coronation bridge 
सिलीगुड़ी

1,125 करोड़ रुपये से तैयार होगा इतिहास का विकल्प

- ऐतिहासिक सेवक कोरोनेशन ब्रिज के वैकल्पिक ब्रिज का निर्माण जल्द ही - फोर लेन का भव्य पुल और साथ में रेल ट्रैक, दिसंबर महीने में टेंडर की उम्मीद - 85 साल से चला आ रहा सेवक कोरोनेशन ब्रिज अब हो गया है बहुत कमजोर

अंजली पांडेय

सिलीगुड़ी : उत्तर बंगाल और डुआर्स की जीवनरेखा कहे जाने वाले कोरोनेशन ब्रिज की हालत लगातार बिगड़ती जा रही है। 10 टन से अधिक वजन वाले वाहनों का आवागमन पहले ही इस पुल पर प्रतिबंधित कर दिया गया है। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि सैनिक वाहनों का आना-जाना आखिर कैसे होगा? क्षेत्र की सुरक्षा के लिहाज़ से यह मुद्दा बेहद गंभीर है। सिलीगुड़ी से 25 किमी दूर सेवक में स्थित कोरोनेशन ब्रिज राष्ट्रीय राजमार्ग 31 पर स्थित है और डुआर्स तथा उत्तर-पूर्व भारत को जोड़ने वाले मुख्य मार्गों में से एक है। बेहद संकीर्ण (सिर्फ 6.7 मीटर चौड़ा) यह पुल वर्षों से लगातार प्राकृतिक आपदाएं, बढ़ता ट्रैफिक और संरचनात्मक क्षति झेल रहा है। कई हिस्सों में दरारें पड़ गई हैं और कुछ पिलर भी गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। यदि यह पुल और अधिक क्षतिग्रस्त होता है, तो सिलीगुड़ी से डुआर्स का संपर्क पूरी तरह टूट सकता है, साथ ही भूटान के साथ कनेक्टिविटी भी बाधित होगी।

नए ‘सुपर ब्रिज’ की योजना , फोर लेन + रेल ट्रैक, 1,125 करोड़ की लागत

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए अब नए कोरोनेशन ब्रिज की मांग तेज़ हो गई है। प्रस्ताव के अनुसार: नया पुल सेवक में मौजूदा रेल पुल के समानांतर बनाया जाएगा। इसकी चौड़ाई कम से कम 14 मीटर होगी। परियोजना की लागत 1,125 करोड़ रुपये अनुमानित है। राज्य के शीर्ष अधिकारी पर्यावरण मंजूरी के लिए वन विभाग के साथ लगातार बैठकें कर रहे हैं। डुआर्स के लोग अब 'हो रहा है, होगा' वाली घोषणाओं से आगे बढ़कर पक्के फैसले की मांग कर रहे हैं।

जनता की मांग : अब घोषणा नहीं, निर्माण शुरू हो

डुआर्स के नागरिकों ने ‘डुआर्स फ़ोरम फ़ॉर सोशल रिफॉर्म्स’ नाम से एक गैर-राजनीतिक मंच भी बनाया है, जिसके माध्यम से वे नए पुल के लिए आवाज़ बुलंद कर रहे हैं। संगठन का कहना है कि पिछले कई वर्षों से केंद्र और राज्य सरकारें पुल को लेकर वादे तो करती आई हैं, लेकिन कोई ठोस कदम आज तक नहीं उठा। संगठन के सदस्य चंदन राय ने कहा कि मालबाज़ार में स्वास्थ्य व्यवस्था तो सुधरी है, लेकिन गंभीर मरीजों को अक्सर उत्तरबंग मेडिकल कॉलेज भेजना पड़ता है। कोरोनेशन ब्रिज और उससे जुड़ी सड़कों की हालत ऐसी है कि रोज़ जोखिम उठाना पड़ता है। लैंडस्लाइड होते ही घंटों जाम लग जाता है। इसलिए अब वादों का समय नहीं, दूसरे सेवक ब्रिज का काम तुरंत शुरू होना चाहिए।

सुरक्षा और आवागमन पर बड़ा खतरा

डुआर्स की लाइफलाइन माने जाने वाले पुल पर अगर 10 टन से भारी वाहन ही नहीं चल सकते, तो सेना के बड़े वाहनों की आवाजाही कैसे संभव होगी? यह सवाल क्षेत्र की सामरिक सुरक्षा से भी जुड़ा है, क्योंकि यह इलाका सिक्किम-चीन सीमा के नज़दीक है। लोगों की मांग है कि नए पुल का निर्माण अब तुरंत यानी होगा नहीं, अब होगा की तरह शुरू किया जाए, ताकि उत्तर बंगाल को उसका नया फोर लेन का मुकुट जल्द से जल्द मिल सके।

-------- फोटो -------- कोरोनेशन ब्रिज की फोटो ----------

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पूर्वोत्तर भारत के प्रवेशद्वार सिलीगुड़ी शहर से लगभग 25 किलोमीटर दूर सेवक में गहरी पहाड़ी खाई में बने वाली तीस्ता नदी पर कोरोनेशन ब्रिज का निर्माण ब्रिटिश सरकार ने चीन तक पहुंच, सैन्य रसद आपूर्ति, सिलीगुड़ी से दार्जिलिंग व कालिम्पोंग, डुआर्स, सिक्किम एवं पूर्वोत्तर के राज्यों तक सड़क संपर्क आदि को ध्यान में रख कर किया था। किंग जॉर्ज VI और क्वीन एलिजाबेथ के कोरोनेशन यानी राज्याभिषेक को ले इस ब्रिज का नाम कोरोनेशन ब्रिज रखा गया। इस ब्रिज को स्थानीय लोग बाघ पुल भी कहते हैं क्योंकि इसके एक प्रवेश द्वार पर दो बाघ प्रतिमाएं हैं। दार्जिलिंग पीडब्ल्यूडी के अंतिम ब्रिटिश कार्यकारी इंजीनियर जॉन चैम्बर्स के अधीनस्थ तीन बंगाली आर्किटेक्ट, एसी दत्त, एसके घोष और केपी रॉय ने इस ब्रिज का डिजाइन तैयार किया था। इसकी आधारशिला 1937 में बंगाल के तत्कालीन गवर्नर जॉन एंडरसन ने रखी थी। इसका निर्माण 1937 में शुरू हुआ जो चार साल में बन कर 1941 में तैयार हुआ। बॉम्बे के मेसर्स जेसी गैमन ने इसके निर्माण का ठेका लिया था। उस समय इसके निर्माण की लागत लगभग 6 लाख रुपये पड़ी थी जो आज के 25 करोड़ रुपये के बराबर है। यह ब्रिज राष्ट्रीय राजमार्ग 10 (पूर्व में राष्ट्रीय राजमार्ग 31) का एक हिस्सा है और दार्जिलिंग तथा कालिम्पोंग, डुआर्स व सिक्किम एवं पूर्वोत्तर राज्यों को जोड़ता है।

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