मुनमुन, सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : पश्चिम बंगाल में बंद और बदहाल पड़े सरकारी व सरकारी सहायताप्राप्त स्कूलों की स्थिति सुधारने के लिए स्कूल शिक्षा विभाग ने बड़ा कदम उठाया है। सभी जिला मजिस्ट्रेटों की अगुवाई में विशेष कमेटियों का गठन किया गया है जो इन स्कूलों के बुनियादी ढांचे, भूमि रिकॉर्ड और संपत्ति की जांच कर एक महीने के भीतर रिपोर्ट सौंपेगी। हालिया रिपोर्ट में राज्य में 4 हजार से अधिक स्कूल खाली पाए गए थे, हालांकि शिक्षा मंत्री दीपक बर्मन ने स्पष्ट किया था कि इनमें कई निजी स्कूल भी शामिल हैं जिन्होंने पोर्टल पर डेटा अपलोड नहीं किया था।
बंद स्कूलों में खुलेंगे स्वास्थ्य केंद्र या ट्रेनिंग सेंटर
कमेटियों को यह निर्देश दिए गए हैं कि वे यह जांच करें कि क्या इन परिसरों में दोबारा स्कूल शुरू करना संभव है या नहीं। यदि किसी स्कूल को चलाना मुमकिन नहीं है, तो स्थानीय जरूरतों के मुताबिक उस संपत्ति का उपयोग स्वास्थ्य केंद्र या ट्रेनिंग सेंटर जैसे सार्वजनिक सेवा केंद्रों के रूप में करने पर विचार किया जाएगा। यह पूरी प्रक्रिया सरकारी पहल के बजाय पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल के तहत संचालित की जाएगी, ताकि बेकार पड़ी सरकारी संपत्तियों का सही और उपयोगी तरीके से फिर से उपयोग किया जा सके।
सरकारी स्कूलों के निजीकरण पर छिड़ी बहस
इस नीति के सामने आते ही शिक्षा जगत में सरकारी स्कूलों के निजीकरण को लेकर गंभीर बहस छिड़ गई है। डीएसओ के राज्य सचिव विश्वजीत रॉय ने कड़ा विरोध जताते हुए आरोप लगाया है कि लंबे समय से बुनियादी ढांचे और शिक्षकों की कमी के कारण सरकारी स्कूलों की स्थिति खराब हुई है और अब सरकार इन्हें पीपीपी मॉडल के नाम पर निजी संगठनों को सौंपकर बेचना चाहती है। इस फैसले के खिलाफ डीएसओ ने 26 सितंबर को विद्यासागर के जन्मदिन से ''सरकारी स्कूल बचाओ'' अभियान शुरू करने का ऐलान किया है, जिसके तहत हस्ताक्षर अभियान और विरोध प्रदर्शन किए जाएंगे।