मुंबई : केंद्र सरकार ने बंबई उच्च न्यायालय को सूचित किया है कि अग्निवीरों का दर्जा नियमित सैनिकों के समान नहीं है, लिहाजा युद्ध या सैन्य अभियान के दौरान उनकी मृत्यु होने पर उनके परिजन पेंशन लाभों में समानता का दावा नहीं कर सकते।
केंद्र सरकार ने जान गंवाने वाले एक अग्निवीर मुरली नाइक की मां ज्योतिबा नाइक की याचिका के खिलाफ पिछले सप्ताह दायर एक हलफनामे में दलील दी कि यह असमानता संवैधानिक रूप से वैध है, क्योंकि अग्निपथ योजना वर्तमान राष्ट्रीय सुरक्षा आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई एक अल्पकालिक भर्ती योजना है।
पिछले वर्ष मई में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान जम्मू-कश्मीर में सीमा पार से हुई गोलीबारी के दौरान अग्निवीर मुरली नाइक की मृत्यु हो गई थी। उनकी मां की याचिका में मुरली की मृत्यु होने के बाद नियमित सैनिकों के समान लाभ देने की मांग की गई है।
हलफनामे में कहा गया है कि अग्निवीरों की सेवाएं चार वर्ष के लिए ली जाती हैं और पेंशन लाभ या अन्य पारिश्रमिक दीर्घकालिक सेवाएं देने वाले सशस्त्र बलों के कर्मियों के लिए हैं।
सरकार ने अपने हलफनामे में कहा, ‘‘दो अलग-अलग श्रेणियों के व्यक्तियों के बीच समानता नहीं हो सकती। यह वर्गीकरण और भेदभाव अग्निपथ योजना के उद्देश्यों के साथ एक तार्किक संबंध रखते हैं और इसलिए, भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत संवैधानिक रूप से वैध हैं।’’