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सियांगमी मिथुन का जीनोम डिकोड, संरक्षण को आधार

पहली बार सफलतापूर्वक पूरा किया गया पूरे जीनोम का अध्ययन

ईटानगर : अरुणाचल प्रदेश के सियांग क्षेत्र के अर्ध-पालतू मिथुन पर पहली बार पूरे जीनोम का अध्ययन सफलतापूर्वक पूरा किया गया है। वैज्ञानिकों ने करीब 50 लाख उच्च-गुणवत्ता वाले जेनेटिक मार्कर की पहचान कर इस विशिष्ट आबादी के संरक्षण, वैज्ञानिक प्रजनन और भविष्य में नस्ल के रूप में पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण आधार तैयार किया है। अरुणाचल प्रदेश के सियांग क्षेत्र के मिथुन पर किए गए अध्ययन में 11 मिथुन के पूरे जीनोम की सीक्वेंसिंग की गई। शोधकर्ताओं ने लगभग 50 लाख जेनेटिक मार्कर की पहचान की, जो इस आबादी की अब तक की सबसे विस्तृत जीनोमिक प्रोफाइल मानी जा रही है।

संरक्षण और प्रजनन को नई दिशा

यह अध्ययन मिथुन के संरक्षण, जीनोम आधारित चुनिंदा प्रजनन और नस्ल सुधार की वैज्ञानिक नींव रखता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि इससे भविष्य में बेहतर प्रजनन रणनीतियां तैयार करने में मदद मिलेगी।

भौगोलिक अलगाव से बनी पहचान

पूर्वी सियांग और लेपा राडा जिलों के गांवों में सदियों से अलग-थलग पाले जाने के कारण इस आबादी का एक विशिष्ट जीन पूल विकसित हुआ है। वैज्ञानिक फिलहाल इसे अस्थायी रूप से "सियांगमी मिथुन" नाम दे रहे हैं।

इनब्रीडिंग के नहीं मिले संकेत

अध्ययन में मिथुन आबादी में मध्यम स्तर की जेनेटिक विविधता पाई गई और हाल के समय में इनब्रीडिंग के कोई संकेत नहीं मिले। इससे स्पष्ट होता है कि वैज्ञानिक योजना के जरिए इसकी जेनेटिक सेहत को और मजबूत किया जा सकता है।

भविष्य की रणनीति हुई तैयार

शोधकर्ताओं ने गांवों के बीच प्रजनन करने वाले नर मिथुन के आदान-प्रदान, जीनोम आधारित प्रजनन कार्यक्रम और व्यवस्थित वंशावली रिकॉर्ड रखने की सिफारिश की है। इससे भविष्य में जेनेटिक विविधता बनी रहेगी और इनब्रीडिंग का खतरा घटेगा।

सांस्कृतिक धरोहर बचाने पर जोर

भारत में लगभग 3.84 लाख मिथुन हैं, जिनमें करीब 70 प्रतिशत अरुणाचल प्रदेश में पाए जाते हैं। स्थानीय समुदायों के लिए मिथुन केवल पशुधन नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान का प्रतीक है। वैज्ञानिकों का मानना है कि पारंपरिक पालन-पोषण और आधुनिक जीनोमिक विज्ञान के समन्वय से सियांग क्षेत्र की इस अनूठी जेनेटिक विरासत को सुरक्षित रखा जा सकेगा।


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