प्रसेनजीत, सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : भारतीय संगीत जगत आज एक ऐसे सुर की खामोशी का गवाह बना है, जिसने दशकों तक हर दिल में धड़कन की तरह जगह बनाई। स्वर कोकिला आशा भोंसले (1933-2026) का निधन केवल एक कलाकार का जाना नहीं, बल्कि उस युग का अंत है, जिसने संगीत को सरहदों, भाषाओं और सियासत से ऊपर रखा। आशा भोंसले की पहचान सिर्फ उनकी बहुरंगी आवाज़ नहीं थी, बल्कि उनके विचारों की दृढ़ता भी थी।
करीब डेढ़ दशक पहले अगस्त 2012 का वह प्रसंग आज फिर यादगर है, जब उन्होंने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) की धमकियों के आगे झुकने से साफ इनकार कर दिया था। मामला था मशहूर टीवी शो 'सूर-क्षेत्र' का, जिसमें पाकिस्तान के दिग्गज कलाकार—रूना लैला और बेगम आबिदा परवीन भी शामिल थीं। एमएनएस, जिसके प्रमुख राज ठाकरे हैं, ने इस शो का विरोध करते हुए इसे रुकवाने की चेतावनी दी थी।लेकिन आशा जी ने अपने अंदाज़ में स्पष्ट कहा—“मैं एक गायिका हूं, कोई राजनेता नहीं। मैं सिर्फ संगीत की भाषा समझती हूं, राजनीति की नहीं।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि उन्हें महाराष्ट्र से प्रेम है और वे एक गर्वित मराठी हैं, साथ ही राज ठाकरे के प्रति सम्मान भी व्यक्त किया। यह संतुलन उनके व्यक्तित्व की खूबसूरती को दर्शाता है—जहां असहमति के बावजूद संवाद और सम्मान बना रहता है।
धमकियों और दबाव के बावजूद उन्होंने 'सूर क्षेत्र' में अपनी भूमिका जारी रखी। यह केवल एक शो में बने रहने का फैसला नहीं था, बल्कि कला की स्वतंत्रता के पक्ष में खड़ा होने का साहसिक उदाहरण था। उस समय एमएनएस का यह रुख व्यापक अभियान का हिस्सा था, जो भारतीय मंचों पर पाकिस्तानी कलाकारों के खिलाफ था, लेकिन आशा जी ने कला को राजनीति से अलग रखने की अपनी प्रतिबद्धता में कायम रही। यही नहीं, आशा भोंसले ने कभी किसी राजनीतिक दल का दामन नहीं थामा, लेकिन लोकतंत्र में उनकी गहरी आस्था थी। मुंबई में हर चुनाव, चाहे वह विधानसभा, लोकसभा या नगरपालिका चुनाव हो, में सक्रियता और मतदान करना उन्होंने अपना कर्तव्य माना। यह दिखाता है कि वे एक जागरूक नागरिक भी थीं, जो अपने अधिकार और जिम्मेदारियों को बराबरी से निभाती थीं। आज जब 92 वर्ष के उमर में उनकी आवाज़ खामोश हो गई है, तो उनके सुर और उनके विचार दोनों हमें याद दिलाते हैं—संगीत की कोई सरहद नहीं होती, और सच्चा कलाकार वही है जो हर विभाजन से ऊपर उठकर इंसानियत की धुन छेड़ता है।