गुवाहाटी : असम में कैंसर उपचार की सुविधाओं का विस्तार होने के बावजूद दुनियाभर में कैंसर की आनुवंशिक और आणविक जांच तक पहुंच में बड़ी असमानता बनी हुई है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के अनुसार, राज्य में ‘असम कैंसर केयर फाउंडेशन’ के 12 विशेषीकृत केंद्रों ने करीब चार वर्षों में लगभग 15 लाख मरीजों को परामर्श, जांच से लेकर कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी और सर्जरी तक की सेवाएं दी हैं। वहीं, ‘द लैंसेट ऑन्कोलॉजी’ के विशेषज्ञ आयोग ने कहा है कि सटीक कैंसर उपचार के लिए जरूरी जीनोमिक जांच का लाभ निम्न और मध्यम आय वाले देशों में अब भी सीमित है।
करीब 15 लाख मरीजों को मिली सेवाएं
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने बृहस्पतिवार रात ‘असम कैंसर केयर फाउंडेशन’ के बोर्ड और वार्षिक आम बैठक की अध्यक्षता की। बैठक में राज्य में कैंसर उपचार तथा इससे जुड़ी स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए चल रही विभिन्न पहलों की प्रगति की समीक्षा की गई। सरमा ने सोशल मीडिया पर कहा, “मुझे सबसे ज्यादा जिस आंकड़े ने प्रभावित किया, वह यह है कि स्थापना के करीब चार वर्षों में ही हमारे अस्पतालों ने करीब 15 लाख मरीजों को परामर्श और जांच से लेकर कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी और सर्जरी तक की सेवाएं प्रदान की हैं।” मुख्यमंत्री ने कहा कि इस आंकड़े के पीछे वे मरीज हैं, जिन्हें अपने घर के नजदीक गुणवत्तापूर्ण कैंसर उपचार उपलब्ध हुआ। उनके अनुसार, इससे ऐसे मरीजों को इलाज के लिए असम से बाहर जाने की जरूरत कम हुई है, जो कुछ वर्ष पहले आम स्थिति थी।
पांच नए कैंसर अस्पतालों का विस्तार
सरमा ने कहा कि राज्य सरकार मौजूदा नेटवर्क में पांच और कैंसर अस्पताल जोड़ने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने अधिकारियों को धुबरी, नलबाड़ी, नगांव, शिवसागर और गोलपाड़ा में प्रस्तावित नए कैंसर देखभाल अस्पतालों का निर्माण कार्य तेजी से पूरा करने का निर्देश दिया। नए केंद्रों के जुड़ने से राज्य के विभिन्न हिस्सों में कैंसर की जांच और उपचार की सुविधाओं को मरीजों के और करीब ले जाने की योजना है। मौजूदा नेटवर्क में परामर्श, जांच, कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी और सर्जरी जैसी सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।
असम सरकार और टाटा ट्रस्ट्स की संयुक्त पहल
‘असम कैंसर केयर फाउंडेशन’ असम सरकार और टाटा ट्रस्ट्स की संयुक्त पहल है। इसका उद्देश्य राज्य में कैंसर देखभाल का ऐसा नेटवर्क विकसित करना है, जिससे मरीजों को सुलभ और किफायती उपचार मिल सके। राज्य में कैंसर के इलाज के लिए विकसित किए जा रहे इस नेटवर्क का एक प्रमुख उद्देश्य उपचार के लिए मरीजों की दूसरे राज्यों पर निर्भरता कम करना भी है। मुख्यमंत्री ने नए केंद्रों के निर्माण में तेजी लाने पर जोर दिया है।
जीनोमिक जांच तक पहुंच में वैश्विक असमानता
इसी बीच, ‘द लैंसेट ऑन्कोलॉजी’ की ओर से गठित विशेषज्ञ आयोग ने कैंसर की आनुवंशिक जांच और उसके अनुरूप उपचार तक पहुंच को लेकर वैश्विक स्तर पर गंभीर असमानताओं की पहचान की है। आयोग के अनुसार, बायोमार्कर आधारित कैंसर परीक्षणों में से केवल करीब दो प्रतिशत परीक्षण निम्न एवं मध्यम आय वाले देशों (एलएमआईसी) में किए जाते हैं, जबकि लगभग 81 प्रतिशत परीक्षण उच्च आय वाले देशों में होते हैं। इससे कैंसर की सटीक चिकित्सा में देशों और आबादी के बीच मौजूद संसाधन संबंधी अंतर सामने आता है। आयोग ने क्लिनिकल परीक्षणों, जीनोमिक डेटासेट और राष्ट्रीय कैंसर कार्यक्रमों से संबंधित वैश्विक आंकड़ों का विश्लेषण किया है।
हर साल 70-80 लाख मरीजों को जांच की जरूरत
विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया है कि दुनियाभर में कैंसर से पीड़ित करीब 70 से 80 लाख लोगों को हर साल मानक उपचार के तहत आणविक जांच की आवश्यकता होती है। हालांकि, विशेष रूप से निम्न और मध्यम आय वाले देशों में इन जांचों की उपलब्धता अभी सार्वभौमिक नहीं है। आयोग ने कहा कि कैंसर उपचार में जीनोमिक और आणविक जांच का महत्व बढ़ रहा है। इन जांचों के जरिए कुछ मरीजों के कैंसर की जैविक विशेषताओं को समझने और उसके अनुरूप उपचार तय करने में मदद मिल सकती है। लेकिन ऐसी सुविधाओं की उपलब्धता और उन्हें वहन करने की क्षमता देशों के बीच काफी अलग है।
अंडाशय कैंसर में भी बड़ी जांच कमी
आयोग ने अंडाशय के कैंसर का उदाहरण देते हुए बताया कि हर वर्ष अनुमानित 3.14 लाख महिलाओं को बीआरसीए जीन की जांच की आवश्यकता होती है। हालांकि, इनमें से करीब आधी महिलाओं की यह जांच नहीं हो पाती। रिपोर्ट के अनुसार, जांच में यह कमी मुख्य रूप से निम्न और मध्यम आय वाले देशों में सुविधाओं की सीमित उपलब्धता से जुड़ी है। इससे यह सवाल उठता है कि आधुनिक कैंसर उपचार की तकनीकें विकसित होने के बावजूद उनका लाभ दुनिया की सभी आबादी तक समान रूप से क्यों नहीं पहुंच पा रहा है।
कैंसर दवाओं पर खर्च भी तेजी से बढ़ा
आयोग ने कैंसर उपचार की बढ़ती लागत को भी रेखांकित किया। उसके अनुसार, कैंसर की दवाओं पर वैश्विक खर्च पिछले पांच वर्षों में करीब 75 प्रतिशत बढ़कर 2024 में अनुमानित 252 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया। यह खर्च 2029 तक बढ़कर करीब 441 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। विशेषज्ञों ने इसे सटीक चिकित्सा के विस्तार से जुड़ी चुनौती के रूप में देखा है। उनके अनुसार, प्रिसिजन ऑन्कोलॉजी के विस्तार से उपचार के नए विकल्प उपलब्ध हुए हैं, लेकिन इसके साथ लागत और स्वास्थ्य प्रणालियों की जटिलता भी बढ़ी है।
प्राथमिकता वाली जांच के लिए रूपरेखा
आयोग ने स्वास्थ्य प्रणालियों को कैंसर की आणविक जांच और उससे जुड़े उपचारों को प्राथमिकता देने में मदद करने के लिए एक रूपरेखा प्रस्तावित की है। इसका उद्देश्य उपलब्ध संसाधनों के आधार पर यह तय करने में सहायता करना है कि किन जांचों और उपचारों को पहले लागू किया जाना चाहिए। इसके साथ ही आयोग ने स्वास्थ्य प्रणालियों की तैयारी का आकलन करने के लिए एक उपकरण सुझाया है। इसमें स्वास्थ्य कर्मियों की आवश्यक दक्षताओं की रूपरेखा तथा कैंसर से जुड़े आंकड़ों को जिम्मेदारी के साथ साझा करने के सिद्धांत भी शामिल हैं। इस तरह असम में कैंसर उपचार के लिए स्थानीय स्तर पर सुविधाओं का विस्तार और वैश्विक स्तर पर उन्नत आनुवंशिक जांच की असमान उपलब्धता कैंसर देखभाल के दो अलग-अलग पहलुओं को सामने रखते हैं—एक ओर मरीजों तक उपचार पहुंचाने के लिए बुनियादी और विशेषीकृत केंद्रों का विस्तार, वहीं दूसरी ओर आधुनिक जांच और व्यक्तिगत उपचार तकनीकों को सभी आय वर्ग और देशों तक समान रूप से पहुंचाने की चुनौती।