नयी दिल्ली : हॉकी अंपायरिंग को बेहद कठिन और संघर्षपूर्ण करियर बताते हुए भारतीय दिग्गजों ने नीदरलैंड और बेल्जियम में 15 अगस्त से शुरू हो रहे विश्व कप में करीब तीन दशक बाद एक भी भारतीय अंपायर नहीं होने पर निराशा जतायी। इसके साथ ही कहा कि अंपायरों की संख्या बढाने की बजाय गुणवत्ता पर फोकस करना होगा। नीदरलैंड के यूट्रेक्ट में 1998 में हुए विश्व कप के बाद पहली बार टूर्नामेंट के अंपायरों या तकनीकी अधिकारियों में किसी भारतीय को जगह नहीं मिली है और सूची में यूरोपीय देशों का बोलबाला है। भारत के आरवी रघु प्रसाद (2010, 2014, 2018, 2023), सतिंदर शर्मा (2002, 2006, 2010), तरलोक सिंह भुल्लर (1994) और अमरजीत सिंह बावा (1990) विश्व कप में अंपायरिंग कर चुके हैं।
पिछले साल 47 वर्ष की उम्र होने पर रिटायर होने से पहले ओलंपिक समेत 200 मैचों में अंपायरिंग करने वाले पहले एशियाई रघुप्रसाद ने भाषा से बातचीत में कहा, ‘बड़े टूर्नामेंटों में अंपायरों की नियुक्तियां FIH अंपायरिंग समिति करती है जिसके लिये पिछले बड़े टूर्नामेंटों, प्रो लीग वगैरह में प्रदर्शन मानदंड रहता है ।’ वहीं कई ओलंपिक और विश्व कप में अंपायरिंग कर चुके शर्मा ने कहा, ‘बावा सर, भुल्लर सर के बाद मैने और रघु ने यह सिलसिला कायम रखा था। हमने यूरोपीयों के बीच जाकर अपनी पहचान बनाई थी जो आसान नहीं थी।’ उन्होंने कहा, ‘बीजिंग ओलंपिक 2008 में हमारी टीम क्वालीफाई नहीं कर सकी थी लेकिन मैं अकेला अधिकारी था जो भारतीय हॉकी का प्रतिनिधि था।
चयन के लिये प्रदर्शन में निरंतरता और अनुभव काफी मायने रखता है जहां मुझे लगता है कि अब हम पिछड़ रहे हैं।’ हॉकी इंडिया की वेबसाइट पर मई 2025 में अपडेट की गई सूची के अनुसार अंपायरों की चार श्रेणियां ‘कोर लीडिंग पैनल’, ‘लीडिंग पैनल’, ‘हाई पोटेंशियल’ और ‘नेशनल अंपायर’ हैं जिनमें पुरुष वर्ग में क्रमश: 100 से अधिक और महिला वर्ग में 70 से अधिक नाम दर्ज हैं। पुरुष वर्ग में छह FIH पैनल के अंपायर हैं जिनमें से रघुप्रसाद पिछले साल रिटायर हो चुके हैं। वहीं महिला वर्ग में FIH पैनल की चार अंपायर हैं। तकनीकी अधिकारियों में महिला वर्ग में इन्हीं चार श्रेणियों में 50 से अधिक नाम हैं लेकिन FIH पैनल में सिर्फ दो अधिकारी रोहिणी बोपन्ना और सोनिया बाथला हैं। पुरुष वर्ग में करीब 70 नाम हैं लेकिन FIH पैनल के चार ही अधिकारी इसमें शामिल हैं।
शर्मा ने कहा कि संख्या की बजाय गुणवत्ता पर फोकस करना जरूरी है और इसके लिये अंपायरों को अधिक एक्सपोजर देना होगा। उन्होंने कहा, ‘घरेलू अंपायर बड़े टूर्नामेंटों में अंपायरिंग नहीं करेंगे तो अंतरराष्ट्रीय स्तर का अनुभव कैसे मिलेगा। घरेलू और अंतरराष्ट्रीय अंपायरिंग में जमीन आसमान का फर्क है। भारतीय टीमों के शिविर में भी अंपायरों को साथ रखा जाना चाहिये। हमारे पास प्रतिभा की कमी नहीं है लेकिन अंपायरों को भी मेहनत करनी होगी और महासंघ को इसमें सहयोग देना होगा।’ उन्होंने कहा, ‘अंपायरों के विकास के लिये सही प्लानिंग और ढांचे की जरूरत है ताकि अगले विश्व कप या ओलंपिक में हमारा प्रतिनिधित्व रहे।’
1994 में अंपायरिंग से विदा ले चुके बावा भारतीय टीम के साथ दौरों पर जाते थे जिसमें 1981 का यूरोप दौरा और 1983 में पाकिस्तान में टेस्ट सीरीज शामिल है। लाहौर विश्व कप 1990 और सियोल ओलंपिक 1988 में अंपायरिंग कर चुके बावा ने कनाडा से भाषा से कहा, ‘उस दौर में अंपायरों को खेल का हिस्सा नहीं माना जाता था लेकिन मैने हालात बदलने की कोशिश की। जब मैने शुरूआत की जब 20 रूपये रोज भत्ता मिलता था जिसे केपीएस गिल के दौर में मैने बढवाकर 100 रुपये कराया।’ उन्होंने बताया, ‘तब अंपायरों को कोई पदक या सोवेनियर नहीं दिये जाते थे लेकिन 1977 में अमृतसर में रणजीत सिहं टूर्नामेंट के दौरान हमने सुनिश्चित कराया कि अंपायरों को भी सम्मान और स्मृति चिन्ह दिये जायें।’
तीनों दिग्गजों ने कहा कि इस पेशे में वित्तीय सुरक्षा नहीं है और महज जुनून के लिये वे इससे जुड़े रहे। शर्मा ने कहा, ‘हमारे समय में 150 या 200 रुपये रोज और अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में 40-50 डॉलर भत्ता मिलता था जो हमारा महासंघ ही देता था। अगर आप किसी टूर्नामेंट में तटस्थ हैं तो टूर्नामेंट का मेजबान बोर्डिंग, लॉजिंग और 40-50 डॉलर दैनिक भत्ता देता है। हमारे अधिकांश अंपायरों के पास नौकरी नहीं है और घरेलू टूर्नामेंटों पर ही काम चल रहा है।’ पिछले साल संन्यास के बाद काफी प्रयासों के बाद निजी नौकरी कर रहे रघु ने कहा, ‘जब तक अंपायरिंग की, उसी पर फोकस रहा और नौकरी के बारे में सोचा नहीं। केएसएचए में नौकरी निजी कारणों से छोड़नी पड़ी। अभी अपने प्रयासों से एक निजी नौकरी शुरू की है लेकिन उतनी कमाई नहीं है। कोई भी मां बाप ऐसे हालात में बच्चे को अंपायर क्यों बनाना चाहेंगे।’