कोलकाता : लगभग 19 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद कोलकाता लौटीं निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन ने शनिवार को रवींद्र सदन में आयोजित नागरिक सम्मान समारोह में भावुक और बेबाक संबोधन दिया।
उन्होंने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी को कोलकाता लौटने का अवसर देने और सुरक्षा उपलब्ध कराने के लिए धन्यवाद देते हुए कहा, "मैं आपके प्रति कृतज्ञ हूं, लेकिन कृतज्ञता निष्ठा का अनुबंध नहीं है। कृतज्ञ होने का अर्थ यह नहीं कि मैं अपनी स्वतंत्र सोच को गिरवी रख दूं। मतभिन्नता मुझे अकृतज्ञ नहीं बनाती और किसी अच्छे कार्य की सराहना के लिए राजनीतिक निष्ठा आवश्यक नहीं होती।"
तसलीमा ने कहा, "आज मैं कोलकाता लौट आई हूं।" यह एक वाक्य कहने में उन्हें 19 वर्ष लग गए। निर्वासन का हर वर्ष उनके लिए एक बंद दरवाजा था और हर दिन अपना पता खोने की पीड़ा लेकर आया। उन्होंने कहा कि कोलकाता लौटना केवल एक शहर में वापसी नहीं, बल्कि अपने खोए हुए जीवन के एक अध्याय में लौटने जैसा है।
अपने संबोधन में तसलीमा ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता, मानवाधिकार, वैज्ञानिक सोच और महिला-पुरुष समानता की पुरजोर वकालत की। उन्होंने कहा कि किसी लेखक को अपनी ही भाषा और शहर में आने के लिए पुलिस सुरक्षा की आवश्यकता पड़ना लोकतंत्र के लिए अत्यंत दुखद स्थिति है।
उन्होंने कहा कि उनका सपना है कि ऐसा समय आए, जब किसी लेखक को अपने लेखन के कारण देश छोड़ने या सुरक्षा घेरे में रहने के लिए मजबूर न होना पड़े। उन्होंने अपने 32 वर्षों के निर्वासन को राज्य की नैतिक विफलता बताते हुए कहा कि जब कोई राज्य धार्मिक कट्टरपंथ के दबाव में नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा नहीं कर पाता, तो केवल लेखक ही नहीं, बल्कि कानून का शासन और लोकतांत्रिक मूल्य भी कमजोर हो जाते हैं।
उन्होंने कहा कि किसी भी विचारधारा को आलोचना से ऊपर नहीं रखा जा सकता तथा विचारों का जवाब हिंसा से नहीं, बल्कि तर्क, बहस और लेखन से दिया जाना चाहिए। उनका संघर्ष किसी धर्म के अनुयायियों से नहीं, बल्कि उन विचारों से है, जो समानता, स्वतंत्रता और मानवाधिकारों का विरोध करते हैं।