जलपाईगुड़ी: जलपाईगुड़ी स्थित मोहितनगर में विकसित 'मोहितनगर' प्रजाति की सुपारी अब देश के कई राज्यों की पहली पसंद बनती जा रही है। खासकर ओडिशा, त्रिपुरा, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और पूर्वोत्तर राज्यों में इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, ओडिशा में बार-बार आने वाले चक्रवातों के कारण नारियल के पेड़ों को भारी नुकसान होता है, जबकि मोहितनगर प्रजाति के सुपारी के पेड़ तेज हवाओं में झुक तो जाते हैं, लेकिन आसानी से गिरते नहीं हैं। यही वजह है कि इन राज्यों में इस प्रजाति की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के अधीन केंद्रीय फसल रोपण अनुसंधान संस्थान (सीपीसीआरआई), मोहितनगर पिछले पांच दशकों से सुपारी, नारियल, कोको, कॉफी और मसालों की मिश्रित खेती पर शोध कर रहा है। संस्थान के 65 एकड़ परिसर में लगभग 30 एकड़ भूमि पर मंगला, श्रीमंगला, सुमंगला, नलबाड़ी और मोहितनगर जैसी विभिन्न सुपारी प्रजातियों पर अनुसंधान किया जा रहा है। संस्थान के वरिष्ठ प्रधान वैज्ञानिक अरुण शीट ने बताया कि मोहितनगर प्रजाति की सुपारी सूखी किस्म की है और ठंडे तथा गर्म दोनों तरह के मौसम में अच्छी पैदावार देती है। इसका उत्पादन अधिक होने के साथ-साथ गुणवत्ता भी बेहतर होती है, जिससे अन्य राज्यों में इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है। इस वर्ष तमिलनाडु ने एक लाख, ओडिशा ने बीज और पौधों सहित करीब तीन लाख, जबकि त्रिपुरा ने 15 हजार पौधे लिए हैं। वहीं मिजोरम, मणिपुर और नागालैंड जैसे पूर्वोत्तर राज्यों में भी दो लाख से अधिक पौधे और बीज भेजे जा चुके हैं।
अगले वर्ष भी कई राज्यों ने बड़ी संख्या में पौधे लेने में रुचि दिखाई है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्रजाति के सुपारी के पेड़ से उत्पादन शुरू होने में 6 से 7 वर्ष लगते हैं। इस दौरान किसान अतिरिक्त आय के लिए पेड़ों के बीच खाली स्थान में केला, पपीता और सब्जियों की खेती कर सकते हैं। पेड़ बड़े होने पर हल्दी, काली मिर्च जैसे मसालों की खेती से भी अच्छी आमदनी संभव है। करीब 12 वर्षों के शोध के बाद विकसित मोहितनगर प्रजाति के सुपारी के पेड़ों की औसत आयु लगभग 50 वर्ष मानी जाती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि उत्तर बंगाल के किसानों को भी बड़े पैमाने पर इसकी खेती करनी चाहिए, क्योंकि इसकी बाजार में अच्छी मांग है और इसकी कीमत 700 से 800 रुपये प्रति किलोग्राम तक मिल जाती है। उनका मानना है कि सरकारी सहयोग और किसानों की पहल से यह प्रजाति भविष्य में आय का बेहतर स्रोत बन सकती है।