भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने अध्ययन किया है कि सूखे के कारण पानी की कमी का सामना करने पर पौधों की आंतरिक जल परिवहन प्रणाली किस तरह व्यवहार करती है। इस शोध के निष्कर्ष प्रतिष्ठित पत्रिका ‘एप्लाइड फिजिक्स रिव्यूज’ में प्रकाशित हुए हैं।
पौधों की आंतरिक जल परिवहन प्रणाली उनके भीतर पानी और पोषक तत्वों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाती है, जिससे उनकी वृद्धि होती है। संस्थान के अनुसार, पौधों के तने में जाइलम नाम की सूक्ष्म नलिकाएं होती हैं, जो जड़ों से पानी को पत्तियों तक पहुंचाती हैं। ये नलिकाएं छोटे-छोटे छिद्रों से एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं, जिन्हें पिट्स कहा जाता है। ये छिद्र पानी और अन्य पोषक तत्वों के सुचारु प्रवाह में मदद करते हैं तथा रुकावटों को रोकने में अहम भूमिका निभाते हैं।
दुनियाभर के वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि सूखे के दौरान जाइलम की नलिकाएं किस तरह व्यवहार करती हैं, लेकिन इस दिशा में अब तक सीमित प्रगति हुई है। पहले किए गए कंप्यूटेशनल मॉडलिंग अध्ययनों में जाइलम को कठोर पाइप की तरह माना गया था। इस वजह से पानी की कमी के दौरान पौधों में होने वाले बदलावों का सटीक चित्रण नहीं हो पा रहा था।
इस शोध अंतर को दूर करने के लिए आईआईटी गुवाहाटी के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर प्रणब कुमार मंडल और उनकी शोध टीम ने प्रयोगों के निष्कर्षों को वास्तविक परिस्थितियों पर आधारित त्रि-आयामी (3डी) कंप्यूटर सिमुलेशन के साथ जोड़ा।
टीम ने पानी की कमी के दौरान पौधों की जल परिवहन प्रणाली के आकार, यांत्रिक मजबूती और दीवारों की विशेषताओं में होने वाले बदलावों का प्रयोगों के जरिए मापन किया। शोधकर्ताओं ने पिट्स के आकार और उनमें होने वाले परिवर्तनों का भी अध्ययन किया।
मंडल ने एक बयान में कहा, “हमने उन्नत इमेजिंग तकनीक, सूक्ष्म स्तर पर बल मापन और रासायनिक ट्रैकिंग की मदद से भारतीय सरसों के पौधों के तनों का अध्ययन किया। इसके बाद हमने सटीक रूप से पता लगाया कि सूखा जाइलम की दीवारों की लोच और तरल पदार्थ के प्रवाह को किस तरह प्रभावित करता है।”
उन्होंने बताया कि इन मापों के आधार पर वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप 3डी मॉडल तैयार किए गए। इन मॉडलों से पता चला कि सूखे के दौरान पौधे पानी के परिवहन को बेहतर बनाने के लिए अपनी जाइलम प्रणाली में बदलाव करते हैं।
शोध में पाया गया कि पानी की अत्यधिक कमी होने पर पौधों के भीतर मौजूद सूक्ष्म नलिकाएं संकरी हो जाती हैं और पिट्स का आकार भी छोटा हो जाता है। इससे पौधे के भीतर पानी के प्रवाह का प्रतिरोध बढ़ जाता है और तने के सहारे पानी का ऊपर की ओर जाना कठिन हो जाता है।
हालांकि, यह बदलाव पौधे के ऊपरी हिस्से से वाष्पोत्सर्जन के जरिए पानी की होने वाली हानि को कम करने में मदद करता है। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि इस प्रक्रिया के दौरान पानी पिट्स के जरिए आड़े यानी एक ओर से दूसरी ओर बहने लगता है। इससे पौधे के भीतर पानी का संतुलन बनाए रखने और नलिकाओं के पूरे नेटवर्क को टूटने से बचाने में मदद मिलती है।
मंडल ने कहा, “यह शोध हमें यह बेहतर ढंग से समझने में मदद करेगा कि पानी की कमी वाली परिस्थितियों में पौधे कैसे जीवित रहते हैं। भविष्य में इन निष्कर्षों से वैज्ञानिक ऐसी फसल किस्में विकसित कर सकते हैं, जो सूखे को अधिक सहन कर सकें और पानी का अधिक कुशलता से इस्तेमाल करें।”
उन्होंने कहा कि इस तरह की जानकारी टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने और जलवायु परिवर्तन के बावजूद फसलों की उत्पादकता बनाए रखने में मददगार हो सकती है।
शोध के निष्कर्षों से वैज्ञानिकों को सूखा प्रतिरोधी फसल किस्में विकसित करने में मदद मिल सकती है। साथ ही, पानी की कमी वाले क्षेत्रों में किसान फसलों को होने वाले नुकसान को कम करने और कृषि उत्पादकता बनाए रखने के लिए इन जानकारियों का लाभ उठा सकते हैं।