फाग: अंडमान-निकोबार की जीवंत लोकसंगीत परंपरा
1900 से पूर्व बसे लोग लेकर आए थे फाग गीत
सन्मार्ग संवाददाता
श्री विजयपुरम : अंमान तथा निकोबार द्वीपसमूह के पर्यटन विभाग द्वारा ’’कालापानी फाग मंडली’’ के सहयोग से शनिवार शाम ’’मरीना एस्प्लेनेड’’ में फाग पर आधारित सांस्कृतिक संध्या का सफल आयोजन किया गया। फाग एक दुर्लभ एवं जीवंत लोकसंगीत परंपरा है, जो अण्डमान तथा निकोबार द्वीपसमूह के सांस्कृतिक इतिहास में गहराई से जुड़ी हुई है। फाग लोकगायन की एक पारंपरिक शैली है, जिसे 1900 से पूर्व प्रारंभिक बसने वाले लोग द्वीपों पर लेकर आए थे और तब से यह द्वीपसमूह की मिश्रित सांस्कृतिक विरासत की एक महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति बन गया है। यह परंपरा विशेष रूप से वसंत पंचमी से होली तक के पर्वकाल (फागुन माह) से जुड़ी होती है। फाग गीत सामूहिक रूप से समूहों में गाए जाते हैं तथा इनमें ऋतु परिवर्तन, भक्ति, सामाजिक सद्भाव, प्रेम, प्रकृति और जीवन उत्सव जैसे विषयों पर आधारित रचनाएं होती हैं। पुराने समय में फाग गीत गांवों के आंगनों और खुले स्थानों में सूर्यास्त के बाद गूंजते थे, जो लोगों को संगीत एवं कथा के माध्यम से एक साथ जोड़ते थे।
मधुर लेकिन प्रभावशाली धुनों, तालबद्ध ताली और सामूहिक गायन ने श्रोताओं को एक शांत एवं भावनात्मक अनुभव प्रदान किया, जो उन्हें सरल और सामंजस्यपूर्ण जीवनशैली की अनुभूति कराता है। यह अनुभव आज भी उन पर्यटकों को आकर्षित करता है जो समुद्र और तटों से परे द्वीपों की वास्तविक सांस्कृतिक पहचान को जानना चाहते हैं। कार्यक्रम के माध्यम से इस अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण के महत्व को उजागर किया गया, जो आधुनिक जीवनशैली एवं बदलाव के कारण धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है। फाग को स्थानीय लोगों एवं पर्यटकों के समक्ष प्रस्तुत कर द्वीपों की जीवंत सांस्कृतिक विरासत की झलक दिखाई गई और पारंपरिक कला रूपों के संरक्षण की आवश्यकता को पुनः रेखांकित किया गया। इस सांस्कृतिक संध्या में जनता की उत्साहपूर्ण भागीदारी रही और इसे द्वीपों की इस पारंपरिक लोक परंपरा के पुनर्जीवन एवं प्रचार-प्रसार के लिए व्यापक रूप से सराहा गया।