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कोलकाता के कोने-कोने के इतिहास को जीवित रख रहा 'फुटनोट्स'

विद्रोही कवि नजरुल के पदचिन्हों पर लोग करेंगे एक सांस्कृतिक सफर

निधि, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : कोलकाता की गलियां केवल ईंट और पत्थर के मकानों का समूह नहीं हैं, बल्कि यहां की हर दीवार साहित्य, कला और क्रांति की गवाह रही है। अक्सर हम इस शहर के 'भूतिया बंगलों' या जर्जर जमींदारबाड़ियों की कहानियां सुनते हैं, लेकिन अब तीन युवाओं ने कोलकाता की उस मिट्टी को टटोलने की कोशिश की है जहां कभी 'विद्रोही कवि' काजी नजरुल इस्लाम की कलम ने आग उगली थी। अर्क देव, पृथ्वी बसु और प्रियक मित्र ने ‘कोलकाता फुटनोट्स’ नाम से एक ऐसी पहल शुरू की है, जिसका उद्देश्य केवल घूमना नहीं, बल्कि इतिहास को जीवित रखना है। इस पहल का मूल मंत्र मनीषियों की स्मृतियों का संरक्षण करना और नई पीढ़ी को अपनी समृद्ध विरासत से रूबरू कराना है। हाल ही में उन्होंने एंग्लो-इंडियन समुदाय की जीवनशैली और बो-बैरेक के अनछुए पहलुओं को दुनिया के सामने रखा था।

1 मार्च को 'विद्रोहीर कोलकाता' का आगाज

प्रियक मित्रा ने बताया कि आगामी 1 मार्च को सुबह 9 बजे से एक विशेष हेरिटेज वॉक जिसका नाम है ‘विद्रोहीर कोलकाता’ का वे सफर करवायेंगे। यह सफर तालतला और कॉलेज स्ट्रीट से शुरू होकर टाला इलाके तक जाएगा। नजरुल लगभग 1921 में कोलकाता आए थे। इस वॉक के दौरान प्रतिभागी उन ऐतिहासिक स्थानों को देख पाएंगे जहां प्रसिद्ध ‘धूमकेतु’ पत्रिका का कार्यालय था। वह कमरा जहाँ नजरुल ने अपनी कालजयी कविता ‘विद्रोही’ रची थी। कवि के जीवन से जुड़े लगभग 12 महत्वपूर्ण घर और उनके अनकहे किस्से। हेरिटेज वॉक में 25 लोग शामिल होंगे।

धरोहरों को बचाने के लिए एक छोटा योगदान

प्रियक मित्रा ने बताया कि यह पहल केवल एक भ्रमण मात्र नहीं है। आयोजकों का स्पष्ट विजन है कि मनीषियों से जुड़ी इन धरोहरों का संरक्षण अनिवार्य है। इस हेरिटेज वॉक से जो राशि मिलती है उसे धरोहरों को बचाने और उनके रखरखाव के कार्यों में लगाया जाता है। यह एक सामाजिक और सांस्कृतिक निवेश है ताकि आने वाली पीढ़ियां इन ऐतिहासिक इमारतों को केवल किताबों में न पढ़ें, बल्कि साक्षात महसूस कर सकें। नजरुल के बाद, यह टीम भविष्य में कोलकाता की अन्य साहित्यिक और सांस्कृतिक विभूतियों के पदचिन्हों पर भी वॉक आयोजित करने की योजना बना रही है, ताकि शहर का गौरवशाली इतिहास समय की धूल में कहीं खो न जाए।

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