बच्चों को मूर्तियां बनाने की शिक्षा देते दिलीप कुमार दास  
सिलीगुड़ी

फेंकी गई लकड़ियों को दे रहे कलात्मक नया जीवन

कालियागंज: उत्तर दिनाजपुर जिले के कालियागंज के सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक दिलीप कुमार दास बेकार और बहकर आई लकड़ियों को अपनी कल्पनाशीलता और कला से अनोखी मूर्तियों में बदल रहे हैं। जो लकड़ियां कचरा समझकर फेंक दी जाती थीं, वही आज उनकी कला के माध्यम से जीवंत कलाकृतियों का रूप ले रही हैं। शिक्षक जीवन के साथ-साथ कला साधना को भी समान महत्व देने वाले दिलीप कुमार दास ने सेवानिवृत्ति के बाद पूरी तरह प्रकृति-आधारित लकड़ी की शिल्पकला को अपना लिया। जंगलों, नदियों और चाय बागानों से वे सूखी लकड़ियां, जड़ें और टहनियां एकत्र करते हैं और उनकी प्राकृतिक बनावट को बनाए रखते हुए न्यूनतम हस्तकला से अद्भुत कलाकृतियां तैयार करते हैं। उनकी रचनाओं में 'सहाय', हैप्पी फैमिली, महामाया, क्रिकेटर, आउट फॉर डक, हाथी, शिकारी और प्लास्टिक-सुंदरी जैसी अनेक आकर्षक कृतियां शामिल हैं। इन कलाकृतियों में प्रकृति, पर्यावरण संरक्षण और मानव जीवन के गहरे संबंध का संदेश झलकता है। दिलीप कुमार दास केवल कलाकार ही नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को इस पर्यावरण-अनुकूल कला से जोड़ने का भी कार्य कर रहे हैं। वे विभिन्न विद्यालयों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में कार्यशालाएं आयोजित कर विद्यार्थियों को लकड़ी की कलाकृतियां बनाने का प्रशिक्षण देते हैं।

उनका मानना है कि तकनीक के इस दौर में भी प्रकृति-आधारित कला सृजनशीलता और पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने का प्रभावी माध्यम है। उनकी कलाकृतियों का प्रदर्शन कई प्रदर्शनियों और सांस्कृतिक आयोजनों में हो चुका है, जहां कला प्रेमियों, शिक्षाविदों और सांस्कृतिक जगत के लोगों ने उनकी सराहना की है। भविष्य में वे इस कला को बढ़ावा देने के लिए एक स्थायी प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करना चाहते हैं।

दिलीप कुमार दास का कहना हैं, प्रकृति कभी भी कोई चीज़ व्यर्थ नहीं बनाती। जिस लकड़ी को लोग बेकार समझते हैं, कलाकार की नजर में वही एक नई रचना की शुरुआत बन सकती है।

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