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हरिवंश नारायण ने मल्लिकार्जुन खड़गे , विपक्ष का समझायी सदन की मर्यादा 

वेल में  आना संसद के नियमों और मर्यादा का अपमान -- हरिवंश

Sanmarg Digital

नयी दिल्ली: संसद के मॉनसून सत्र का तीसरा सप्ताह चल रहा है लेकिन सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच लगाता गतिरोध बना हुआ है। उच्च सदन में विपक्ष का आरोप है कि पूर्व सभापति और वर्तमान उपसभापति उनके साथ लगातार भेदभाव करते हैं उनको बोलने का अवसर नहीं देते हैं। मंगलवार को उप सभापति हरिवंश नारायण ने विपक्ष के रवैये पर एक लंबा चौड़ा वक्तव्य जारी करते हुए कहा कि मौजूदा सत्र में लगातार सदन की कार्यवाही में व्यवधान पैदा किया जा रहा है। चेयर द्वारा बार-बार की गई अपील के बावजूद  सदस्यों ने नियम  235 और 238 के प्रावधानों का  जान बूझ उल्लंघन   कर सदन को बाधित किया। और सदन के 41 घंटे 11 मिनट गंवा दिए गए।

हरिवंश ने नेता प्रतिपक्ष के एक अगस्त 2025 के एक का हवाला देते हुए वेल की गरिमा और वेल में सुरक्षा कर्मियों के आने का इतिहास भी सदन को बताया। खड़गे ने पत्र में लिखा —” जब सांसद अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रयोग कर रहे थे तो सीआईएसएफ कर्मियों को वैल में जाने का आदेश दिया गया”। उन्होंने कहा  चेयर और नेता प्रतिपक्ष के बीच का पत्र मीडिया में क्यों जारी किया चेयर  की मर्यादा मीडिया के पास जाने की अनुमति नहीं देती।

हरिवंश ने कहा सदन का वह एरिया, जिसे आम भाषा में वेल कहते हैं, उसकी एक पवित्रता होती है. और वहां पर प्रवेश नियंत्रित होता है. वहां जाकर नारे लगाना, सदन की कार्यवाही बाधित करना सर्वथा अनुचित है. सदन की गरिमा गिराने जैसा है. उपसभापति ने इस सत्र की अनेक घटनाओं के उदाहरण पेश किए 25, 28 , 29 31 जुलाई और एक अगस्त के। जब विपक्षी दलों के सांसदों ने सदन में बयान दे रहे सांसदों के माईक के पास जा कर नारेबाजी की। उन्होंने पूछा कि क्या उन सदस्यों के विशेषाधिकार का हनन नहीं है जिनको उनके पास जा कर बोलने से रोका जाता है। सभी घटनाएं संसद के रिकॉर्ड में दर्ज हैं ।सब सदस्यों को आत्मावलोकन करना चाहिए कि क्या वे ऐसे काम करके सदन की गरिमा बढ़ा रहे हैं ?

विपक्ष को वेल में सुरक्षा कर्मियों के आने पर आपत्ति क्यों ? राज्यसभा के उपसभापति ने वेल में सुरक्षा कर्मियों के आने का इतिहास सदन को बताया। साथ ही ये भी बताया कि सुरक्षा कर्मियों के मौजूद रहने की शुरूआत विठ्टल भाई पटेल ने 1930 में की थी। ये किसी ताकत का इस्तेमाल नहीं करते बस सदन की गरिमा बने रखते हैं ।उन्होंने 1978,1988 ,2008 और 2014 के कुछ उदाहरण दे कर बताया कि कैसे तत्कालीन सभापतियों ने सांसदों के वेल में आने को दुखद और निंदनीय बताया था। और इसे घृणित भी बताया था। ये भी कहा था कि ऐसा व्यवहार सहन नहीं किया जाएगा। ये सदन का अपमान है।  

हरिवंश नारायण ने नेता प्रतिपक्ष से अपील की कि वे विचार करें कि वेल में जाना, शोर मचाना, सदन न चलने देना, अन्य सदस्यों को जो सदन की कार्यवाही में भाग ले रहे हैं, उन्हें न बोलने देना, कैसे किसी सदस्य का  विरोध जताने का लोकतांत्रिक अधिकार हो सकता है। प्रश्नकाल और शून्य काल, दोनों ही प्रत्येक सदस्य के लिए सरकार को जिम्मेदार बनाने और लोक महत्व के मुद्दों को उठाने के लिए महत्वपूर्ण औजार हैं। उपसभापति ने नेता प्रतिपक्ष से अपील की कि ऐसे  सदस्य जो नियम और परंपराओं की अवहेलना करते हैं, उनको सदन का कामकाज चलने देने की सलाह दें। सदन की गरिमा बनाए रखना सत्ता और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी है उन्होंने सदस्यों से भी आग्रह किया कि वे बहस में हिस्सा लें सदन चलने दें

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