दत्तक माताओं के हक में सुप्रीम कोर्ट ने दिया बड़ा फैसला। 
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मां तो मां होती है: सुप्रीम कोर्ट ने दत्तक मां को भी दिया मैटरनिटी लीव का अधिकार

कोर्ट का केंद्र को सुझाव : बच्चा होने पर मां ही नहीं, पिता को भी मिले छुट्टी। कोर्ट ने किया तीन महीने से कम उम्र के बच्चों को गोद लेने पर ही मातृत्व अवकाश वाला कानून रद्द

नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने बच्चे को गोद लेना प्रजनन स्वायत्तता के अधिकार का हिस्सा बताते हुए मंगलवार को उस कानून को रद्द कर दिया जिसमें कहा गया था कि किसी महिला को मातृत्व अवकाश तभी मिलेगा जब वह तीन महीने से कम आयु के बच्चे को कानूनी रूप से गोद ले। सुप्रीम कोर्ट ने साथ ही केंद्र से पितृत्व अवकाश (पैटरनिटी लीव) को मान्यता देने वाला कानून बनाने का सुझाव देते हुए कहा कि पिता भी छोटे बच्चों के देखभाल करते हैं और समाज में उनकी भूमिका को कानूनी रूप से स्वीकार किया जाना चाहिए। कोर्ट ने जोर दिया कि पितृत्व अवकाश को सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।

धारा 60(4) मौलिक अधिकारों का उल्लंघन

न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन के पीठ ने अधिवक्ता हम्सानंदिनी नंदूरी द्वारा दायर याचिका, जिसमें सामाजिक सुरक्षा संहिता की धारा 60(4) को चुनौती दी गयी थी, पर उक्त व्यवस्था दी। इस धारा के तहत दत्तक मां को 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश तभी मिलता था, जब वह तीन महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेती। पीठ ने कहा कि गोद लेने वाली मां को बच्चे की उम्र की परवाह किये बिना 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश मिलना चाहिए। पीठ ने कहा कि 2020 संहिता की धारा 60(4) संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है।

पितृत्व अवकाश पर जोर

शीर्ष न्यायालय ने केंद्र से यह भी कहा कि वह पितृत्व अवकाश को सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता देने के लिए प्रावधान लाये। पीठ ने केंद्र को सुझाव दिया कि अवकाश की अवधि माता-पिता और बच्चे दोनों की जरूरतों के अनुरूप तय की जाये। भारत में वर्तमान में महिलाओं के लिए 26 सप्ताह तक का सशुल्क मातृत्व अवकाश उपलब्ध है लेकिन पितृत्व अवकाश के लिए कोई राष्ट्रीय कानून नहीं है, जो लैंगिक समानता की दिशा में एक कमी है।

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