ब्रह्मांड की उत्पत्ति और उसके अस्तित्व से जुड़े रहस्यों को समझने की दिशा में वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। अमेरिका के नॉर्थवेस्टर्न विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने प्रतिपदार्थ के एक कण, पॉज़िट्रॉन, को विशेष उपकरण की मदद से महीनों तक सुरक्षित रखने और उसकी क्वांटम अवस्थाओं को नियंत्रित करने में सफलता प्राप्त की है। इस प्रयोग से वैज्ञानिकों के लिए पॉज़िट्रॉन के चुंबकीय गुणों का अत्यधिक सटीक मापन करने का रास्ता खुल सकता है। भविष्य में इससे पदार्थ और प्रतिपदार्थ के व्यवहार की तुलना करने तथा भौतिकी के बुनियादी सिद्धांतों की जांच करने में मदद मिल सकती है।
पॉज़िट्रॉन इलेक्ट्रॉन का प्रतिकण है। इसका द्रव्यमान इलेक्ट्रॉन के बराबर होता है, लेकिन इसका विद्युत आवेश विपरीत यानी धनात्मक होता है। जब पॉज़िट्रॉन और इलेक्ट्रॉन एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं, तो दोनों का विनाश हो सकता है और उनकी ऊर्जा विकिरण के रूप में निकलती है। इस प्रक्रिया को विनाश या एनीहिलेशन कहा जाता है।
यही वजह है कि प्रतिपदार्थ के किसी कण को सामान्य पात्र में रखकर उसका अध्ययन नहीं किया जा सकता। ऐसा करते ही वह पात्र की दीवारों या आसपास मौजूद पदार्थ के संपर्क में आ सकता है। वैज्ञानिकों को उसे किसी भौतिक सतह से छुआए बिना नियंत्रित करना पड़ता है। इसके लिए विद्युत और चुंबकीय क्षेत्रों की सहायता ली जाती है, जो कण को एक सीमित क्षेत्र में बनाए रखते हैं।
शोधकर्ताओं ने एक विशेष उपकरण विकसित किया, जिसे एकल-पॉज़िट्रॉन क्वांटम साइक्लोट्रॉन कहा जाता है। इसमें विद्युत और चुंबकीय क्षेत्रों के संयोजन से पॉज़िट्रॉन को एक विशेष निर्वात कक्ष में सीमित रखा जाता है। इस व्यवस्था में कण किसी दीवार को छुए बिना लंबे समय तक मौजूद रह सकता है।
प्रयोग में पॉज़िट्रॉन को लगभग 300 मिलीकेल्विन तापमान पर रखा गया, जो परम शून्य तापमान से केवल 0.3 डिग्री अधिक है। इतनी कम ऊर्जा वाली अवस्था में कण की गति और ऊर्जा को नियंत्रित करना आसान हो जाता है। शोधकर्ता सूक्ष्म ऊर्जा परिवर्तन उत्पन्न करने के लिए विशेष आवृत्ति वाली सूक्ष्मतरंगों का इस्तेमाल कर सके। इससे पॉज़िट्रॉन को एक क्वांटम ऊर्जा स्तर से दूसरे स्तर पर जाते हुए देखा और उसकी अवस्था में होने वाले बदलावों का पता लगाया जा सका।
इस प्रयोग की सबसे कठिन चुनौतियों में से एक पॉज़िट्रॉन को पकड़ने से पहले उसकी गति कम करना था। इसके लिए वैज्ञानिकों ने रेडियोधर्मी सोडियम-22 का इस्तेमाल किया, जिससे निकलने वाले पॉज़िट्रॉन की ऊर्जा बहुत अधिक हो सकती है। प्रयोग में इन कणों की ऊर्जा लगभग 546 किलोइलेक्ट्रॉन वोल्ट तक थी।
शोधकर्ताओं ने टंगस्टन की मदद से पॉज़िट्रॉन की गति कम की। इस प्रक्रिया में कुछ पॉज़िट्रॉन इलेक्ट्रॉन के साथ मिलकर पॉज़िट्रोनियम नामक अस्थायी अवस्था बना लेते हैं। यह विद्युत रूप से उदासीन होता है, इसलिए उपकरण के एक छोटे छिद्र से गुजर सकता है। कक्ष के भीतर विद्युत क्षेत्र इलेक्ट्रॉन को अलग कर देता है और पॉज़िट्रॉन को फंसा लेता है। इस तरह वैज्ञानिकों ने एक ऐसी व्यवस्था तैयार की, जिसमें पॉज़िट्रॉन को सुरक्षित रखने के साथ-साथ उसकी क्वांटम अवस्थाओं को नियंत्रित और मापा भी जा सकता है।
इस उपलब्धि का महत्व केवल एक कण को लंबे समय तक सुरक्षित रखने तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिक अब पॉज़िट्रॉन के चुंबकीय आघूर्ण का अधिक सटीक मापन करना चाहते हैं। चुंबकीय आघूर्ण किसी कण के चुंबकीय व्यवहार से जुड़ा गुण है।
भौतिकी के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत के अनुसार, इलेक्ट्रॉन और पॉज़िट्रॉन जैसे कणों के चुंबकीय आघूर्ण का परिमाण समान होना चाहिए, जबकि उनके चिह्न विपरीत होते हैं। इस सिद्धांत को सीपीटी सममिति से जोड़ा जाता है। यदि अत्यधिक सटीक मापन में दोनों के गुणों में कोई अंतर मिलता है, तो यह वर्तमान भौतिकी के कुछ बुनियादी विचारों की दोबारा जांच का कारण बन सकता है।
ब्रह्मांड विज्ञान में एक बड़ा सवाल यह भी है कि यदि ब्रह्मांड की शुरुआती अवस्था में पदार्थ और प्रतिपदार्थ लगभग समान मात्रा में बने थे, तो आज ब्रह्मांड में पदार्थ की प्रधानता क्यों है। पॉज़िट्रॉन के गुणों का सटीक अध्ययन इस व्यापक सवाल को समझने के लिए जरूरी प्रयोगों में योगदान दे सकता है। हालांकि, यह प्रयोग अपने आप में इस रहस्य का समाधान नहीं देता।
शोधकर्ताओं ने एक पॉज़िट्रॉन को महीनों तक सुरक्षित रखने, उसकी ऊर्जा की क्वांटम अवस्थाओं में बदलाव करने और उन बदलावों का पता लगाने की क्षमता प्रदर्शित की है। लेकिन पॉज़िट्रॉन के चुंबकीय आघूर्ण का अत्यधिक सटीक मापन अभी पूरा नहीं हुआ है। इसके लिए आगे विस्तृत मापन और प्रयोग में संभावित त्रुटियों पर बारीकी से नियंत्रण करना होगा।
यदि वैज्ञानिक इलेक्ट्रॉन और पॉज़िट्रॉन के चुंबकीय गुणों की तुलना पहले से कहीं अधिक सटीकता से कर पाते हैं, तो यह भौतिकी के बुनियादी सिद्धांतों की अब तक की सबसे कठोर जांचों में से एक हो सकती है। यह उपलब्धि ब्रह्मांड में पदार्थ की प्रधानता से जुड़े सवालों को समझने के लिए नए प्रयोगों का मार्ग भी प्रशस्त कर सकती है।