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बिहार से कोलकाता तक: तिलकुट में बसती है संक्रांति की मिठास और पुरानी यादें

हर सर्दी, परंपरा की मीठी यात्रा

सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : जैसे ही सर्दी अपने चरम पर पहुंचती है और मकर संक्रांति नज़दीक आती है, कोलकाता की गलियों और बाज़ारों में एक खास खुशबू फैलने लगती है। यह खुशबू आती है बिहार से आए तिलकुट कारीगरों की—जो हर साल सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय कर अपनी पारंपरिक मिठाई तिलकुट लेकर शहर पहुंचते हैं। भुने हुए तिल और गुड़ या चीनी से बनी यह कुरकुरी मिठाई न केवल स्वाद में अनोखी होती है, बल्कि अपने साथ बचपन की यादें और त्योहार की गर्माहट भी लाती है।

मकर संक्रांति और तिलकुट का अटूट रिश्ता

तिलकुट का नाम सुनते ही मकर संक्रांति की तस्वीर आंखों के सामने आ जाती है। यह पर्व फसल कटाई, समृद्धि और नए मौसम की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। बिहार में तिलकुट को संक्रांति के बिना अधूरा माना जाता है और यही परंपरा अब कोलकाता में भी धीरे-धीरे अपनी जगह बना चुकी है। सर्द मौसम में तिल और गुड़ से बनी यह मिठाई शरीर को गर्म रखने के साथ-साथ स्वास्थ्यवर्धक भी मानी जाती है।

हाथों से कूटा गया स्वाद

तिलकुट की सबसे खास बात इसकी पारंपरिक बनाने की प्रक्रिया है। कारीगर पहले तिल को सावधानी से भूनते हैं, फिर गुड़ या चीनी के साथ इसे मिलाकर लकड़ी के भारी हथौड़े से हाथों-हाथ कूटते हैं। इसी प्रक्रिया से तिलकुट को उसका खास टेक्सचर और स्वाद मिलता है। मशीनों के दौर में भी यह मिठाई आज तक हाथों की मेहनत और अनुभव पर ही निर्भर है।

बिहार के कारीगर, कोलकाता का बाजार

गया, नवादा और आसपास के इलाकों से आने वाले कारीगर हर सर्दी में कोलकाता के अलग-अलग इलाकों में अस्थायी ठिकाने बनाते हैं। वे सड़क किनारे छोटी दुकानों या ठेलों पर तिलकुट बनाते और बेचते हैं। कई कारीगरों का कहना है कि कोलकाता में तिलकुट की मांग हर साल बढ़ रही है, खासकर उन लोगों के बीच जो बिहार से ताल्लुक रखते हैं या पारंपरिक स्वाद के शौकीन हैं।

स्वाद से ज्यादा, यादों की मिठास

तिलकुट सिर्फ एक मिठाई नहीं है; यह घर, गांव और बचपन की यादों से जुड़ा स्वाद है। एक टुकड़ा तिलकुट खाते ही लोग अपने पुराने दिनों, परिवार और त्योहारों को याद करने लगते हैं। शायद यही वजह है कि बिहार से कोलकाता तक तिलकुट की यह मीठी यात्रा हर सर्दी दोहराई जाती है—संक्रांति का स्वाद और परंपरा ज़िंदा रखने के लिए।

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