अंग्रेजी, औपनिवेशिक शासन की प्रशासनिक भाषा थी जबकि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएँ समाज और जनजीवन की भाषाएँ थीं। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की मांग के साथ यह तर्क दिया गया कि विदेशी शासन से मुक्ति के बाद शासन की भाषा भी भारतीय होनी चाहिए। दूसरी ओर, गैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों के प्रतिनिधियों को आशंका थी कि हिंदी को पूरे देश पर थोपने से उनकी भाषायी पहचान और अधिकार प्रभावित होंगे।
सितम्बर आते ही देश में हिंदी के प्रति उत्सवधर्मिता बढ़ जाती है। सरकारी कार्यालयों में हिंदी दिवस, हिंदी सप्ताह और हिंदी माह के आयोजन शुरू हो जाते हैं। प्रतियोगिताएँ होती हैं, पुरस्कार दिए जाते हैं और हिंदी के अधिकाधिक प्रयोग के संकल्प दोहराए जाते हैं। इस वर्ष भी गृह मंत्रालय का राजभाषा विभाग 14-15 सितम्बर 2026 को मुंबई में हिंदी दिवस समारोह और छठे अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन का आयोजन कर रहा है लेकिन ऐसे अवसर पर एक असुविधाजनक, किन्तु आवश्यक प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि जिस हिंदी को संविधान ने संघ की राजभाषा का दर्जा दिया, वह सात दशक बाद भी राष्ट्र की सर्वस्वीकृत भाषा क्यों नहीं बन सकी ? और क्या भारत में किसी भाषा को ‘राष्ट्रभाषा’ बनाने की संवैधानिक सम्भावना वास्तव में मौजूद है ? इस प्रश्न का उत्तर भारतीय संविधान और स्वतंत्र भारत के भाषायी इतिहास में मिलता है। स्वतंत्रता के बाद संविधान सभा के सामने सबसे कठिन प्रश्नों में एक यह था कि भारत की शासन-व्यवस्था की भाषा क्या हो। अंग्रेजी, औपनिवेशिक शासन की प्रशासनिक भाषा थी जबकि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएँ समाज और जनजीवन की भाषाएँ थीं। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की मांग के साथ यह तर्क दिया गया कि विदेशी शासन से मुक्ति के बाद शासन की भाषा भी भारतीय होनी चाहिए। दूसरी ओर, गैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों के प्रतिनिधियों को आशंका थी कि हिंदी को पूरे देश पर थोपने से उनकी भाषायी पहचान और अधिकार प्रभावित होंगे। अन्ततः सितम्बर 1949 में मुंशी-अय्यंगार समझौते के माध्यम से एक व्यापक सहमति बनी। 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को देवनागरी लिपि में संघ की राजभाषा स्वीकार किया। इसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति में 14 सितम्बर को हिंदी दिवस मनाया जाता है।
संविधान में ‘राष्ट्रभाषा’ शब्द का कोई प्रावधान नहीं है। इसलिए हिंदी की राजभाषा के रूप में संवैधानिक स्थिति और उसे राष्ट्रभाषा बनाए जाने की मांग को एक ही अर्थ में देखना उचित नहीं होगा।
लेकिन यहाँ एक संवैधानिक तथ्य को स्पष्ट समझना आवश्यक है। भारतीय संविधान ने हिंदी को ‘राष्ट्रभाषा’ नहीं बल्कि ‘संघ की राजभाषा’ कहा है। संविधान में ‘राष्ट्रभाषा’ शब्द का कोई प्रावधान नहीं है। इसलिए हिंदी की राजभाषा के रूप में संवैधानिक स्थिति और उसे राष्ट्रभाषा बनाए जाने की मांग को एक ही अर्थ में देखना उचित नहीं होगा। संविधान निर्माताओं ने भारत की भाषायी विविधता को स्वीकार करते हुए ऐसी व्यवस्था बनाई जिसमें हिंदी को संघ की राजभाषा का स्थान मिला, राज्यों को अपनी भाषाएँ चुनने का अधिकार मिला और अंग्रेजी के प्रयोग को भी तत्काल समाप्त नहीं किया गया। यह व्यवस्था भारतीय बहुभाषिकता और संघीय राजनीति के बीच संतुलन का परिणाम थी।
अनुच्छेद 343(2) में संविधान के प्रारम्भ से 15 वर्ष तक उन राजकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी के प्रयोग को जारी रखा जिनके लिए उसका प्रयोग पहले होता था। अनुच्छेद 343(3) ने संसद को यह अधिकार दिया कि वह कानून बनाकर इस अवधि के बाद भी अंग्रेजी के प्रयोग की व्यवस्था कर सके।
संविधान के भाग XVII में संघ और राज्यों की भाषा से सम्बन्धित प्रावधान किए गए हैं। अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। अनुच्छेद 343(2) में संविधान के प्रारम्भ से 15 वर्ष तक उन राजकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी के प्रयोग को जारी रखा जिनके लिए उसका प्रयोग पहले होता था। अनुच्छेद 343(3) ने संसद को यह अधिकार दिया कि वह कानून बनाकर इस अवधि के बाद भी अंग्रेजी के प्रयोग की व्यवस्था कर सके। इस प्रकार हिंदी को राजभाषा बनाते हुए अंग्रेजी से तत्काल संबंध-विच्छेद नहीं किया गया। अनुच्छेद 344 राजभाषा आयोग और संसद की समिति की व्यवस्था करता है। अनुच्छेद 345 राज्यों को अपनी राजभाषा निर्धारित करने की शक्ति देता है, जबकि अनुच्छेद 346 संघ और राज्यों तथा राज्यों के बीच आधिकारिक संचार की भाषा से सम्बन्धित है। अनुच्छेद 347 किसी राज्य की जनसंख्या के पर्याप्त हिस्से द्वारा बोली जाने वाली भाषा को विशेष मान्यता देने की व्यवस्था करता है। अनुच्छेद 348 सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों की कार्यवाही तथा विधिक दस्तावेजों में अंग्रेजी के प्रयोग से जुड़ा है। अनुच्छेद 349 भाषा सम्बन्धी कुछ विधेयकों के लिए विशेष प्रक्रिया निर्धारित करता है और अनुच्छेद 350 नागरिकों को अपनी शिकायतों के निवारण के लिए संघ या राज्य में प्रयुक्त किसी भी भाषा में अभ्यावेदन देने का अधिकार देता है। इस प्रकार संविधान की भाषा-व्यवस्था किसी एक भाषा के वर्चस्व के बजाय भाषायी सन्तुलन पर आधारित दिखाती है।
1953 में राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन न्यायमूर्ति फज़ल अली की अध्यक्षता में हुआ। इसके सदस्य एच.एन. कुंजरू और के.एम. पणिक्कर थे। आयोग ने 1955 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की और इसके बाद 1956 के राज्य पुनर्गठन अधिनियम ने भारत के राज्यों की संरचना में व्यापक परिवर्तन किया। इस पूरी प्रक्रिया ने स्पष्ट किया कि भारत का राष्ट्र-निर्माण भाषायी एकरूपता के आधार पर नहीं, बल्कि भाषायी विविधता के सम्मान पर आधारित है।
स्वतन्त्र भारत में भाषा का प्रश्न केवल हिंदी और अंग्रेजी के बीच का विवाद नहीं रहा। यह राज्यों की राजनीतिक पहचान और सांस्कृतिक अस्मिता से भी जुड़ गया। 1953 में तेलुगुभाषी क्षेत्र के आन्दोलन के बाद आन्ध्र राज्य का गठन हुआ और भाषायी आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की मांग तेज हो गई। 1953 में राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन न्यायमूर्ति फज़ल अली की अध्यक्षता में हुआ। इसके सदस्य एच.एन. कुंजरू और के.एम. पणिक्कर थे। आयोग ने 1955 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की और इसके बाद 1956 के राज्य पुनर्गठन अधिनियम ने भारत के राज्यों की संरचना में व्यापक परिवर्तन किया। इस पूरी प्रक्रिया ने स्पष्ट किया कि भारत का राष्ट्र-निर्माण भाषायी एकरूपता के आधार पर नहीं, बल्कि भाषायी विविधता के सम्मान पर आधारित है। दूसरे शब्दों में, भारतीय राष्ट्रवाद का आधार भाषायी एकरूपता(linguistic uniformity)नहीं, बल्किबहुभाषिक संघवाद(multilingual federalism)है।
शिक्षा, न्यायपालिका, विज्ञान और अन्तरराष्ट्रीय संचार की महत्त्वपूर्ण भाषा के रूप में अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया। इसे केवल हिंदी की विफलता के रूप में देखना उचित नहीं होगा; यह भारत की भाषायी विविधता और राजनीतिक सहमति की आवश्यकता का परिणाम भी था।
1950 और 1960 के दशक में हिंदी का प्रश्न फिर तीव्र राजनीतिक विवाद का विषय बना, विशेषकर दक्षिण भारत में। संविधान में निर्धारित 15 वर्षीय अवधि 26 जनवरी 1965 को समाप्त होनी थी। गैर-हिंदी भाषी राज्यों में यह आशंका बढ़ रही थी कि इसके बाद हिंदी प्रशासन की प्रमुख भाषा बन जाएगी और अंग्रेजी का स्थान समाप्त हो जाएगा। इन परिस्थितियों में राजभाषा अधिनियम, 1963 ने हिंदी के साथ अंग्रेजी के निरन्तर प्रयोग का मार्ग प्रशस्त किया। 1967 के संशोधन ने इस व्यवस्था को और मजबूत किया। परिणाम यह हुआ कि हिंदी संघ की राजभाषा बनी रही लेकिन अंग्रेजी ने संघीय प्रशासन, उच्च शिक्षा, न्यायपालिका, विज्ञान और अन्तरराष्ट्रीय संचार की महत्त्वपूर्ण भाषा के रूप में अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया। इसे केवल हिंदी की विफलता के रूप में देखना उचित नहीं होगा; यह भारत की भाषायी विविधता और राजनीतिक सहमति की आवश्यकता का परिणाम भी था।
त्रिभाषा सूत्र
इसी सन्तुलन को शिक्षा के क्षेत्र में त्रिभाषा सूत्र (Three-Language Formula) के माध्यम से आगे बढ़ाने का प्रयास किया गया। हिंदीभाषी क्षेत्रों में हिंदी, अंग्रेजी और एक अन्य आधुनिक भारतीय भाषा तथा गैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों में क्षेत्रीय भाषा, हिंदी और अंग्रेजी के अध्ययन की परिकल्पना की गई। 1968 के राजभाषा सम्बन्धी संकल्प ने भी इस दिशा को समर्थन दिया। इसका उद्देश्य केवल हिंदी का प्रसार करना नहीं था, बल्कि क्षेत्रीय भाषाओं की रक्षा, हिंदी के माध्यम से राष्ट्रीय सम्पर्क और अंग्रेजी के माध्यम से आधुनिक तथा अन्तरराष्ट्रीय ज्ञान से जुड़ाव के बीच सन्तुलन स्थापित करना था। हालांकि व्यवहार में त्रिभाषा सूत्र का क्रियान्वयन समान रूप से नहीं हो सका। कुछ हिंदीभाषी राज्यों में तीसरी भारतीय भाषा को अपेक्षित महत्त्व नहीं मिला, जबकि कुछ गैर-हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी के प्रति राजनीतिक प्रतिरोध बना रहा। तमिलनाडु ने मुख्यतः द्विभाषा नीति को प्राथमिकता दी।
फिर प्रश्न यह है कि सात दशक बाद हिंदी के सामने वास्तविक चुनौती क्या है? चुनौती केवल यह नहीं कि सरकारी कार्यालयों में हिंदी का कितना प्रयोग हो रहा है। असली चुनौती यह है कि हिंदी उच्च शिक्षा, शोध, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, विधि, अर्थशास्त्र, प्रशासन और डिजिटल ज्ञान की कितनी प्रभावी भाषा बन पाई है ? कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) और डिजिटल तकनीक के युग में हिंदी को केवल अनुवाद की भाषा बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता। उसे ज्ञान-निर्माण की भाषा बनाना होगा। इसके लिए मौलिक शोध, उच्च स्तरीय पाठ्यसामग्री, वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली, डिजिटल डेटाबेस तथा गुणवत्तापूर्ण हिंदी सामग्री का व्यापक निर्माण आवश्यक है।
हिंदी को मजबूत करने का अर्थ अन्य भारतीय भाषाओं को कमजोर करना नहीं हो सकता। सही दृष्टिकोण ‘हिंदी बनाम भारतीय भाषाएँ’ नहीं, बल्कि‘हिंदी के साथ भारतीय भाषाएँ’होना चाहिए।
हिंदी की शक्ति किसी संवैधानिक घोषणा से अधिक उसकी सामाजिक उपयोगिता और जनस्वीकृति में निहित है। भारत की राष्ट्रीय एकता किसी एक भाषा के वर्चस्व से नहीं, बल्कि अनेक भाषाओं, संस्कृतियों और परम्पराओं के सह-अस्तित्व से बनी है। इसलिए ‘राजभाषा से राष्ट्रभाषा’ की यात्रा को किसी संवैधानिक पदोन्नति के रूप में देखने के बजाय हिंदी की सामाजिक और बौद्धिक भूमिका के विस्तार के रूप में देखना चाहिए। हिंदी को मजबूत करने का अर्थ अन्य भारतीय भाषाओं को कमजोर करना नहीं हो सकता। सही दृष्टिकोण ‘हिंदी बनाम भारतीय भाषाएँ’ नहीं, बल्कि‘हिंदी के साथ भारतीय भाषाएँ’होना चाहिए। यही भारत की भाषायी विविधता, लोकतान्त्रिक संघवाद और राष्ट्रीय एकता के बीच वह सन्तुलन है जो हिंदी को केवल राजभाषा के रूप में नहीं बल्कि व्यापक भारतीय संवाद और ज्ञान की प्रभावी भाषा के रूप में आगे ले जा सकता है। (युवराज) डॉ. ब्रजेश कुमार मिश्र