मुनमुन, सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : राज्य के प्राथमिक शिक्षा विभाग द्वारा छात्र-शिक्षक अनुपात को संतुलित करने के लिए उठाए गए कदमों ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। 'अतिरिक्त' शिक्षकों के ट्रांसफर और शून्य नामांकन वाले स्कूलों को स्थायी रूप से बंद करने की संभावना से शिक्षक संगठन और विपक्षी दल दोनों चिंतित हैं। स्कूल शिक्षा विभाग ने प्राथमिक स्तर पर 'अतिरिक्त' शिक्षकों को ऐसे स्कूलों में भेजने का आदेश जारी किया है जहां शिक्षकों की भारी कमी है। विभाग के अनुसार, शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE), 2009 के तहत प्रति 30 छात्रों पर एक शिक्षक होना अनिवार्य है। राज्य में कई जगह छात्र तो हैं लेकिन शिक्षक नहीं, वहीं कुछ जगहों पर स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है।
जिला स्तर पर ही सीमित रहेगी तबादला प्रक्रिया
अधिकारियों के मुताबिक, ये ट्रांसफर केवल जिला स्तर पर ही किए जाएंगे। शिक्षकों को उसी जिले के दूसरे स्कूलों में भेजा जाएगा जहां उनकी जरूरत है। 'बांग्लार शिक्षा' पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार, शून्य छात्र संख्या वाले स्कूलों के शिक्षक पहले से ही पास के अन्य स्कूलों में सेवा दे रहे हैं। सरकार का कहना है कि यह निर्णय इस व्यवस्था को केवल आधिकारिक और औपचारिक रूप प्रदान करता है।
शिक्षकों का कड़ा विरोध और BJP सेल का दखल
इस निर्णय का शिक्षक संगठनों द्वारा कड़ा विरोध किया जा रहा है। निखिल बंग प्राथमिक शिक्षक संघ का तर्क है कि दिल्ली और तमिलनाडु के तर्ज पर स्थानीय पंचायतों और निकायों की मदद से इन स्कूलों में दाखिले दोबारा शुरू कराए जाने चाहिए थे। आशंका जताई जा रही है कि इस कदम से राज्य के 3,000 से अधिक स्कूल स्थायी रूप से बंद हो सकते हैं। इस मुद्दे की गंभीरता को देखते हुए BJP का शिक्षक सेल मुख्यमंत्री से संपर्क करने की तैयारी में है, जबकि शिक्षकों का एक प्रतिनिधिमंडल वैकल्पिक समाधान की मांग को लेकर विकास भवन का रुख करेगा।