में पहली बार हरीश राणा के मामले में आर्टिफिशियल लाइफ सपोर्ट हटाने की अनुमति दी। इस प्रक्रिया के तहत मरीज को दी जा रही जीवन रक्षक सहायता को धीरे-धीरे कम किया जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्रक्रिया में पोषण (न्यूट्रिशन) और अन्य सपोर्ट को धीरे-धीरे रोका जाता है, जबकि मरीज को दर्द से राहत देने के लिए पेलिएटिव सेडेशन दिया जाता है ताकि उसे किसी प्रकार की पीड़ा न हो।

इस प्रक्रिया में कानूनी तौर पर दो मेडिकल बोर्ड की अनुमति आवश्यक होती है। पहला बोर्ड मरीज की स्थिति को “असाध्य और अपरिवर्तनीय” घोषित करता है, जबकि दूसरा बोर्ड 48 घंटे के भीतर इसकी पुष्टि करता है। दोनों की सहमति के बाद ही लाइफ सपोर्ट हटाया जा सकता है।

डॉक्टरों के अनुसार, यदि मरीज वेंटिलेटर पर नहीं है लेकिन रायल्स ट्यूब (नासोगैस्ट्रिक ट्यूब) के जरिए पोषण दिया जा रहा है, तो उसे भी हटाया जा सकता है, जो पैसिव यूथेनेशिया का हिस्सा है।

अस्पताल प्रशासन ने कहा है कि वह सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पूरी तरह पालन कर रहा है। यह मामला भारत में पेलिएटिव केयर और “राइट टू डाई” जैसे संवेदनशील मुद्दों पर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है।

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