सिलीगुड़ी : डाबग्राम–फूलबाड़ी विधानसभा क्षेत्र के बांसबाड़ी इलाके में रेलवे द्वारा भेजे गए बेदखली नोटिस ने स्थानीय निवासियों में गुस्से की लहर दौड़ा दी है। दशकों से इस क्षेत्र में रह रहे परिवारों को नोटिस में जल्द ज़मीन खाली करने को कहा गया है, जिसके विरोध में मतुआ समुदाय गुरुवार को सड़क पर उतर आया। उनकी मुख्य मांग है कि जब तक उचित पुनर्वास की व्यवस्था नहीं होती, तब तक किसी भी तरह की बेदखली स्वीकार्य नहीं होगी।
रेलवे का नोटिस और निवासियों का आरोप
उत्तर-पूर्व सीमांत रेलवे ने हाल में रामनगर मजदूर कॉलोनी और उसके आसपास के बड़े हिस्से में रहने वालों को बेदखली का नोटिस भेजा। स्थानीय लोगों का कहना है कि वे बीते 30–40 वर्षों से इस जमीन पर रह रहे हैं, अनेक परिवारों ने यहीं अपने घर बनाए, रोज़गार शुरू किया और स्थायी रूप से बस गए। अचानक नोटिस मिलने के बाद ग्रामीणों में भय और आक्रोश दोनों बढ़ गया है। निवासियों का आरोप है कि रेलवे ने बिना किसी पूर्व संवाद, सर्वेक्षण या वैकल्पिक व्यवस्था की योजना बताए नोटिस जारी कर दिया, जिससे उनके भविष्य पर संकट मंडरा रहा है।
एडीआरएम कार्यालय तक विशाल मार्च
इस निर्णय के खिलाफ ऑल इंडिया मतुआ नमःशूद्र एवं शरणार्थी विकास परिषद के बैनर तले क्षेत्र के सैकड़ों लोग सड़क पर उतरे और बांसबाड़ी से लेकर न्यू जलपाईगुड़ी स्थित एडीआरएम कार्यालय तक विशाल रैली निकाली। मार्च का नेतृत्व परिषद के राज्य अध्यक्ष रंजीत सरकार, सिलीगुड़ी के डिप्टी मेयर रंजन सरकार, और अन्य वरिष्ठ नेताओं ने किया। प्रदर्शनकारियों ने ‘पुनर्वास दो–फिर बेदखली करो’ के नारे लगाए और रेलवे के निर्णय को "अन्यायपूर्ण और असंवेदनशील" बताया।
रेलवे अधिकारियों से वार्ता, प्रश्नों की बौछार
प्रदर्शन के बाद एक प्रतिनिधिमंडल रेलवे अधिकारियों से मिला। बैठक में नेताओं ने स्पष्ट सवाल उठाए कि बिना पुनर्वास योजना बनाए बेदखली का नोटिस कैसे जारी किया गया? दशकों से बसे परिवारों को एक झटके में हटाने का निर्णय किस आधार पर लिया गया? क्या रेलवे ने स्थानीय प्रशासन या पंचायत से चर्चा की? प्रतिनिधियों ने कहा कि समुदाय के लोग बेघर नहीं होना चाहते, बल्कि न्यायसंगत व्यवस्था चाहते हैं।
रेलवे का जवाब और आगे की रणनीति
बैठक के बाद राज्य अध्यक्ष रंजीत सरकार ने बताया कि रेलवे की ओर से अगले दिन पांच सदस्यीय प्रतिनिधि दल के साथ विस्तृत चर्चा का आश्वासन दिया गया है। अधिकारियों ने यह भी कहा कि समुदाय की आपत्तियों और मांगों को उच्च स्तर तक भेजा जाएगा। हालांकि, उन्होंने चेतावनी भी दी कि यदि पुनर्वास की उचित और लिखित व्यवस्था नहीं की गई, तो आने वाले दिनों में आंदोलन और भी बड़ा रूप लेगा।
ग्रामीणों में चिंता
निवासियों का कहना है कि अचानक बेदखली से न केवल उनके सिर से छत छिनेगी, बल्कि कई लोगों की रोज़मर्रा की आजीविका भी प्रभावित होगी। कई परिवार पीढ़ियों से यहां बसे हैं और उनके लिए किसी नए स्थान पर जाना बेहद कठिन होगा। फिलहाल, रेलवे के नोटिस ने पूरे क्षेत्र में अस्थिरता ला दी है। जबकि रेलवे अपनी प्रक्रिया जारी रखने के संकेत दे रहा है, वहीं मतुआ समुदाय पुनर्वास के बिना कोई समझौता करने को तैयार नहीं है। आने वाले दिनों में बातचीत के परिणाम से स्थिति स्पष्ट होगी, लेकिन इलाके में तनाव और बेचैनी बनी हुई है।