गंगटोक : सिक्किम भूटिया लेप्चा एपेक्स कमेटी (सिबलैक) ने दार्जिलिंग और गोरखालैंड मुद्दे के स्थायी राजनीतिक समाधान को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच सिक्किम की क्षेत्रीय एवं संवैधानिक स्थिति से जुड़े मुद्दों पर राज्यपाल ओम प्रकाश माथुर का ध्यान आकर्षित किया है।
23 सितंबर 2026 को दिए गए ज्ञापन की प्रतियां केंद्रीय गृह मंत्री, सिक्किम के मुख्यमंत्री और केंद्रीय गृह सचिव को भी भेजी गई हैं। सिबलैक ने जुलाई में प्रसारित एक प्रारंभिक चर्चा मसौदे में पड़ोसी राज्यों से संबंधित संदर्भों पर स्पष्टता की मांग की है।
सिबलैक की मुख्य आपत्ति प्रारंभिक मसौदे में उल्लिखित ‘चौथे विकल्प’ या ‘ऑप्शन-4’ को लेकर है। संगठन के अनुसार, इसमें अलग उत्तर बंगाल राज्य तथा “पड़ोसी राज्यों के सन्निहित क्षेत्रों” को शामिल करने का उल्लेख था। सिबलैक ने कहा कि इस शब्दावली से सिक्किम के क्षेत्रीय हितों और संवैधानिक स्थिति को लेकर आशंकाएं उत्पन्न हुई हैं।
संगठन ने बताया कि प्रो. महेंद्र पी. लामा, जो सिक्किम के मुख्यमंत्री के मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं, ने बाद में सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया था कि प्रस्ताव में सिक्किम को शामिल करने का कोई इरादा नहीं था और ‘ऑप्शन-4’ को अगस्त 2026 में केंद्र को सौंपे गए अंतिम प्रस्ताव से हटा दिया गया था। इसके बावजूद सिबलैक ने प्रारंभिक प्रस्ताव किन लोगों के साथ साझा किया गया था और इसे बाद में क्यों वापस लिया गया, इस संबंध में औपचारिक लिखित स्पष्टीकरण की मांग की है।
ज्ञापन में सिबलैक ने गोरखा राष्ट्रीय कांग्रेस के कुछ सदस्यों के कथित बयानों का भी उल्लेख किया है, जिनमें राष्ट्रपति शासन के दौरान दार्जिलिंग के सिक्किम में विलय से संबंधित कथित सुझाव शामिल है। संगठन ने ऐसे बयानों की आधिकारिक पुष्टि किए जाने की मांग की है।
सिबलैक ने सार्वजनिक विमर्श में बार-बार उठने वाले ‘ग्रेटर नेपाल’ के संदर्भों का भी उल्लेख किया। हालांकि, संगठन ने स्पष्ट किया कि उसकी आपत्तियां नेपाली भाषी या गोरखा नागरिकों के विरुद्ध नहीं हैं।
संगठन ने भारत-नेपाल की खुली सीमा, नागरिकता एवं मतदाता सूचियों के निरंतर सत्यापन की आवश्यकता पर भी जोर दिया। ज्ञापन में सिक्किम की चीन, नेपाल और भूटान से लगती सीमाओं तथा रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सिलीगुड़ी कॉरिडोर से इसकी निकटता का उल्लेख करते हुए राज्य की संवेदनशील भौगोलिक स्थिति की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है।
सिबलैक ने संविधान के अनुच्छेद 371एफ(जी) का हवाला देते हुए राज्यपाल से इस मामले में राज्य सरकार से विस्तृत रिपोर्ट मांगने का आग्रह किया है। संगठन ने यह भी जानना चाहा है कि क्या सिक्किम के क्षेत्र से संबंधित किसी प्रस्ताव पर केंद्र सरकार के साथ चर्चा हुई है। आवश्यकता पड़ने पर मामले को राष्ट्रपति के समक्ष रखने का भी अनुरोध किया गया है।
साथ ही, सिबलैक ने सिक्किम सरकार से विधानसभा में सर्वदलीय प्रस्ताव लाने का आग्रह किया है, जिसमें यह स्पष्ट किया जाए कि अनुच्छेद 371एफ के तहत सिक्किम को प्राप्त संवैधानिक संरक्षण को सिक्किम की औपचारिक भागीदारी के बिना दार्जिलिंग से संबंधित किसी राजनीतिक समाधान का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता।
ज्ञापन पर सिबलैक के संयोजक एवं सिक्किम के पूर्व मंत्री त्सेतन ताशी भूटिया ने हस्ताक्षर किए हैं।
संगठन ने कहा कि वह दार्जिलिंग के लोगों की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का विरोध नहीं करता और न ही क्षेत्र के साथ टकराव चाहता है। हालांकि, उसका कहना है कि दार्जिलिंग से जुड़े किसी भी राजनीतिक समाधान में सिक्किम की संवैधानिक पहचान और क्षेत्रीय हितों को अलग से ध्यान में रखा जाना चाहिए।