नागपुर : बॉम्बे हाई कोर्ट के नागपुर पीठ ने धर्मांतरण के लिए कथित तौर पर प्रलोभन देने और दबाव बनाने के मामले में अहम फैसला सुनाते हुए चार आरोपितों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी (एफआईआर) और आरोपपत्र को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति पर अपना धर्म छोड़कर दूसरा धर्म अपनाने का दबाव डालने का आरोप अपने आप में इस बात का प्रमाण नहीं है कि किसी धार्मिक समुदाय की भावनाओं का अपमान किया गया है। न्यायालय ने कहा कि अपने धर्म का प्रचार करना और किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना दो अलग-अलग बातें हैं।
न्यायमूर्ति एम. डब्ल्यू. चांदवानी ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि उपलब्ध आरोपों के आधार पर अभियुक्तों की गतिविधियों को अपने धर्म का प्रचार करने के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उन्होंने देश के किसी वर्ग के नागरिकों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई है।
अदालत ने अपने छह अक्टूबर के आदेश में कहा कि अधिक से अधिक आरोपितों पर शिकायतकर्ता और उसकी पत्नी को हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रेरित करने अथवा दबाव डालने का आरोप लगाया जा सकता है। हालांकि, केवल इस आधार पर धार्मिक भावनाओं के अपमान का अपराध नहीं बनता।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपितों ने शिकायतकर्ता और उसकी पत्नी से कथित तौर पर कहा था कि यदि वे हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपना लेते हैं, तो उन्हें हर महीने आर्थिक सहायता दी जाएगी। इसके अलावा, उनके बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने और परिवार के लिए एक घर बनवाने का भी आश्वासन दिया गया था।
इन्हीं आरोपों के आधार पर चार लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। हालांकि, आरोपितों ने अदालत में दलील दी कि उनका उद्देश्य किसी धर्म का अपमान करना या भारत के किसी वर्ग के नागरिकों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं था। उन्होंने प्राथमिकी और मामले में दाखिल आरोपपत्र को रद्द करने की मांग की थी।
हाई कोर्ट ने मामले में आरोपों की प्रकृति पर विचार करते हुए कहा कि धर्म का प्रचार करने और किसी धर्म या धार्मिक समुदाय का अपमान करने के बीच अंतर है। अदालत के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति को दूसरा धर्म अपनाने के लिए मनाने या दबाव डालने का आरोप लगाया जाता है, तो मात्र इसी तथ्य से यह साबित नहीं होता कि धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला अपराध किया गया है।
अदालत की टिप्पणी का केंद्र यह था कि आरोपितों के खिलाफ लगाए गए आरोपों और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के कथित अपराध के बीच आवश्यक संबंध स्थापित होना चाहिए। केवल धर्मांतरण के लिए दबाव बनाने के आरोप को धार्मिक अपमान के अपराध के बराबर नहीं माना जा सकता।
मामले में अदालत ने समय-सीमा से जुड़े कानूनी पहलू पर भी गौर किया। कथित घटना वर्ष 2025 की बताई गई थी। अदालत ने उल्लेख किया कि उस समय महाराष्ट्र में प्रलोभन देकर धर्मांतरण कराने पर रोक लगाने वाला संबंधित कानून लागू नहीं था।
अदालत के आदेश के अनुसार, महाराष्ट्र में धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा और गैरकानूनी धर्मांतरण पर रोक लगाने के उद्देश्य से बनाया गया कानून 28 अगस्त 2026 से लागू हुआ। चूंकि कथित घटना इससे पहले की थी, इसलिए मामले पर विचार करते समय घटना के समय लागू कानूनी प्रावधानों को ध्यान में रखना आवश्यक था।
हाई कोर्ट ने अमरावती निवासी जोसेफ खुड़ावंत, उनके बेटे विक्टर खुड़ावंत, बहू एल्विना खुड़ावंत और सामाजिक कार्यकर्ता अनंत मानकर के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी तथा दाखिल आरोपपत्र को रद्द कर दिया।
चारों आरोपितों ने जनवरी में अमरावती में दर्ज प्राथमिकी और उसके बाद दाखिल आरोपपत्र को चुनौती देते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। उनकी मांग थी कि मामले में दर्ज आपराधिक कार्यवाही समाप्त की जाए। अदालत ने मामले के तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद उनके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी और आरोपपत्र निरस्त कर दिया।