केडी पार्थ, सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : विरासत और समुदाय के एक भावपूर्ण उत्सव में उत्तर कोलकाता की चिरस्थायी गलियों ने शनिवार को संस्कृतियों का अनूठा संगम देखा। चलताबागान दुर्गा पूजा पंडाल दुनिया भर के राजनयिकों और उच्चायुक्तों के लिए ऐसा सेतु बन गया, जहां उन्होंने इस ऐतिहासिक मोहल्ले की आत्मा से जुड़कर बीते हुए कोलकाता के काव्यात्मक आकर्षण को करीब से महसूस किया।
यूके से यूक्रेन तक—दुनिया हुई एक मंच पर
यूनाइटेड किंगडम, एस्टोनिया, फ्रांस, ग्वाटेमाला, इटली, श्रीलंका और यूक्रेन के दूतावासों से आए प्रतिनिधिमंडल का स्वागत समिति के अध्यक्ष संदीप भूतोरिया ने किया।
महामहिमों की सूची में शामिल थे—
-ब्रिटिश उप-उच्चायुक्त एंड्रयू फ्लेमिंग
-एस्टोनिया की राजदूत मार्जे लूप
-ग्वाटेमाला के राजदूत उमर लिसेंड्रो कास्टानेडा सोलारेस
-इटली के राजदूत एंटोनियो एनरिको बार्टोली
-श्रीलंका की उच्चायुक्त प्रदीपा महिशिनी कोलोन
-यूक्रेन के राजदूत ओलेक्सांद्र पोलिशचुक
इसके अलावा ब्रिटिश काउंसिल की कंट्री डायरेक्टर एलिसन बैरेट, फ्रांस के महावाणिज्य दूत थिएरी मोरेल, जर्मनी की उप-वाणिज्य दूत गैबी मैनिग और संयुक्त राष्ट्र के निदेशक डैरिन फैरेंट जैसी हस्तियां भी मौजूद रहीं।
पंडाल की थीम—‘भाषा’ और ‘जड़ें’ का संगम
इस वर्ष का पंडाल दोहरी थीम “बांग्ला भाषा का विकास” और “मूल (जड़ें)” पर आधारित एक कलात्मक कृति के रूप में सजा है। पुराने उत्तर कोलकाता की स्थापत्य आत्मा—हवेलियाँ, विरासती इमारतें और संकरी गलियाँ—को बड़ी बारीकी से पुनर्जीवित किया गया है। यह नज़ारा विदेशी मेहमानों को तस्वीरें और सेल्फी लेने से रोक न सका।
“यह सिर्फ़ गलियाँ नहीं, आत्मा की यात्रा है”
संदीप भूतोरिया ने कहा, “श्यामबाजार से शोभाबाजार तक इन संकरी, घुमावदार गलियों से होकर चलना सिर्फ़ भूगोल की नहीं, बल्कि शहर की आत्मा की यात्रा है। बालकनी और बरामदे सिर्फ़ वास्तुकला नहीं, बल्कि हमारी ‘रोवक अड्डा’ संस्कृति के केंद्र थे—वे जीवंत अनौपचारिक बातचीतें जिन्होंने हमारे सामुदायिक बंधनों को मज़बूत किया।” उन्होंने मोहल्ले की बदलती पहचान पर चिंता जताते हुए कहा कि शहरीकरण के साथ ये ऐतिहासिक स्थल खोने का खतरा बढ़ रहा है।
1943 से अब तक—चलताबागान की विरासत
ऐतिहासिक रूप से ‘लोहापट्टी’ नामक इलाके में 1943 में स्थापित, चलताबागान दुर्गा पूजा परंपरा का मजबूत प्रहरी बनी हुई है। यूनेस्को मान्यता प्राप्त इस सांस्कृतिक धरोहर को दुनिया तक पहुँचाने के उद्देश्य से इस बार विदेशी मेहमानों को विशेष आमंत्रण दिया गया था। -एक शाम के लिए यह पंडाल सबको याद दिला गया कि शहर बदल सकते हैं, पर संस्कृति और समुदाय की जड़ें अब भी गहरी हैं।