नई दिल्ली : 25 सितंबर 2026 को ‘मेक इन इंडिया’ पहल के 12 वर्ष पूरे हुए। इसी अवसर पर कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने केंद्र की मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि यह महत्वाकांक्षी कार्यक्रम अपनी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरा। उनका मुख्य तर्क तीन बिंदुओं पर है—विनिर्माण वृद्धि, निजी निवेश और रोजगार।
जयराम रमेश के अनुसार, 2014 के बाद भी विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि कई वर्षों में पूरी अर्थव्यवस्था की वृद्धि से पीछे रही और इसलिए ‘मेक इन इंडिया’ से मिलने वाली अतिरिक्त वृद्धि का स्पष्ट प्रभाव आंकड़ों में दिखाई नहीं देता।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये कांग्रेस और जयराम रमेश द्वारा की गई राजनीतिक-आर्थिक व्याख्या है। दूसरी ओर, केंद्र सरकार का कहना है कि ‘मेक इन इंडिया’ के साथ जुड़ी नीतियों—विशेषकर PLI, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग, सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन, PM GatiShakti और औद्योगिक अवसंरचना—ने उत्पादन, निवेश और निर्यात में महत्वपूर्ण विस्तार किया है।
‘मेक इन इंडिया’ शुरू क्यों किया गया था?
‘मेक इन इंडिया’ 25 सितंबर 2014 को शुरू किया गया था। इसके घोषित उद्देश्यों में निवेश को बढ़ावा देना, नवाचार को प्रोत्साहित करना, विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचा तैयार करना तथा भारत को विनिर्माण, डिजाइन और नवाचार का वैश्विक केंद्र बनाना शामिल था। PPress Information Bureau+1इसका अर्थ यह था कि भारत केवल एक बड़ा उपभोक्ता बाजार न रहे, बल्कि यहां कंपनियां बड़े पैमाने पर उत्पादन करें, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं का हिस्सा बनें, निर्यात बढ़ाएं और रोजगार पैदा करें।बाद के वर्षों में ‘मेक इन इंडिया’ एक अकेली योजना के बजाय कई नीतियों और कार्यक्रमों का व्यापक ढांचा बन गया। इसमें PLI योजनाएं, FDI सुधार, National Single Window System, औद्योगिक भूमि बैंक, PM GatiShakti, औद्योगिक कॉरिडोर, सरकारी खरीद में घरेलू विनिर्माण को प्राथमिकता और Ease of Doing Business सुधार जैसी पहलें शामिल हुईं।
कांग्रेस की मुख्य आपत्ति क्या है?
जयराम रमेश की आपत्ति का मूल आधार यह है कि 2014 में जिस बड़े विनिर्माण परिवर्तन की उम्मीद जताई गई थी, उसके अनुरूप समग्र अर्थव्यवस्था में विनिर्माण का प्रदर्शन नहीं हुआ।कांग्रेस के मुताबिक:विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि कई वर्षों में कुल आर्थिक वृद्धि से कम रही।निजी निवेश में वह व्यापक उछाल नहीं आया जिसकी अपेक्षा की गई थी।विनिर्माण से बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा होने का अपेक्षित प्रभाव नहीं दिखा। विनिर्माण का GDP में हिस्सा उस स्तर तक नहीं पहुंचा जिसकी ‘मेक इन इंडिया’ की मूल महत्वाकांक्षा से उम्मीद की जाती थी। रमेश ने अपने तर्क में GVA और IIP, दोनों प्रकार के आंकड़ों का हवाला दिया है और कहा है कि पुराने तथा नए दोनों सांख्यिकीय सीरीज में लंबे समय के प्रदर्शन को देखने पर विनिर्माण की वृद्धि कई बार समग्र अर्थव्यवस्था से पीछे रही।
यहां एक महत्वपूर्ण सांख्यिकीय सावधानी भी है
IIP और manufacturing GVA एक ही चीज नहीं मापते। MoSPI के अनुसार IIP एक निश्चित वस्तु-बास्केट के भौतिक उत्पादन की मात्रा में बदलाव को मापता है, जबकि GVA उत्पादन में से intermediate consumption घटाने के बाद मूल्यवर्धन को दर्शाता है। इसलिए दोनों की वृद्धि दर में अंतर होना स्वाभाविक है।
क्या सरकारी आंकड़े बताते हैं कि विनिर्माण में कोई प्रगति नहीं हुई?
ऐसा कहना उपलब्ध आंकड़ों की पूरी तस्वीर नहीं होगी। सरकार के नवीनतम आंकड़े कई विनिर्माण क्षेत्रों में उल्लेखनीय विस्तार दिखाते हैं। उदाहरण के लिए, इलेक्ट्रॉनिक्स में 2014-15 से 2024-25 के बीच इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन लगभग ₹1.9 लाख करोड़ से बढ़कर करीब ₹12 लाख करोड़ हो गया। इसी अवधि में इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात लगभग ₹38,000 करोड़ से बढ़कर ₹3.3 लाख करोड़ हुआ। मोबाइल फोन विनिर्माण इकाइयों की संख्या भी 2 से बढ़कर लगभग 300 बताई गई है। सरकार के अनुसार, मोबाइल विनिर्माण में भी बड़ा बदलाव आया है। 2014-15 में मोबाइल फोन उत्पादन लगभग ₹18,000 करोड़ था, जो 2024-25 में ₹5.45 लाख करोड़ तक पहुंच गया; मोबाइल फोन निर्यात भी इसी अवधि में लगभग ₹1,500 करोड़ से बढ़कर ₹2 लाख करोड़ हुआ। इसलिए यह कहना अधिक सटीक होगा कि कुछ विशिष्ट विनिर्माण क्षेत्रों में बड़ा विस्तार हुआ है, लेकिन इससे अपने आप यह साबित नहीं होता कि पूरे भारतीय विनिर्माण क्षेत्र ने मूल ‘मेक इन इंडिया’ लक्ष्य के अनुरूप प्रदर्शन किया है।
PLI योजना इस बहस का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है‘
मेक इन इंडिया’ के बाद सरकार ने Production Linked Incentive (PLI) को विनिर्माण नीति का प्रमुख औजार बनाया। मार्च 2026 तक सरकार के अनुसार 14 प्रमुख क्षेत्रों में PLI योजनाओं के तहत : ₹2.40 लाख करोड़ से अधिक वास्तविक निवेश हुआ,₹22.66 लाख करोड़ से अधिक उत्पादन हुआ, ₹15.20 लाख करोड़ से अधिक निर्यात हुआ,और 14 लाख से अधिक रोजगार पैदा हुए।
1मार्च 2026 की एक अन्य सरकारी रिपोर्ट में दिसंबर 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार, निवेश ₹2.16 लाख करोड़ से अधिक, उत्पादन/बिक्री ₹20.41 लाख करोड़ से अधिक और प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोजगार 14.39 लाख से अधिक बताया गया था।
इससे सरकार का पक्ष यह बनता है कि विनिर्माण में पूंजी और उत्पादन दोनों बढ़े हैं, और PLI ने कुछ रणनीतिक क्षेत्रों में निवेश आकर्षित किया है।लेकिन कांग्रेस की आपत्ति का उत्तर इससे पूरी तरह नहीं मिलता। कारण यह है कि PLI का प्रभाव मुख्यतः 14 लक्षित क्षेत्रों में मापा जाता है, जबकि ‘मेक इन इंडिया’ की मूल महत्वाकांक्षा पूरे भारतीय विनिर्माण आधार में व्यापक परिवर्तन की थी। इसलिए PLI की सफलता और पूरे manufacturing sector की सफलता को एक ही मापदंड मानना उचित नहीं होगा।5. रोजगार का सवाल क्यों महत्वपूर्ण है?‘मेक इन इंडिया’ की सबसे बड़ी अपेक्षाओं में से एक थी कि बड़े पैमाने पर औद्योगिकीकरण से नौकरियां पैदा होंगी।
यहीं कांग्रेस का तर्क अधिक व्यापक है। उसका कहना है कि कुछ क्षेत्रों- जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स में रोजगार बढ़ा है, लेकिन व्यापक और बड़े पैमाने का manufacturing employment boom नहीं दिखाई दिया।सरकारी आंकड़ों में दूसरी तस्वीर भी सामने आती है। उदाहरण के लिए, सरकार ने जुलाई 2026 में बताया कि इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्र में लगभग 25 लाख रोजगार पैदा हुए हैं और मोबाइल विनिर्माण में लगभग 12 लाख नौकरियां हैं; इनमें प्रत्यक्ष मोबाइल विनिर्माण कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 70% बताई गई।
इसीलिए रोजगार की बहस में दो अलग प्रश्न हैं: क्या कुछ विनिर्माण क्षेत्रों में रोजगार बढ़ा?उपलब्ध सरकारी आंकड़े इसका समर्थन करते हैं। क्या पूरे देश में अपेक्षित पैमाने पर manufacturing-led, broad-based employment transformation हुआ?
यही वह प्रश्न है जिस पर कांग्रेस आलोचना कर रही है और जिस पर अलग-अलग रोजगार सर्वेक्षणों तथा औद्योगिक आंकड़ों को साथ देखकर निष्कर्ष निकालना जरूरी है।
MoSPI की Annual Survey of Industries (ASI) मुख्य रूप से पंजीकृत/फैक्टरी क्षेत्र के विनिर्माण को कवर करती है और रोजगार, उत्पादन, GVA तथा पूंजी निर्माण जैसे संकेतक देती है। इसलिए इससे formal factory sector की तस्वीर मिलती है, लेकिन इसे पूरे informal manufacturing sector का पूर्ण प्रतिनिधि मानना उचित नहीं होगा।
विनिर्माण का GDP में हिस्सा—यही सबसे बड़ी बहस है‘मेक इन इंडिया’ के संदर्भ में सबसे अधिक चर्चा इस बात की रही है कि भारत की अर्थव्यवस्था में manufacturing का हिस्सा कितना बढ़ा। नवीनतम Economic Survey 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार FY2025 में manufacturing का nominal GDP में हिस्सा लगभग 12.6% था और FY2026 के first advance estimates में यह करीब 12.8% है। इसके विपरीत services का हिस्सा FY2026 में लगभग 51.1% है।
यही तथ्य कांग्रेस के तर्क को समझने में महत्वपूर्ण है: यदि लक्ष्य भारत को एक प्रमुख global manufacturing hub बनाना था, तो सवाल केवल उत्पादन बढ़ने का नहीं बल्कि कुल अर्थव्यवस्था में manufacturing का relative weight बढ़ने का भी है। दूसरी ओर, सरकार यह तर्क दे सकती है कि केवल GDP share ही manufacturing performance का पर्याप्त मापदंड नहीं है। उदाहरण के लिए, electronics, defence, pharmaceuticals और automobiles जैसे क्षेत्रों में उत्पादन तथा निर्यात क्षमता का विस्तार हुआ है, भले ही समग्र GDP में manufacturing की हिस्सेदारी में बहुत बड़ा बदलाव न हुआ हो।इसलिए ‘उत्पादन बढ़ा या नहीं’ और ‘भारत manufacturing-led economy बन पाया या नहीं’—ये दो अलग प्रश्न हैं।
निजी निवेश पर कांग्रेस का दावा
रमेश का दूसरा बड़ा आरोप है कि ‘मेक इन इंडिया’ से अपेक्षित private investment boom नहीं आया। यहां भी तस्वीर मिश्रित है।भारत में कुल निवेश गतिविधि में सरकारी पूंजीगत व्यय की भूमिका पिछले वर्षों में काफी बढ़ी है। हाल की सरकारी आर्थिक नीति का एक घोषित उद्देश्य यह भी रहा है कि public capex के माध्यम से infrastructure और demand को मजबूत करके private investment को आकर्षित किया जाए। सितंबर 2026 में Chief Economic Adviser ने भी कहा कि भारत के विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिए केवल सरकारी खर्च पर्याप्त नहीं होगा और निजी क्षेत्र के निवेश को और मजबूत करना आवश्यक है।