हिंदी दिवस आते ही सरकारी दफ्तरों में हिंदी सप्ताह शुरू हो जाता है, प्रतियोगिताएं होती हैं, कवि सम्मेलन सजते हैं, पुरस्कार बांटे जाते हैं और मंचों से हिंदी को राष्ट्र की आत्मा, संस्कृति की पहचान और जन-जन की भाषा बताया जाता है। फिर समारोह समाप्त होते ही हिंदी उसी उपेक्षित कोने में चली जाती है।
हिंदी दिवस का महत्व तभी है जब हम विचार करें कि हिंदी आज कहां खड़ी है
क्या हिंदी को साल में एक दिन याद करने से उसका गौरव बढ़ेगा? क्या कुछ भाषण और प्रमाणपत्र हिंदी की प्रतिष्ठा तय करेंगे ? शायद नहीं। हिंदी दिवस का महत्व तभी है जब हम विचार करें कि हिंदी आज कहां खड़ी है, किस दिशा में बढ़ रही है और आने वाले समय में उसका चेहरा कैसा होगा।
हम घर में हिंदी बोलते हैं, बाजार में हिंदी समझते हैं, मोबाइल पर हिंदी देखते-सुनते हैं, लेकिन बच्चे के भविष्य की चिंता होते ही अंग्रेजी माध्यम की ओर दौड़ पड़ते हैं।
विडंबना देखिए कि हिंदी बोलने वालों की संख्या बहुत बड़ी है, हिंदी का बाजार विशाल है, हिंदी में समाचार, मनोरंजन, साहित्य और डिजिटल सामग्री की भरमार है, लेकिन ज्ञान-विज्ञान, उच्च शिक्षा, तकनीक और रोजगार की दुनिया में हिंदी अभी भी अपने अधिकार हासिल नहीं कर पाई है। हम घर में हिंदी बोलते हैं, बाजार में हिंदी समझते हैं, मोबाइल पर हिंदी देखते-सुनते हैं, लेकिन बच्चे के भविष्य की चिंता होते ही अंग्रेजी माध्यम की ओर दौड़ पड़ते हैं। यह विरोधाभास हिंदी की सबसे बड़ी चुनौती है।
आज हिंदी लिखने के लिए क़लम और कागज़ ही ज़रूरी नहीं, बोलकर लिखने वाली तकनीक, स्वचालित अनुवाद और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने उसके लिए नई संभावनाओं के दरवाजे खोले हैं।
हिंदी एक ओर साहित्य के पारंपरिक संसार में कविता, कहानी, उपन्यास और आलोचना के रूप में जीवित है, तो दूसरी ओर वह मोबाइल स्क्रीन, सामाजिक माध्यमों, चलचित्रों, वेब सामग्री, पॉडकास्ट और डिजिटल पत्रकारिता में नए रूप गढ़ रही है। आज हिंदी लिखने के लिए क़लम और कागज़ ही ज़रूरी नहीं, बोलकर लिखने वाली तकनीक, स्वचालित अनुवाद और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने उसके लिए नई संभावनाओं के दरवाजे खोले हैं।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में जिस भाषा के पास विशाल और गुणवत्तापूर्ण सामग्री होगी, उसका भविष्य उतना ही मजबूत होगा
जिस भाषा में करोड़ों लोग सोचते और संवाद करते हैं, वह डिजिटल अर्थव्यवस्था की बड़ी भाषा बन सकती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में जिस भाषा के पास विशाल और गुणवत्तापूर्ण सामग्री होगी, उसका भविष्य उतना ही मजबूत होगा, इसलिए हिंदी को केवल भावनाओं की भाषा बनाए रखना उसके साथ न्याय नहीं होगा। उसे ज्ञान की, शोध की, विज्ञान की, तकनीक की और रोजगार की भाषा भी बनाना होगा।
हिंदी में लिखना और हिंदी को समृद्ध करना दो अलग बातें हैं। शब्दों की संख्या बढ़ने से भाषा समृद्ध नहीं होती; विचार, अभिव्यक्ति और ज्ञान की गुणवत्ता से होती है।
लेकिन यहां एक बड़ा खतरा भी है। इंटरनेट पर हिंदी सामग्री की मात्रा बढ़ रही है, गुणवत्ता नहीं। भाषा के नाम पर वर्तनी की मनमानी, अंग्रेजी के अनावश्यक शब्दों की भरमार, आधे-अधूरे अनुवाद और सनसनीखेज सामग्री हिंदी के डिजिटल संसार को कमजोर कर रहे हैं। हिंदी में लिखना और हिंदी को समृद्ध करना दो अलग बातें हैं। शब्दों की संख्या बढ़ने से भाषा समृद्ध नहीं होती; विचार, अभिव्यक्ति और ज्ञान की गुणवत्ता से होती है।
हिंदी जगत में आज सकारात्मक प्रयोग भी हो रहे हैं। नए लेखक डिजिटल माध्यमों से पाठकों तक पहुंच रहे हैं। साहित्य पुस्तकों की सीमाओं से निकलकर आडियो, वीडियो और सामाजिक माध्यमों तक पहुंच रहा है। हिंदी पत्रकारिता ने भी नए विषयों और नए पाठक वर्गों को जगह दी है। तकनीक ने छोटे शहरों और कस्बों के रचनाकारों को वह मंच दिया है जिसके लिए पहले बड़े प्रकाशन संस्थानों के दरवाजे खटखटाने पड़ते थे।
हिंदी को सम्मान मांगने की नहीं, अपनी उपयोगिता सिद्ध करने की जरूरत है
हिंदी के सामने सबसे गंभीर प्रश्न रोजगार और ज्ञान का है। जब तक किसी भाषा में उच्च गुणवत्ता की पाठ्य-पुस्तकें, वैज्ञानिक सामग्री, तकनीकी शब्दावली, शोध साहित्य और रोजगार से जुड़ी शिक्षा उपलब्ध नहीं होगी, तब तक उसके प्रति सम्मान भावनात्मक तो हो सकता है, व्यावहारिक नहीं। हिंदी को सम्मान मांगने की नहीं, अपनी उपयोगिता सिद्ध करने की जरूरत है। इसके लिए सबसे पहले शिक्षा व्यवस्था में मातृभाषा और भारतीय भाषाओं को मजबूती देनी होगी। बच्चों को ऐसी शिक्षा मिले जिसमें भाषा सीखना बोझ नहीं, सोचने की क्षमता विकसित करने का माध्यम बने। विश्वविद्यालयों में हिंदी में उच्च स्तरीय शोध को प्रोत्साहन मिले। विज्ञान, चिकित्सा, विधि, अर्थशास्त्र, प्रबंधन और तकनीक की श्रेष्ठ सामग्री हिंदी में उपलब्ध हो। अनुवाद को दोयम दर्जे का काम समझने की मानसिकता बदले और उत्कृष्ट अनुवादकों को उतना ही सम्मान मिले जितना मौलिक रचनाकारों को।
हिंदी पत्रकारिता की ताकत उसकी जीवंतता और जनभाषा में रही है
सरकार की भूमिका भी केवल हिंदी दिवस पर पुरस्कार बांटने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। सरकारी कामकाज की हिंदी सरल, स्वाभाविक और जनसुलभ हो। ऐसी दुरूह हिंदी किस काम की जिसे पढ़कर आम नागरिक शब्दकोश खोजने लगे ? हिंदी का सरकारीकरण नहीं, सरलीकरण होना चाहिए। मीडिया को भी आत्ममंथन करना होगा। हिंदी पत्रकारिता की ताकत उसकी जीवंतता और जनभाषा में रही है। उसे न तो अंग्रेजी की नकल बनने की जरूरत है और न कृत्रिम संस्कृतनिष्ठ भाषा का बोझ उठाने की। उसे वही हिंदी चाहिए जिसे पाठक पढ़कर यह महसूस करे कि यह उसकी अपनी आवाज़ है।
हिंदी साहित्य को भी अपने पाठकों से शिकायत करने के बजाय पाठक तक पहुंचने के नए रास्ते तलाशने होंगे। किताबें ज़रूरी हैं, लेकिन केवल किताबों तक सीमित रहना पर्याप्त नहीं। साहित्य को डिजिटल मंचों, श्रव्य माध्यमों और नए संचार माध्यमों से संवाद करना होगा। नई पीढ़ी की भाषा, उसके सवाल और उसकी बेचैनी साहित्य में दिखाई देनी चाहिए। हिंदी का भविष्य इस बात से तय नहीं होगा कि हिंदी दिवस पर कितने दीप जलाए गए, कितने भाषण हुए या कितने प्रमाणपत्र बांटे गए। उसका भविष्य इस बात से तय होगा कि कितने बच्चे हिंदी में सपने देखने के साथ-साथ उसमें विज्ञान पढ़ सकेंगे, कितने युवा हिंदी में ज्ञान अर्जित कर रोजगार पा सकेंगे, कितनी श्रेष्ठ तकनीकी सामग्री हिंदी में उपलब्ध होगी और कितनी दूर तक हिंदी डिजिटल दुनिया में अपनी स्वतंत्र पहचान बना पाएगी।
हिंदी का भविष्य इस बात से तय नहीं होगा कि हिंदी दिवस पर कितने दीप जलाए गए, कितने भाषण हुए या कितने प्रमाणपत्र बांटे गए। उसका भविष्य इस बात से तय होगा कि कितने बच्चे हिंदी में सपने देखने के साथ-साथ उसमें विज्ञान पढ़ सकेंगे, कितने युवा हिंदी में ज्ञान अर्जित कर रोजगार पा सकेंगे, कितनी श्रेष्ठ तकनीकी सामग्री हिंदी में उपलब्ध होगी और कितनी दूर तक हिंदी डिजिटल दुनिया में अपनी स्वतंत्र पहचान बना पाएगी।
हिंदी को बचाने की नहीं उसकी क्षमता को पहचानने की आवश्यकता है
आज हिंदी को बचाने की नहीं उसकी क्षमता को पहचानने की आवश्यकता है। वह पहले से जीवित, गतिशील और विस्तारशील भाषा है। चुनौती उसके अस्तित्व की नहीं, उसकी गुणवत्ता और प्रतिष्ठा की है, इसलिए हिंदी दिवस पर हिंदी के नाम पर केवल जयकारा न लगाएं। हिंदी में काम करने का संकल्प लें। हिंदी में श्रेष्ठ लिखें, श्रेष्ठ पढ़ें, श्रेष्ठ ज्ञान रचें और उसे नई तकनीक से जोड़ें। हिंदी को भावुकता के मंच से उतारकर व्यवहार, विज्ञान और बाजार की जमीन पर खड़ा करें क्योंकि भाषा का गौरव उसके अतीत की महिमा से नहीं, उसके भविष्य की उपयोगिता से तय होता है। बेशक, हिंदी दिवस उत्सव का एक दिन हो सकता है लेकिन हिंदी का भविष्य हर दिन, उसका प्रयोग करने, उसका सम्मान करने, उस पर गर्व करने और उसके विकास एवं समृद्धि में योगदान देने से तय होगा। (युवराज)डॉ. घनश्याम बादल