आइये-आइये श्रीवास्तव जी, स्वागत है आपका। श्रीमती रमा ने घर आये मेहमानों व बच्चों का गर्मजोशी से सत्कार करते हुए अपने सुन्दर ड्राइंग room में बैठाया। वे स्वयं पानी इत्यादि लेने किचन में गई। तभी बेटे लक्की ने ड्राइंगरूम के कोने में एक टेबल पर रखी खूबसूरत ‘इमरजेन्सी लॉइट‘ को उठाकर देखा व धड़ाम से फर्श पर गिरा दी और देखते ही देखते लाइट का चूरा बन गया। तभी श्रीमती रमा झट दौड़ी हुई अन्दर से आयीं और मुंह बिचकाते हुए बोली, ‘ओह। ये क्या कर दिया बच्चे ने। हमने इसे फाॅरेन से मंगवाया था।‘
लक्की अपनी हरकतों से कई घरों में नुकसान कर चुका है और हर बार उनके मम्मी डैडी ‘सॉरी‘ कहकर अपनी झेंप मिटाने की कोशिश करते हैं। यही वजह है कि लक्की आठ साल की उम्र में इतना ज्यादा उत्पाती हो गया है कि मां-बाप भी उससे परेशान रहने लगे हैं। वे कोई भी बात हो जाने पर कहते हैं-क्या करें, बच्चा ही तो है अभी।
लक्की जैसे कई उद्दंड व शैतान बच्चों की घरों में कोई कमी नहीं होती। इतनी छोटी सी उम्र में ही ये बच्चे इतने अनियंत्रित हो जाते हैं कि उनके माता-पिता को लोगों के घर में जाकर शर्मसार होना पड़ता है। साथ ही कुछ माता-पिता यह कहकर भी कन्नी काटना चाहते हैं कि बड़ा होगा तो समझ जायेगा।
वैसे कोई भी बच्चा जन्म से भला या बुरा नहीं होता। परिस्थितियां व माता-पिता का व्यवहार व उनके द्वारा समय-समय पर दी गई नैतिक व व्यवहारिक शिक्षा व अच्छे संस्कारों से बच्चा उसमें ढलने लगता है। छोटा बच्चा तो उस गीली मिट्टी के समान होता है, जिसे आप किसी भी तरह का आकार देकर ढाल सकते हैं। बच्चा ज्यों-ज्यों बड़ा होता है, उसकी मूल प्रवृत्तियां, आसपास की प्रवृत्तियां तथा कार्यकलाप आयु के साथ-साथ आसपास के वातावरण से ही उसके व्यक्तित्व का निर्माण होता है। बच्चों के बचपन का समय ही यथायोग्य महत्वपूर्ण होता है व उसी दौरान उन्हें माता-पिता द्वारा तराशा जाता है जो आगे चलकर व्यक्तित्व में परिणित हो जाता है।
बच्चों में गलत हरकतें पनपने का मुख्य कारण ही यह होता है कि समय रहते माता-पिता उनके इस अव्यवहारिक व्यवहार को बड़े हल्के से लेते हैं। बच्चा अपनी गति विधियां बेहिचक बढ़ाता रहता है। छोटे बच्चों में असामान्य व्यवहार, गाली गलौज करना, मारपीट करना, पड़ी हुई वस्तुओं से छेड़छाड़ करना, बड़ों से जुबान लड़ाना, कहना न मानना इत्यादि कई बातें ऐसी होती हैं कि यदि समय रहते उन पर ध्यान न दिया जाये तो वे उच्छृंखल होते जाते हैं।
बच्चों में अनुकरण की प्रवृत्ति काफी कुशाग्र होती है और वे जैसा चाहते हैं वैसा ही करने को तत्पर रहते हैं। आजकल प्रायः बच्चों के प्रति माता-पिता की लापरवाही उजागर होती है, जो अपने कर्तव्य से विमुख होकर बच्चों की गतिविधियों से अनभिज्ञ रहते हैं लेकिन इस लापरवाही का खामियाजा अभिभावकों को ही अंततः भुगतना पड़ता है।
बच्चों को व्यवहार कुशल बनाने के लिए जरूरी है कि हम केवल उसकी पढ़ाई ही न देखें बल्कि वह जो करता है, उस पर नजर रखें। अक्सर बच्चे बुरी संगत व उद्दंड बच्चों के साथ रहकर बिगड़ते हैं। ऐसे बच्चे जिद्दी भी कुछ ज्यादा होते हैं। वे अपनी मनचाही बात घर व बाहर भी मनवाने के लिए इतना दबाव बना लेते हैं कि हारकर मां बाप उसके समक्ष झुकते नजर आते हैं।
जो बच्चे बाहर जाकर तोड़-फोड़ व नुकसान करते हैं निश्चित ही ऐसे बच्चे घरों में भी नुकसान पहुंचाते हैं। ऐसा व्यवहार करने वाले बच्चों को डराने, धमकाने व पीटने से भी कोई सीधा लाभ नहीं होता है क्योंकि वे थोड़ी देर तक ही अपने कुव्यवहार को रोके रखेंगे व मौका लगते ही फिर शुरू हो जायेंगे।
ऐसे हरकती बच्चों को सुधारने का सबसे अच्छा तरीका है कि उन्हें मनोवैज्ञानिक तरीके से समझाया जाये, व नफे-नुकसान का अंतर बतायें ताकि उनके दिमाग पर असर हो सके। बच्चों को गुस्से से नहीं, प्यार व आत्मीयता से समझायें। विशेषकर उन्हें यह सीख अच्छी तरह दी जाये कि आप दूसरों के घर जाकर किसी भी तरह की हरकतें न करें बल्कि चुपचाप बैठें। जितना पूछा जाये, उतना ही आगे वाले को जवाब दें। खाने- पीने की वस्तुओं पर भी एकदम टूट कर न पड़े। माता पिता का भी फर्ज बनता है कि वे अपने बच्चों को रोकें न कि ऐसा कहें कि खाने की चीज है तो खायेगा ही। यदि इन छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखा जाये व बच्चों को समझ आते ही व्यावहारिक ज्ञान की शिक्षा दी जाये तो काफी हद तक बच्चे बिगड़ने से बच सकते हैं। अच्छे और शिष्टाचार का पालन करने व व्यवहारिकता प्रदर्शन करने वाले बच्चों को सभी प्यार करते हैं। इससे न केवल आपकी ही प्रशंसा होगी बल्कि जहां भी बच्चों को साथ ले जायेंगे, वहां बच्चों के व्यवहार से सभी परिजन भी प्रभावित होंगे। (उर्वशी)चेतन चौहान