12-13 सितंबर को नई दिल्ली में जुटेंगे सदस्य और साझेदार देशों के नेता
नई दिल्ली : राजधानी दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि बैठक का केंद्र केवल कूटनीतिक विमर्श नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था, आर्थिक सुरक्षा, व्यापार, निवेश और बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों से निपटने के लिए साझा रणनीति पर भी रहेगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुक्रवार को विश्वास जताया कि सम्मेलन में दुनिया के साझा हितों को ध्यान में रखते हुए विभिन्न मुद्दों पर सकारात्मक और सार्थक चर्चा होगी।
भारत इस बार ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है। बैठक में संगठन के सदस्य देशों के साथ साझेदार देशों के नेता और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधि भी हिस्सा ले रहे हैं। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान समेत कई प्रमुख नेताओं की मौजूदगी इस बैठक के कूटनीतिक महत्व को और बढ़ा रही है।
प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर कहा कि आने वाले दिनों में दुनिया भर के नेता ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए एकत्र होंगे। उन्होंने उम्मीद जताई कि वैश्विक कल्याण की साझा भावना के साथ विभिन्न मुद्दों पर सकारात्मक और सार्थक विचार-विमर्श होगा।
प्रधानमंत्री का यह संदेश ऐसे समय आया है जब वैश्विक स्तर पर व्यापारिक तनाव, आपूर्ति शृंखला में व्यवधान, ऊर्जा सुरक्षा और भू-राजनीतिक अस्थिरता जैसी चुनौतियां अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित कर रही हैं। ऐसे में ब्रिक्स मंच पर सदस्य देशों के बीच सहयोग बढ़ाने की कोशिश को विशेष महत्व मिल रहा है।
ब्रिक्स की शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के समूह के रूप में हुई थी। बाद के वर्षों में इसका दायरा तेजी से बढ़ा।
2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब को समूह में शामिल किया गया। इसके बाद 2025 में इंडोनेशिया भी सदस्य बना। इस विस्तार ने ब्रिक्स को पहले की तुलना में कहीं अधिक व्यापक भौगोलिक और आर्थिक प्रतिनिधित्व वाला समूह बना दिया है।
ब्रिक्स के विस्तार की एक और महत्वपूर्ण कड़ी उसके साझेदार देशों की बढ़ती संख्या है। पिछले साल बेलारूस, बोलीविया, कजाकिस्तान, क्यूबा, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान और वियतनाम को साझेदार देश बनाया गया। इससे समूह के साथ जुड़ने वाले देशों का दायरा सदस्यता से आगे बढ़कर व्यापक सहयोग के मंच तक पहुंच गया है।
ब्रिक्स के विस्तार के साथ इसका वैश्विक आर्थिक महत्व भी बढ़ा है। समूह के 11 सदस्य देश मिलकर दुनिया की आबादी के करीब 49.5 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करते हैं।
वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में इनकी हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत और वैश्विक व्यापार में करीब 26 प्रतिशत बताई गई है। ये आंकड़े बताते हैं कि ब्रिक्स अब केवल उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच संवाद का मंच नहीं रह गया है। इसके फैसलों और आर्थिक प्राथमिकताओं का वैश्विक व्यापार तथा निवेश की दिशा पर भी असर पड़ सकता है।
नई दिल्ली में होने वाला शिखर सम्मेलन ऐसे दौर में हो रहा है जब दुनिया आर्थिक और भू-राजनीतिक बदलावों के दौर से गुजर रही है। व्यापारिक तनाव, आपूर्ति शृंखला में अनिश्चितता, ऊर्जा सुरक्षा और बाजारों में बढ़ते जोखिम जैसे मुद्दे लगभग सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के सामने हैं।
ऐसे में भारत की मेजबानी में होने वाली बैठक से केवल घोषणाओं की नहीं, बल्कि सदस्य देशों के बीच व्यावहारिक सहयोग बढ़ाने की उम्मीद भी की जा रही है।
प्रधानमंत्री मोदी का वैश्विक कल्याण पर जोर और जयशंकर का आर्थिक सुरक्षा, पारदर्शिता तथा व्यापारिक सहयोग पर फोकस इस सम्मेलन की दो प्रमुख दिशाओं को सामने लाता है।
एक तरफ ब्रिक्स के शीर्ष नेता वैश्विक और क्षेत्रीय मुद्दों पर विचार करेंगे, वहीं कारोबारी मंच आर्थिक सहयोग को जमीन पर उतारने की संभावनाओं पर चर्चा करेगा। इस तरह नई दिल्ली सम्मेलन राजनीतिक संवाद और आर्थिक साझेदारी- दोनों को एक ही व्यापक मंच पर जोड़ने का अवसर प्रदान कर रहा है।
भारत की ओर से सामने आए संदेश का व्यापक अर्थ यह है कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में ब्रिक्स देशों को एक-दूसरे के बाजारों, क्षमताओं और आपूर्ति नेटवर्क का बेहतर इस्तेमाल करना चाहिए।
निवेश में पारदर्शिता, व्यापार में विविधता, ऊर्जा सुरक्षा, भरोसेमंद लॉजिस्टिक व्यवस्था और वैश्विक अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धी बने रहने की क्षमता—ये वे क्षेत्र हैं जिन पर सहयोग बढ़ाकर सदस्य देश अपनी आर्थिक मजबूती बढ़ा सकते हैं।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ब्रिक्स बिजनेस फोरम को संबोधित करते हुए आर्थिक मोर्चे पर सहयोग का खाका सामने रखा। उन्होंने कहा कि ब्रिक्स देशों को व्यापार और निवेश के लिए ऐसी व्यवस्था बनाने की दिशा में काम करना चाहिए, जिसमें पारदर्शिता हो और कारोबारियों के लिए परिस्थितियां अधिक भरोसेमंद एवं पूर्वानुमान योग्य हों।
जयशंकर के मुताबिक, मौजूदा भू-राजनीतिक उथल-पुथल ने वैश्विक व्यापार और आपूर्ति नेटवर्क के सामने नई चुनौतियां खड़ी की हैं। ऐसे समय में अकेले किसी एक देश के प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे। ब्रिक्स देशों को आपसी समन्वय बढ़ाकर आर्थिक झटकों का सामना करने की क्षमता मजबूत करनी होगी।
विदेश मंत्री ने वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में आने वाले व्यवधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि सदस्य देशों को अधिक लचीले और भरोसेमंद आपूर्ति नेटवर्क तैयार करने की जरूरत है।
इसके लिए देशों के बीच कारोबारी संपर्क बढ़ाने, लॉजिस्टिक सहायता को मजबूत करने और ऐसे रास्ते विकसित करने पर जोर दिया जाना चाहिए, जिनसे किसी एक क्षेत्र में पैदा हुई समस्या का असर पूरी अर्थव्यवस्था पर न पड़े।
उनका जोर केवल संकट के समय वैकल्पिक व्यवस्था तैयार करने पर नहीं, बल्कि पहले से ऐसे नेटवर्क विकसित करने पर था जो वैश्विक परिस्थितियों में होने वाले बदलावों को झेल सकें।
जयशंकर ने ब्रिक्स के आर्थिक सहयोग को सीधे कारोबारी समुदाय से जोड़ते हुए कहा कि सदस्य देशों की कोशिश ऐसी होनी चाहिए जिससे उनके कारोबारियों के लिए नए साझेदार तलाशना और नए बाजारों तक पहुंच बनाना आसान हो।
उनके मुताबिक, ब्रिक्स देशों के बीच आपूर्ति नेटवर्क को जोड़ने और एक-दूसरे की क्षमताओं को वास्तविक कारोबारी साझेदारी में बदलने की पर्याप्त संभावनाएं हैं।
इसका अर्थ केवल व्यापार की मात्रा बढ़ाना नहीं है, बल्कि सदस्य देशों की अलग-अलग आर्थिक क्षमताओं को एक-दूसरे का पूरक बनाना भी है।
वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों का जिक्र करते हुए जयशंकर ने व्यापारिक संबंधों में विविधता लाने की आवश्यकता पर भी बल दिया। किसी एक बाजार, आपूर्तिकर्ता या व्यापारिक मार्ग पर अत्यधिक निर्भरता संकट के समय जोखिम बढ़ा सकती है।
ऐसे में ब्रिक्स देशों के बीच नए व्यापारिक गलियारे, बाजार और साझेदारियां विकसित करना आर्थिक स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
उन्होंने व्यापार और निवेश में पारदर्शिता तथा कारोबार के लिए पूर्वानुमान योग्य वातावरण को भी जरूरी बताया। उनके अनुसार, निवेशकों और कारोबारियों को यह भरोसा होना चाहिए कि जिन नियमों और व्यवस्थाओं के आधार पर वे फैसले ले रहे हैं, उनमें अचानक और अनिश्चित बदलाव नहीं होंगे।
जयशंकर ने आर्थिक गतिविधियों और आर्थिक सुरक्षा को आत्मनिर्भरता से जोड़ते हुए कहा कि ब्रिक्स देशों के लिए आर्थिक झटकों को सहने की क्षमता बढ़ाना महत्वपूर्ण है।
हालांकि उन्होंने वैश्विक अर्थव्यवस्था से अलग होने की बात नहीं कही। उनका जोर ऐसी व्यवस्था पर रहा जिसमें देश वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़े भी रहें और प्रतिस्पर्धी भी, लेकिन बाहरी झटकों के प्रति उनकी संवेदनशीलता कम हो।
यानी आत्मनिर्भरता का अर्थ वैश्विक व्यापार से दूरी बनाना नहीं, बल्कि वैश्विक बाजार से जुड़े रहते हुए अपनी उत्पादन और आपूर्ति क्षमता को इतना मजबूत बनाना है कि संकट की स्थिति में अर्थव्यवस्था असहाय न हो।
विदेश मंत्री ने मौजूदा परिस्थितियों में कारोबारी व्यवहार को बाजार के वास्तविक सिद्धांतों के अनुरूप रखने की जरूरत बताई। इसके साथ उन्होंने भरोसेमंद सहायता व्यवस्था, विविध व्यापारिक संबंध, पारदर्शी व्यापार एवं निवेश और पूर्वानुमान योग्य कारोबारी माहौल को आवश्यक बताया।
इन सभी पहलुओं को एक साथ देखने पर ब्रिक्स की आर्थिक प्राथमिकताओं का व्यापक खाका सामने आता है—व्यापार बढ़ाना, जोखिम कम करना, निवेश को आसान बनाना और सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं को बाहरी झटकों के प्रति अधिक मजबूत बनाना।
जयशंकर ने ऊर्जा क्षेत्र को भी आर्थिक सुरक्षा से जोड़ते हुए कहा कि ऐसी ऊर्जा व्यवस्था की जरूरत है जो संभावित व्यवधानों का सामना कर सके।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ऊर्जा बदलाव की प्रक्रिया हर देश की अपनी परिस्थितियों के अनुरूप होनी चाहिए। यानी ऊर्जा संक्रमण के लिए एक जैसी व्यवस्था सभी देशों पर लागू करने के बजाय राष्ट्रीय जरूरतों, संसाधनों और आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखना होगा। ऊर्जा की कीमतों, आपूर्ति और उपलब्धता में अस्थिरता का सीधा असर उद्योग, परिवहन और आम उपभोक्ता तक पहुंचता है। इसलिए ब्रिक्स के आर्थिक सहयोग में ऊर्जा सुरक्षा का मुद्दा व्यापक महत्व रखता है।