डिमांड तो है लेकिन पहले की तरह मुनाफा नहीं
मुनमुन, सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : कोलकाता का प्रसिद्ध डोमपाड़ा सिर्फ एक इलाका नहीं, बल्कि बंगाल की सांस्कृतिक पहचान का मजबूत स्तंभ है। यहीं से निकलकर दुर्गा पूजा, सरस्वती पूजा और काली पूजा के भव्य पंडाल बंगाल की खाड़ी के आखिरी कोनों तक पहुंचते हैं। इतना ही नहीं, बनारस और मद्रास जैसे शहरों में भी डोमपाड़ा के कारीगरों द्वारा बनाए गए पंडाल अपनी मौजूदगी दर्ज कराते रहे हैं। इस साल सरस्वती पूजा को लेकर पंडालों की मांग तो है, लेकिन कारीगरों के चेहरे पर पहले जैसी रौनक नहीं दिखी। डोमपाड़ा के कारीगरों ने बताया कि अब पंडाल बनाने की लागत पहले के मुकाबले काफी बढ़ चुकी है। बांस, कपड़ा, थर्माकोल और सजावटी सामान सब कुछ महंगा हो गया है, लेकिन मेहनत के मुताबिक मुनाफा नहीं मिल पा रहा।
कहीं राम मंदिर, तो कहीं मॉडर्न थीम पर बने हैं पंडाल
डोमपाड़ा में पंडाल निर्माण का काम इन दिनों खासा आकर्षण बना हुआ है। यहां कारीगरों को बांस, कपड़ा और सजावटी सामग्री से अलग-अलग थीम के पंडाल बनाते देखा गया। कहीं अयोध्या के राम मंदिर के तर्ज पर भव्य पंडाल तैयार हो रहा है, तो कहीं आधुनिक वास्तुकला से प्रेरित मंदिरनुमा संरचनाएं बनाई जा रही हैं। पंडालों की बारीक नक्काशी और डिजाइन दर्शकों को खूब लुभा रही है।
घाटे में भी जिंदा है पंडाल की परंपरा
20 साल से काम कर रहे कारीगर अरूप लाल का कहना है कि एक समय था जब पंडाल निर्माण से पूरे साल का खर्च निकल आता था। आज हालात यह हैं कि लागत तो बढ़ती जा रही है, लेकिन बाजार उतना सहयोग नहीं कर पा रहा। कई आयोजक बजट कम कर रहे हैं, जिससे कारीगरों को अपनी मेहनत का पूरा मूल्य नहीं मिल पा रहा। अशोक दास ने बताया कि इसके बावजूद डोमपाड़ा के कारीगर इस काम को छोड़ने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि यह सिर्फ रोजगार नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा है। उनके पूर्वजों ने जिस कला को जिंदा रखा, उसे वे हर हाल में आगे बढ़ाना चाहते हैं। यही वजह है कि घाटे के बावजूद पंडाल निर्माण का काम जारी है।
महंगाई के बीच भी जिंदा है हुनर
यहां के कारीगर सिर्फ पूजा के समय ही नहीं, बल्कि सालभर अपने हुनर को जिंदा रखते हैं। यहां शादी, जन्मदिन समारोह, धार्मिक आयोजन और अन्य इवेंट्स के लिए भी पंडाल बनाए जाते हैं। हालांकि, कारीगर मानते हैं कि पहले जैसा स्थायी बाजार अब नहीं रहा। डोमपाड़ा आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां एक तरफ बढ़ती महंगाई और घटता बाजार है, तो दूसरी ओर संस्कृति और परंपरा को बचाए रखने का जज्बा। इन कारीगरों की मेहनत सिर्फ पंडाल नहीं गढ़ती, बल्कि बंगाल की आत्मा को आकार देती है।