अलीपुरदुआर/सिलीगुड़ी : एक अर्से के इंतजार के बाद आखिरकार बक्सा टाइगर रिजर्व के जंगल में रॉयल बंगाल टाइगर की वापसी का नया अध्याय शुरू हुआ। बिहार के वाल्मीकि टाइगर रिजर्व से लाई गई पहली रॉयल बंगाल टाइगरेस (बाघिन) को शुक्रवार को बक्सा के प्राकृतिक और खुले परिवेश में छोड़ा गया। इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी, केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव, राज्य के वन मंत्री मनोज कुमार उरांव व अन्य सम्मिलित रहे। इस कार्यक्रम के साथ ही बक्सा में चरणबद्ध टाइगर ऑगमेंटेशन एवं रिकवरी प्रोग्राम की शुरुआत हो गई। इसका उद्देश्य बक्सा में ऐसी बाघ आबादी तैयार करना है जो भविष्य में स्वतंत्र रूप से रह सके, प्रजनन कर सके और आत्मनिर्भर बन सके।
टाइगर रिजर्व से टाइगर हो गए गायब!
उल्लेखनीय है कि, बक्सा के विशाल घने जंगल को वर्ष 1983 में टाइगर रिजर्व घोषित किया गया था। उत्तर बंगाल के इस महत्वपूर्ण वन क्षेत्र का पारिस्थितिक जुड़ाव असम और भूटान के जंगलों से है। हालांकि, पिछले कई दशकों में आवास में बदलाव, जंगलों के विखंडन और शिकार प्रजातियों की उपलब्धता में कमी जैसी वजहों से यहां स्थायी बाघ आबादी कायम नहीं रह सकी। 2018 की बाघ गणना में बक्सा में कोई निवासी बाघ दर्ज नहीं किया गया था। हालांकि, गाहे-बगाहे कैमरा ट्रैप में पड़ोसी देश भूटान और पड़ोसी राज्य असम की ओर से बाघों की आवाजाही के प्रमाण मिलते रहे थे।
2018 से हुई नई कवायद की पहल
बक्सा में बाघों की वापसी की तैयारी अचानक शुरू नहीं हुई। वन विभाग के मुताबिक वर्ष 2018 से पश्चिम बंगाल सरकार, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण और भारतीय वन्यजीव संस्थान के सहयोग से विज्ञान आधारित तरीके से रिकवरी कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इसके तहत बाघों के लिए आवश्यक आवास को बेहतर बनाने, शिकार आधार बढ़ाने, सुरक्षा एवं निगरानी मजबूत करने और वैज्ञानिक मूल्यांकन पर काम किया गया। बाघों के लिए पर्याप्त शिकार आधार तैयार करने के उद्देश्य से पिछले आठ वर्षों में 800 से अधिक चीतल बक्सा में छोड़े गए हैं। वहीं करीब 380 हेक्टेयर घासभूमि को बहाल या विकसित किया गया है। दस्तावेज में बताया गया है कि वैज्ञानिक निगरानी के दौरान शिकार प्रजातियों की उपलब्धता में सकारात्मक रुझान सामने आया है। बक्सा में बाघों की प्राकृतिक आवाजाही के प्रमाण भी मिले हैं।
एक के बाद एक कैमरा ट्रैप से जगी उम्मीद
कैमरा ट्रैप में 2021, 2023 और 2026 में अलग-अलग मौकों पर नर बाघ दर्ज किए गए। उनमें 2023 में दर्ज एक बाघ की तस्वीर बाद में असम के मानस टाइगर रिजर्व के बाघ से फोटो-मैच हुई। इससे बक्सा और आसपास के जुड़े हुए वन क्षेत्रों के बीच बाघों की प्राकृतिक आवाजाही का प्रमाण मिला। इसी प्राकृतिक रिकवरी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए अब वाल्मीकि टाइगर रिजर्व से लाई गई बाघिन को बक्सा में छोड़ा गया है। बाघिन को पहले ट्रैंक्विलाइज कर सुरक्षित तरीके से बाहर निकाला गया। उसके बाद विशेष व्यवस्था के तहत उसे हवाई मार्ग से हांसीमारा लाया गया और वहां से विशेष पशु वाहन के जरिये बक्सा टाइगर रिजर्व पहुंचाया गया। निर्धारित प्रक्रिया के तहत शुक्रवार को उसे जंगल के प्राकृतिक परिवेश में छोड़ा गया। वहां अब बाघिन की गतिविधियों पर लगातार निगरानी रखी जा रही है। इसके लिए टेलीमेट्री, कैमरा ट्रैप और फील्ड आधारित मॉनिटरिंग का इस्तेमाल किया जा रहा है। उसके स्वास्थ्य, व्यवहार, आवाजाही और नए वातावरण में अनुकूलन क्षमता का वैज्ञानिक आकलन किया जाएगा। इस कार्यक्रम का उद्देश्य केवल बाघ को जंगल में छोड़ना नहीं, बल्कि उसके लिए लंबे समय तक टिकाऊ वातावरण तैयार करना है।
परियोजना के एक नहीं, कई पहलू
इस पूरी परियोजना में स्थानीय समुदाय की भागीदारी को भी महत्वपूर्ण माना गया है। वन विभाग सूत्रों के मुताबिक, बक्सा में 64 ईको-डेवलपमेंट कमेटियों/ज्वाइंट फॉरेस्ट मैनेजमेंट कमेटियों के साथ काम किया जा रहा है और पांच वर्षों में इन समितियों के साथ 3.8 करोड़ रुपये साझा किए गए हैं। रोजगार, कौशल विकास, जिम्मेदार पर्यटन, मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करना और स्थानीय समुदाय को संरक्षण प्रक्रिया से जोड़ना कार्यक्रम का हिस्सा है। बक्सा के कोर क्षेत्र से जुड़े गांवों के पुनर्वास का मुद्दा भी इस परियोजना का हिस्सा रहा है। योजना के तहत गांगुटिया और भूटिया बस्ती के दो गांवों को स्थानांतरित किया गया है। अधिकारियों के अनुसार, आगे किसी भी पुनर्वास प्रक्रिया में स्थानीय लोगों की सहमति और निर्धारित प्रक्रिया को महत्व दिया जाएगा। आगे बक्सा में चरणबद्ध तरीके से और बाघ लाने की योजना है। वन विभाग के अनुसार, अतिरिक्त बाघों को लाने का निर्णय आवास, शिकार आधार, सुरक्षा व्यवस्था, वैज्ञानिक निगरानी और बाघों की आबादी की व्यवहार्यता जैसे मानकों के आकलन के आधार पर लिया जाएगा। एक ही स्रोत क्षेत्र से बाघ लाने का प्रयास भी इसी वैज्ञानिक योजना का हिस्सा बताया गया है। बक्सा में शुरू हुआ यह कार्यक्रम केवल बाघों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है। इसका व्यापक उद्देश्य जंगल, घासभूमि, शिकार प्रजातियों, जैव विविधता और स्थानीय समुदायों के बीच संतुलन कायम करना है। बक्सा का भूटान और असम से जुड़ा वन परिदृश्य भविष्य में वन्यजीवों की आवाजाही और प्रसार के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पहली बाघिन के रिलीज के साथ बक्सा में शुरू हुई इस प्रक्रिया के अब एक बाघ को वापस लाने से आगे बढ़कर दीर्घकालिक, वैज्ञानिक और समुदाय आधारित संरक्षण कार्यक्रम का रूप लेने की उम्मीद है।