सिलीगुड़ी : शरद पूर्णिमा की रात मिथिलांचल का पारंपरिक लोकपर्व कोजागरा 25 अक्टूबर को धूमधाम से मनाया जाएगा। बंगाल, बिहार और नेपाल की सीमा से सटे इलाकों में भी मिथिला की संस्कृति की झलक देखने को मिलेगी। पर्व को लेकर नवविवाहित दूल्हों के घरों में तैयारियां तेज हो गई हैं। कहीं ससुराल से आने वाले पारंपरिक भार की तैयारी हो रही है, तो कहीं रिश्तेदारों और कुटुंब के लोगों के स्वागत की व्यवस्था की जा रही है। दूसरी ओर, सिलीगुड़ी के बाजारों में पान, मखाना, मिठाई, वस्त्र और बांस से बने डाले की खरीदारी बढ़ गई है।
ससुराल से आता है परंपरागत भार
मिथिला की लोक संस्कृति में कोजागरा का विशेष महत्व है। इस अवसर पर नवविवाहित दूल्हे के ससुराल से मखाना, पान, नारियल, केला, वस्त्र और अन्य पूजन सामग्री भार के रूप में भेजी जाती है। भार पहुंचने के बाद परिवार की ओर से रिश्तेदारों और समाज के लोगों को आमंत्रित किया जाता है। दूल्हे को नए वस्त्र पहनाकर पारंपरिक विधि से चुमावन किया जाता है। इस दौरान परिवार और समाज के लोगों की भागीदारी से घर में उत्सवी माहौल बनता है।
अष्टदल कमल के अरिपन पर होता है चुमावन
कोजागरा पर घर की महिलाएं आंगन में अरवा चावल के घोल से अष्टदल कमल का अरिपन बनाती हैं। इसके ऊपर चुमावन का डाला रखा जाता है। बांस से बने करीब पांच से छह फुट व्यास वाले इस डाले को धान, मखाना, पांच नारियल, पांच हत्था केला, पान, मखाने की माला, जनेऊ, सुपारी, इलायची और अन्य सामग्री से सजाया जाता है। इसमें मिठाइयां, छाता, छड़ी, वस्त्र और चांदी की कौड़ी भी रखी जाती है।
डाले के आकार और वजन को देखते हुए चुमावन की रस्म में कई महिलाएं एक साथ हिस्सा लेती हैं। परंपरा के अनुसार, दूल्हे के सिर पर छाता रखा जाता है और पांच ब्राह्मण दूर्वा-अक्षत देकर आशीर्वाद देते हैं। इसके बाद समाज के लोगों के बीच मखाना, बताशा और पान वितरित किया जाता है।
1500 रुपये किलो तक पहुंची मखाने की कीमत
कोजागरा को लेकर सिलीगुड़ी के बाजारों में मखाने की मांग बढ़ गई है। इस वर्ष इसकी कीमत करीब 1200 से 1500 रुपये प्रति किलो बताई जा रही है। खरीदार अपनी जरूरत के अनुसार अलग-अलग वजन के पैकेट और बैग खरीद रहे हैं। भार तैयार करने के लिए मखाने के साथ पान, मिठाई, वस्त्र और बांस के डाले की भी खरीदारी हो रही है। पर्व में मखाना-बताशा बांटने की परंपरा के कारण इसकी मांग खास तौर पर बढ़ जाती है।
लक्ष्मी पूजा और कौड़ी खेलने की परंपरा
कोजागरा आश्विन मास की पूर्णिमा यानी शरद पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस रात माता लक्ष्मी की पूजा और जागरण का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस रात माता लक्ष्मी पृथ्वी पर आती हैं। चुमावन के दौरान ससुराल से आए धान और दूब से दूल्हे को आशीर्वाद दिया जाता है। इसके बाद जीजा-साला और देवर-भाभी के बीच चांदी की कौड़ी से पचीसी खेलने की परंपरा निभाई जाती है। इस दौरान हंसी-मजाक, मैथिली गीत-संगीत और पारिवारिक मेल-मिलाप से उत्सव का माहौल बनता है।
कोजागरा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि मिथिला की सांस्कृतिक विरासत, पारिवारिक रिश्तों और सामाजिक एकजुटता का प्रतीक भी है। पीढ़ियों से चली आ रही इन परंपराओं के जरिए नई पीढ़ी को अपनी लोकसंस्कृति से जुड़ने का अवसर मिलता है।