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शिक्षा

रिश्तों का संकट : आर्थिक समृद्धि के बीच अकेला होता भारतीय समाज

Om Prakash Mishra
लोगों के पास संपर्क के साधन पहले से कहीं अधिक हैं लेकिन भावनात्मक रूप से एक-दूसरे के करीब होने का समय और अवसर कम होता जा रहा है।

भारत की पहचान लंबे समय तक केवल अपनी सांस्कृतिक विविधता या पारिवारिक परंपराओं से नहीं बल्कि मजबूत सामाजिक रिश्तों से भी रही है। संयुक्त परिवार, पड़ोस की आत्मीयता, रिश्तेदारों से नियमित संपर्क और संकट के समय एक-दूसरे के साथ खड़े होने की परंपरा भारतीय जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है लेकिन तेजी से बदलती जीवनशैली, शहरीकरण, रोजगार के लिए पलायन, बढ़ता उपभोक्तावाद और डिजिटल तकनीक के विस्तार ने सामाजिक रिश्तों की प्रकृति को बदल दिया है। आज एक विचित्र विरोधाभास दिखाई देता है-लोगों के पास संपर्क के साधन पहले से कहीं अधिक हैं लेकिन भावनात्मक रूप से एक-दूसरे के करीब होने का समय और अवसर कम होता जा रहा है।

अकेलापन और सामाजिक अलगाव सभी आयु वर्गों को प्रभावित कर सकते हैं

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी अकेलेपन और सामाजिक अलगाव को गंभीर वैश्विक समस्या के रूप में रेखांकित किया है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार अकेलापन और सामाजिक अलगाव सभी आयु वर्गों को प्रभावित कर सकते हैं और इनके स्वास्थ्य, कल्याण तथा समाज पर गंभीर प्रभाव पड़ते हैं। इसी कारण ड्ब्ल्यूएचओ ने सामाजिक जुड़ाव को सार्वजनिक स्वास्थ्य के महत्वपूर्ण मुद्दे के रूप में देखने की पहल की है।

पहले परिवार केवल आर्थिक इकाई नहीं था, बल्कि वह भावनात्मक सुरक्षा की भी सबसे बड़ी व्यवस्था था।

भारतीय समाज में इस बदलाव को समझने के लिए परिवार की बदलती संरचना को देखना जरूरी है। पहले परिवार केवल आर्थिक इकाई नहीं था, बल्कि वह भावनात्मक सुरक्षा की भी सबसे बड़ी व्यवस्था था। बच्चे, माता-पिता, दादा-दादी और अन्य रिश्तेदार एक-दूसरे के जीवन में प्रत्यक्ष रूप से शामिल रहते थे। आज नौकरी, शिक्षा और बेहतर अवसरों की तलाश में युवा छोटे शहरों और गांवों से महानगरों तथा विदेशों की ओर जा रहे हैं। इससे आर्थिक अवसर तो बढ़े हैं लेकिन परिवारों के बीच भौगोलिक दूरी भी बढ़ी है।

बुजुर्गों को धन और स्वास्थ्य सुविधा के साथ-साथ संवाद, सम्मान और अपनापन भी चाहिए।

इस बदलाव का असर सबसे अधिक बुजुर्गों पर दिखाई देता है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष ( यूएनएफपीए) की India Ageing Report 2023 ने भारत में तेजी से बढ़ती वृद्ध आबादी और उसके सामाजिक प्रभावों को रेखांकित किया है। रिपोर्ट के अनुसार 2050 तक भारत में 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की संख्या कुल आबादी की लगभग 20 प्रतिशत से अधिक हो सकती है। वृद्ध महिलाओं में अकेले रहने की समस्या विशेष रूप से अधिक दिखाई देती है जिसका संबंध अधिक जीवन प्रत्याशा और विधवापन से भी है। यह स्थिति केवल आर्थिक समस्या नहीं है। बुजुर्गों को धन और स्वास्थ्य सुविधा के साथ-साथ संवाद, सम्मान और अपनापन भी चाहिए। बेटा-बेटी आर्थिक सहायता भेज दें, दवाइयां उपलब्ध करा दें या वीडियो कॉल कर लें लेकिन इससे हर बार उस भावनात्मक जरूरत की पूर्ति नहीं होती जो किसी व्यक्ति को अपने परिवार के साथ बैठकर बातचीत करने से मिलती है। तकनीक दूरी कम कर सकती है, लेकिन हर परिस्थिति में रिश्तों की जगह नहीं ले सकती।

तकनीक दूरी कम कर सकती है, लेकिन हर परिस्थिति में रिश्तों की जगह नहीं ले सकती।
सोशल मीडिया पर सैकड़ों या हजारों संपर्क होना और वास्तविक जीवन में किसी व्यक्ति के साथ अपनी परेशानी साझा कर पाना दो अलग-अलग बातें हैं। डिजिटल संपर्क सामाजिक जुड़ाव का माध्यम हो सकता है, लेकिन वह हमेशा गहरे रिश्ते का विकल्प नहीं होता।

दूसरी ओर, युवाओं की दुनिया भी कम जटिल नहीं है। आज का युवा पहले की तुलना में अधिक शिक्षित, अधिक मोबाइल और अधिक वैश्विक है। उसके पास संवाद के साधन हैं, लेकिन संवाद का स्वरूप बदल गया है। सोशल मीडिया पर सैकड़ों या हजारों संपर्क होना और वास्तविक जीवन में किसी व्यक्ति के साथ अपनी परेशानी साझा कर पाना दो अलग-अलग बातें हैं। डिजिटल संपर्क सामाजिक जुड़ाव का माध्यम हो सकता है, लेकिन वह हमेशा गहरे रिश्ते का विकल्प नहीं होता। करियर बनाना और निरंतर आगे बढ़ने की चुनौती आज के युवाओं को कहीं ठहरने नहीं देती. उसके पास खुद के लिए समय नहीं  होता, वह दूसरों को कैसे दें.

अकेलेपन का अनुभव कम उम्र में भी मौजूद है। रिश्तों में बदलाव का एक महत्वपूर्ण कारण समय का संकट भी है।

भारत के स्कूली विद्यार्थियों से संबंधित ड्ब्ल्यूएचओ  के ग्लोबल स्कूल आधारित छात्र स्वास्थ्य सर्वे रिपोर्ट के उपलब्ध आंकड़ों में भी अकेलेपन की अनुभूति दिखाई देती है। उदाहरण के लिए जयपुर के 2022 के सर्वेक्षण डेटा में शामिल विद्यार्थियों में 13.1 प्रतिशत ने बताया कि वे पिछले 12 महीनों में अधिकांश समय या हमेशा अकेलापन महसूस करते थे। यह आंकड़ा पूरे भारतीय युवाओं का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता, लेकिन यह संकेत अवश्य देता है कि अकेलेपन का अनुभव कम उम्र में भी मौजूद है। रिश्तों में बदलाव का एक महत्वपूर्ण कारण समय का संकट भी है।

परिवार एक ही घर में रह सकता है, एक ही भोजन की मेज पर बैठ सकता है, लेकिन हर व्यक्ति अपने मोबाइल की स्क्रीन में व्यस्त हो तो वास्तविक सामाजिक दूरी बनी रहती है। यही आधुनिक परिवार का नया विरोधाभास है—भौतिक निकटता के बावजूद भावनात्मक दूरी।

आधुनिक जीवन में व्यक्ति का बड़ा हिस्सा नौकरी, यात्रा, शिक्षा, घरेलू जिम्मेदारियों और डिजिटल गतिविधियों में खर्च हो रहा है। परिवार के सदस्यों के पास एक-दूसरे के लिए समय कम होता जा रहा है। भारत सरकार के Time Use Survey 2024 के अनुसार 6 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों ने 2024 में अपने दिन के लगभग 11 प्रतिशत समय को संस्कृति, मनोरंजन, मास मीडिया और खेल जैसी गतिविधियों में लगाया, जो 2019 के 9.9 प्रतिशत से अधिक था। इसी सर्वेक्षण में घरेलू देखभाल की जिम्मेदारियों में लैंगिक अंतर भी सामने आया—15 से 59 वर्ष की महिलाओं में 41 प्रतिशत ने घरेलू सदस्यों की देखभाल संबंधी गतिविधियों में भाग लिया, जबकि पुरुषों में यह अनुपात 21.4 प्रतिशत था।
यहां सवाल केवल यह नहीं है कि लोग कितना समय एक-दूसरे के साथ बिताते हैं, बल्कि यह भी है कि वे उस समय में कितना भावनात्मक संवाद करते हैं। परिवार एक ही घर में रह सकता है, एक ही भोजन की मेज पर बैठ सकता है, लेकिन हर व्यक्ति अपने मोबाइल की स्क्रीन में व्यस्त हो तो वास्तविक सामाजिक दूरी बनी रहती है। यही आधुनिक परिवार का नया विरोधाभास है—भौतिक निकटता के बावजूद भावनात्मक दूरी।

जब सामाजिक प्रतिष्ठा का पैमाना धीरे-धीरे आय, मकान, गाड़ी, ब्रांड और जीवनशैली बनने लगे तो तुलना की प्रवृत्ति बढ़ती है। सोशल मीडिया ने इस तुलना को और तीव्र किया है।

आर्थिक विकास ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है। बेहतर घर, वाहन, मोबाइल फोन, इंटरनेट, मनोरंजन और उपभोग के अनेक साधन उपलब्ध हुए हैं। लेकिन सुविधा और संतोष एक ही चीज नहीं हैं। जब आर्थिक सफलता की दौड़ में समय, संबंध और मानसिक शांति की कीमत चुकानी पड़े तो विकास के सामाजिक पक्ष पर विचार करना जरूरी हो जाता है। उपभोक्तावाद भी रिश्तों को प्रभावित करता है। जब सामाजिक प्रतिष्ठा का पैमाना धीरे-धीरे आय, मकान, गाड़ी, ब्रांड और जीवनशैली बनने लगे तो तुलना की प्रवृत्ति बढ़ती है। सोशल मीडिया ने इस तुलना को और तीव्र किया है। व्यक्ति दूसरों के जीवन की चमकदार तस्वीरें देखता है और अपने जीवन से उनकी तुलना करता है। इससे असंतोष, प्रतिस्पर्धा और सामाजिक दबाव बढ़ सकते हैं। हालांकि सोशल मीडिया स्वयं समस्या नहीं है; समस्या तब पैदा होती है जब डिजिटल संपर्क वास्तविक संबंधों का स्थान लेने लगे।

परिवारों में पीढ़ियों के बीच संवाद की कमी भी एक बड़ी चुनौती है। नई पीढ़ी स्वतंत्रता, निजी पसंद और व्यक्तिगत पहचान को अधिक महत्व देती है, जबकि पुरानी पीढ़ी सामूहिकता और पारिवारिक जिम्मेदारियों को प्राथमिकता देती रही है। दोनों दृष्टिकोण अपने-अपने संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं। समस्या तब पैदा होती है जब दोनों पीढ़ियां एक-दूसरे को समझने के बजाय केवल अपने दृष्टिकोण को सही मानने लगती हैं।
इसलिए समाधान अतीत में लौटना नहीं है। संयुक्त परिवार हर समस्या का समाधान नहीं था और आधुनिक एकल परिवार भी अपने आप में गलत नहीं है। वास्तविक आवश्यकता ऐसी सामाजिक व्यवस्था की है जिसमें परिवार का आकार चाहे जैसा हो, लेकिन उसमें संवाद, सम्मान और जिम्मेदारी बनी रहे।

सप्ताह में एक दिन परिवार के सभी सदस्यों का साथ बैठना, भोजन के समय मोबाइल से दूरी बनाना, बुजुर्गों से नियमित बातचीत करना, बच्चों की बात बिना टोके सुनना और रिश्तेदारों से केवल जरूरत के समय नहीं बल्कि सामान्य दिनों में भी संपर्क बनाए रखना छोटे कदम हैं, लेकिन इनका प्रभाव बड़ा हो सकता है।

यूएनएफपीए ने भी भारत की वृद्ध होती आबादी के संदर्भ में पीढ़ियों के बीच संबंध मजबूत करने, साझा सामुदायिक स्थान विकसित करने और बुजुर्गों तथा युवाओं के बीच संवाद बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया है। उसके अनुसार सामुदायिक केंद्र, पुस्तकालय, पार्क और ऐसे स्थान सामाजिक संपर्क को मजबूत करने में मदद कर सकते हैं। इस दिशा में परिवार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। सप्ताह में एक दिन परिवार के सभी सदस्यों का साथ बैठना, भोजन के समय मोबाइल से दूरी बनाना, बुजुर्गों से नियमित बातचीत करना, बच्चों की बात बिना टोके सुनना और रिश्तेदारों से केवल जरूरत के समय नहीं बल्कि सामान्य दिनों में भी संपर्क बनाए रखना छोटे कदम हैं, लेकिन इनका प्रभाव बड़ा हो सकता है। विद्यालयों को भी बच्चों में केवल प्रतिस्पर्धा और परीक्षा की तैयारी नहीं बल्कि सहानुभूति, संवाद, सहयोग और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे गुण विकसित करने पर ध्यान देना होगा। कार्यस्थलों पर भी कर्मचारियों के मानसिक और सामाजिक कल्याण को केवल उत्पादकता के संदर्भ में नहीं देखा जाना चाहिए।

किसी समाज की वास्तविक ताकत केवल उसके सकल घरेलू उत्पाद, प्रति व्यक्ति आय या आधुनिक तकनीक से नहीं मापी जा सकती। यह भी देखना होगा कि संकट के समय व्यक्ति के साथ कौन खड़ा है, बुजुर्ग कितने सम्मान के साथ जी रहे हैं, बच्चे कितने सुरक्षित महसूस करते हैं और युवा अपनी परेशानियां किससे साझा कर सकते हैं।

सरकार और स्थानीय संस्थाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। बढ़ती वृद्ध आबादी के लिए स्वास्थ्य सेवाओं के साथ डे-केयर और सामुदायिक केंद्र, सुरक्षित सार्वजनिक स्थान तथा सामाजिक गतिविधियों की व्यवस्था आवश्यक होगी। UNFPA के अनुसार भारत में वृद्ध आबादी तेजी से बढ़ रही है और भविष्य में स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा तथा देखभाल की जरूरतें भी बढ़ेंगी। अंततः सवाल यह है कि क्या आर्थिक समृद्धि के साथ हम सामाजिक समृद्धि भी हासिल कर रहे हैं? किसी समाज की वास्तविक ताकत केवल उसके सकल घरेलू उत्पाद, प्रति व्यक्ति आय या आधुनिक तकनीक से नहीं मापी जा सकती। यह भी देखना होगा कि संकट के समय व्यक्ति के साथ कौन खड़ा है, बुजुर्ग कितने सम्मान के साथ जी रहे हैं, बच्चे कितने सुरक्षित महसूस करते हैं और युवा अपनी परेशानियां किससे साझा कर सकते हैं।

आखिरकार मनुष्य केवल आर्थिक प्राणी नहीं है। उसे रोटी, रोजगार और सुविधाओं के साथ अपनापन भी चाहिए।

भारत के सामने चुनौती पुरानी पारिवारिक व्यवस्था को जस का तस बचाने की नहीं, बल्कि बदलते समय के अनुरूप रिश्तों की नई संस्कृति विकसित करने की है। आधुनिकता और पारिवारिक संवेदना एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं। जरूरत केवल इतनी है कि तकनीक हमारे रिश्तों को मजबूत करने का माध्यम बने, उनका विकल्प नहीं; आर्थिक सफलता जीवन को बेहतर बनाए, रिश्तों को कमजोर नहीं; और स्वतंत्रता व्यक्ति को परिवार से दूर करने के बजाय स्वस्थ संवाद की नई जमीन तैयार करे। आखिरकार मनुष्य केवल आर्थिक प्राणी नहीं है। उसे रोटी, रोजगार और सुविधाओं के साथ अपनापन भी चाहिए। जिस दिन समाज में लोगों के पास एक-दूसरे के लिए समय नहीं बचेगा, उस दिन आर्थिक समृद्धि के बावजूद सामाजिक जीवन गरीब हो सकता है। इसलिए आज सबसे बड़ी जरूरत शायद अधिक संसाधनों की नहीं, बल्कि बेहतर रिश्तों और अधिक मानवीय संवाद की है। (युवराज)राम शर्मा

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