आवारा कुत्तों के इन्सानों से रिश्ते क्यों बिगड़ रहे हैं ? क्या है वैज्ञानिक आधार ? AI
शिक्षा

आवारा कुत्तों के इन्सानों से रिश्ते क्यों बिगड़ रहे हैं ? क्या है वैज्ञानिक आधार ?

हाल ही के कुछ वर्षों में आवारा कुत्तों (स्ट्रीट डाग्स/फेरल डाॅग्स) द्वारा मनुष्यों को काटने की घटनाओं में वृद्धि के साथ ही मानव नवजात शिशु, बच्चों एवं कमजोर बुजुर्गों को नोंच कर मार डालने की घटनाओं से कुत्तों के नरभक्षी होते जाने की संभावना चिन्ता का विषय बनता जा रहा है। कुछ माह पूर्व देश के सर्वोच्च न्यायालय को आवारा कुत्तों की आक्रामकता रोकने हेतु (नियंत्रित करने हेतु) राज्य सरकारों को निर्देशित करना पड़ा। ये सब होने में समय लगेगा। आज की आवश्यकता इस बात की है कि आम और खास जनता कुत्तों की वास्तविकता और उनके बदलते व्यवहार को वैज्ञानिक दृष्टि से समझे।

प्राणियों के विकासवाद के क्रम में वर्तमान कुत्तों के पूर्वज एवं तत्कालीन विकासशील आदिमानवों के बारे में पुरातत्वीय खोजों के वैज्ञानिक शोधों के आधार पर वर्तमान मुद्दे को काफी हद तक समझा जा सकता है। यह लेख उपलब्ध ऐतिहासिक वैज्ञानिक तथ्यों पर अनुमानित है जिनका आधार विज्ञान के कई क्षेत्र है जैसे (इवोल्युशनरी बायलोजी, जिओलोजी, पेलेन्टोलाजी, ऐन्थ्रोपोलॉजी, कल्चरल इवोल्युशन आफ मेन, ह्यूमन डाॅग बॉण्डिंग) आदि विषयों के शोध पत्र, विकीपीडिया एवं समाचार पत्र आदि है। लेख को चार विभिन्न चरणों में वर्णित किया गया है।

आदिकाल से ही सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से विकसित हो रहे आदिमानवों से ही वर्तमान कुत्तों और भेड़ियों के साझा पूर्वज धूर्त भेड़िया प्रजाति ने उनके शरणस्थलों के आसपास रहना शुरू किया। इन्हें आदिमानवों द्वारा फेंके गये, बचे खुचे सड़े-गले, खराब होते भोजन जिसमें मांस एवं हड्डियाँ प्रमुख रूप से होती थी, आसानी से उपलब्ध थे।

चरण 1: आदिमानव और विलुप्त भेड़िये की पहली रणनीतिक साझेदारी

वर्तमान में विलुप्त किसी भेड़िया प्रजाति का आदिमानवों के सम्पर्क में आना। विकासवाद के ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार वर्तमान कुत्तों एवं भेड़ियों के साझा पूर्वज (काॅमन ऐन्सेस्टर्स) तत्कालीन भेड़ियों ने ही तत्कालीन आदिमानवों से नजदीकियाँ बढ़ाई थी। तत्कालीन आदिमानव घुमंतू एवं आखेटजीवी (Hunter-Gatherers) दर्जनों के समूहों में रहने वाली प्राणी थे जो वनोपजो फल, बैरीयों आदि को एकत्र करके मिल बाँटकर खाते थे (शेयरिंग)। कार्लमार्क्स ने इसे आदिम साम्यवाद (primitive communism) कहा था। ये आदिमानव प्राकृतिक चट्टानों के नीचे के शरण स्थलों व गुफानुमा स्थानों (शेल्टर्स) में रहा करते थे। ये आखेटजीवी भी थे। इनके द्वारा पाषाणयुग के शरणस्थलो के पत्थरों पर उकेरे गये चित्र विश्वभर में कई स्थानों पर पुरातत्वीय खोजों में पाये गये है। म.प्र. का भीमबेटका इसका अच्छा उदाहरण है। इन चित्रों में कुत्ते जैसे प्राणी का चित्र भी है। आदिकाल से ही सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से विकसित हो रहे आदिमानवों से ही वर्तमान कुत्तों और भेड़ियों के साझा पूर्वज धूर्त भेड़िया प्रजाति ने उनके शरणस्थलों के आसपास रहना शुरू किया। इन्हें आदिमानवों द्वारा फेंके गये, बचे खुचे सड़े-गले, खराब होते भोजन जिसमें मांस एवं हड्डियाँ प्रमुख रूप से होती थी, आसानी से उपलब्ध थे।

  यह रिश्ता करीब चालीस हजार वर्षों पूर्व प्रारम्भ होना माना गया जो कालान्तर में करीब पन्द्रह से बीस हजार वर्षों पूर्व सम्भवतः निम्न कारणों से एक सहजीवी रिश्ते में बदल जाना माना गया है। इन भेड़िया प्रजाति जो पूर्णतः अवसरवादी मांसाहारी शिकारी होने के कारण तत्कालीन आदिमानवों को इनके आसपास रहने से, शिकार के दौरान घायल मरणासन्न या मृत शिकार (पशु-पक्षी) को ढूँढ़ने में मदद मिलती होगी। इस तरह धूर्त आदि प्राचीनतम भेड़िये की आदिमानवों से प्रतियोगी प्रतिस्पर्धा (Competitive Interaction) एक सहजीवी बंधन (Symbiotic Relationship) में बदलती गई। इस तरह पुरापाषाण काल (Paleolithic) आदिमानवों जो विकसित हो ही रहे थे से तत्कालीन विकसित धूर्त भेड़ियों का रिश्ता एक तरह की महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदारी (Crucial Partnership) में बदल गया। आदिमानव इसके भावी परिणामों को कैसे समझता।

कम आक्रामक होने से आदिमानवों ने इनके प्रति घृणा और विमुखता के स्थान पर मददगार या उपयोगी प्राणी मान लेने की गलती की।

चरण 2: आनुवंशिक बदलाव और कम होती आक्रामकता

आदिमानवों के साथ पनप रहे भेड़ियों में कोई आनुवंशिकी परिवर्तन से वे कम आक्रामक होकर सहजीवी बने। आगामी वर्षों में उपरोक्त वर्णित आदि भेड़ियों-कुत्तों के साझापूर्वजों के किसी समूह के भेड़ियों के व्यवहार में अचानक से आये किसी परिवर्तन के कारण ‘फाइट एण्ड फ्लाइट’ अर्थात् झगड़ना-भाग जाना (सम्भवतः भोजन, मादा, क्षेत्र आदि के लिए) के स्थान पर कम आक्रामक होने से आदिमानवों ने इनके प्रति घृणा और विमुखता (Antipathy) के स्थान पर मददगार या उपयोगी प्राणी मान लेने की गलती की। ऐसा आनुवंशिकी परिवर्तन भेड़ियों के लिए आदिमानवों के साथ रहने के लिए विकासवाद की दृष्टि से उपयुक्त अर्थात् ‘Fitness Benefits’ सिद्ध होना माना गया।

ये प्रारम्भिक कुत्ते भी जो मूलतः अवसरवादी, मांसाहारी शिकारी थे, तत्कालीन आदिमानवों के आसपास रह कर उनके पालतू सहजीवी बने।

चरण 3: भेड़िये से 'कुत्ता' प्रजाति का जन्म

आदिमानवों के सहजीवी भेड़िया प्रजाति से कुत्ता प्रजाति बनकर अलग होना। कालान्तर में इन मददगार भेड़ियों के किसी समूह के भेड़िये/भेड़ियों के डीएनए (आनुवंशिकी पदार्थ) में परिवर्तन (म्यूटेशन) की वजह से कोई ऐसा बदलाव हुआ जिसे आनुवंशिकी विचलन (जेनेटिक डायवर्जन) हुआ अर्थात् इस भेड़िया प्रजाति के कुछ सदस्यों में ही डी.एन.ए. की भिन्नता/अन्तर आने से उनकी वह छोटी आबादी शेष सदस्यों से अलग-अलग हो गई और उनके सन्तति अन्त में एक नई प्रजाति अर्थात् प्रथम कुत्ते बन गये। भेड़ियों से प्रथम कुत्तों का अलगाव फिर उनका विकास करीब बीस हजार वर्षों से पूर्व का माना गया है। ये प्रारम्भिक कुत्ते भी जो मूलतः अवसरवादी, मांसाहारी शिकारी थे, तत्कालीन आदिमानवों के आसपास रह कर उनके पालतू सहजीवी बने। इसके पुख्ता सबूत उपलब्ध है, जैसे आदिमानवों के कंकालों के साथ कुत्तों के कंकाल मिलना।

युवाल नोआ हरारी की प्रसिद्ध पुस्तक ‘सेपियन्स’ (2018) में लिखा है कि मनुष्यों-कुत्तों का कई पीढ़ियों के साथ-साथ रहने के दौरान कुत्तों ने अपनी जरूरतों के लिए मनुष्यों को नियंत्रित करना सीख लिया था।

चरण 4: वफादारी का भ्रम और इंसानों को नियंत्रित करने की क्षमता

आदिमानवों द्वारा तत्कालीन कुत्तों को वफादार साथी मान लेने की भूल के कारण आदिकाल से ही कुत्ते मनुष्यों से लाभ उठाते आ रहे है क्योंकि कुत्तों का आदिमानवों से रिश्ता कृत्रिम चयन के बजाय सामाजिक चयन माना गया। यहीं से आदिमानवों से लेकर वर्तमान मानव समाज कुत्तों का सही आकलन करने में पूरी तरह विफल ही रहा है। कुत्तों व उनके पूर्वजों ने मनुष्यों को कभी महसूस ही नहीं होने दिया कि वे ही वास्तविक लाभार्थी (Beneficiary) है। युवाल नोआ हरारी की प्रसिद्ध पुस्तक ‘सेपियन्स’ (2018) में लिखा है कि मनुष्यों-कुत्तों का कई पीढ़ियों के साथ-साथ रहने के दौरान कुत्तों ने अपनी जरूरतों के लिए मनुष्यों को नियंत्रित करना सीख लिया था।

 कुत्तों में मनुष्यों को समझने की निम्न असाधारण क्षमताएं होती हैं और सम्भवतः इसी वजह से प्रारम्भ से ही अवसरवादी धूर्त कुत्तों के पूर्वज आदिमानवों के साथ रहने लगे थे। कुत्ते मनुष्यों के व्यवहार, स्वर, शारीरिक भाषा एवं चेहरे के भावों को समझ लेने से वे मनुष्यों के कार्यों का अनुमान लगा लेते है। कुत्ते मनुष्यों के चेहरे के भावों को भी समझ लेते है और उसी के अनुसार प्रतिक्रिया देते है। यह व्यवहार कुत्तों में मनुष्यों का मन-पढ़ने (माइंड रीडिंग) जैसा भ्रम मात्र पैदा कर सकता है। इसी समझ के परिष्कृत स्तर के कारण मानव- कुत्तों का बंधन मजबूत होता गया। कुत्ते मानवीय भावनाओं को पकड़ सकते हैं अर्थात् भांप सकते हैं, जिसे भावनात्मक संसर्ग (इमोशनल कन्टेजन) कह सकते है। इन्हीं गुणों के कारण कुत्ते आदिकाल से आज तक मनुष्यों के प्रभावी साथ बन कर सफलतापूर्वक रह रहे हैं।

सीधे शब्दों में आवारा कुत्तों के नरभक्षी बनने का खतरनाक दुर्गण पनपने लगा है। कुछ समय पूर्व एक वैज्ञानिक अध्ययन में कुत्तों को उनकी मूल प्रवृत्ति/स्वभाव अर्थात् अवसरवादी-शिकारी-मांसाहारी प्रवृत्ति की वापसी माना गया है।

चरण 5: मूल हिंसक प्रवृत्ति में वापसी और नरभक्षी होने का खतरा

वर्तमान समय में चिन्ता का विषय यह है कि विगत कई वर्षों में आवारा कुत्तों द्वारा मनुष्यों को काट लेने की घटनाओं में बढ़ोत्तरी होने के साथ ही इनके द्वारा नवजात, बच्चे, कमजोर-अकेले, बुजुर्गों को नोंचकर मार डालने तक की घटनाएँ सामने आई है। सीधे शब्दों में आवारा कुत्तों के नरभक्षी बनने का खतरनाक दुर्गण पनपने लगा है। कुछ समय पूर्व एक वैज्ञानिक अध्ययन में कुत्तों को उनकी मूल प्रवृत्ति/स्वभाव (Original Instinct) अर्थात् अवसरवादी-शिकारी-मांसाहारी प्रवृत्ति की वापसी (Reversal to Original Canine Instincts) माना गया है। (संदर्भ वेटेनरी सांइस, 10, 2023)।

विकासवाद के क्रम में मनुष्य सर्वोच्च (अपेक्स) स्थान पर होने की वजह उसके श्रेष्ठ मष्तिक की क्षमताएँ मानी गई है। Survival of the Fittest की होड़ तो विकास के दौरान मनुष्यों और कुत्तों पर समान रूप से प्रभावशाली कारण रहा है। कुत्तों के धूर्त पूर्वजों को अगर शतरंज का कुशल खिलाड़ी मान लिया जाये तो तत्कालीन आदिमानव जो स्वयं विकासशील थे, उन्हें शतरंज का नौसिखिया खिलाड़ी के अलावा कुछ नहीं माना जा सकता है। वक्त आ गया है कि मानव समाज व सरकार यह समझ लें कि समय रहते आवारा कुत्तों की आबादी तत्काल प्रभाव से कम करने की दिशा में कारगर उपाय किये जाएं, अन्यथा भविष्य में कुत्तों की आबादी और दुस्साहस इतना बढ़ जाएगा कि वे  मनुष्यों के नवजात, शिशु-बीमार लाचारों के अलावा घात लगाकर एकान्त/सुनसान जगहों पर गुजरने वाले मनुष्यों और किसी को भी मार कर खाने लगेंगे। (युवराज)

-डाॅ. एच.एस. राठौर

से.नि. आचार्य प्राणिकी (Zoology)

SCROLL FOR NEXT