आनुवंशिक रोग है थैलेसेमिया सांकेतिक चित्र इंटरनेट से साभार
संजीवनी

आनुवंशिक रोग है थैलेसेमिया

सामान्य रूप से शरीर में लाल रक्त कणों की उम्र करीब 120 दिनों की होती है परन्तु थैलेसेमिया के कारण इनकी उम्र सिमटकर मात्रा बीस दिनों की ही हो जाती है और उसका सीधा प्रभाव शरीर में स्थित हीमोग्लोबिन पर पड़ता है।

सामान्य रूप से शरीर में लाल रक्त कणों की उम्र करीब 120 दिनों की होती है परन्तु

थैलेसेमिया के कारण इनकी उम्र सिमटकर मात्रा बीस दिनों की ही हो जाती है और

उसका सीधा प्रभाव शरीर में स्थित हीमोग्लोबिन पर पड़ता है। शरीर में हीमोग्लोबिन

की मात्रा कम हो जाने से शरीर दुर्बल हो जाता है तथा अशक्त होकर हमेशा किसी न

किसी बीमारी से ग्रसित रहने लगता है।

थैलेसेमिया नामक बीमारी प्रायः आनुवंशिक होती है। इस बीमारी का मुख्य कारण

रक्तदोष होता है। यह बीमारी बच्चों को अधिकतर ग्रसित करती है तथा उचित समय

पर उपचार न होने पर बच्चे की मृत्यु तक हो जाती है।

सामान्यतः एक स्वस्थ मनुष्य के शरीर में लाल रुधिर कोशिकाओं की संख्या 45 से 50

लाख प्रति घन मिलीमीटर होती है। लाल रुधिर कोशिकाओं का निर्माण लाल

अस्थिमज्जा में होता है। इन रुधिर कोशिकाओं में केन्द्रक नहीं होते एवं इनकी जीवन

अवधि 120 दिनों तक ही सीमित होती है। हीमोग्लोबिन की उपस्थिति के कारण ही

इन रुधिर कोशिकाओं का रंग लाल दिखाई देता है जबकि वास्तविकता यह होती है

कि रुधिर का स्वयं का रंग लाल नहीं होता।

लाल रक्त कोशिकाएं शरीर में श्वसन गैसों, ऑक्सीजन और कार्बनडाइऑक्साइड का

परिवहन करती हैं। हीमोग्लोबिन में ऑक्सीजन से शीघ्रता से संयोजन कर अस्थायी

योैगिक ऑक्सीहीमोग्लोबिन बनाने की क्षमता होती है। यह निरन्तर अपनी क्रियाओं

द्वारा फेफड़े की वायु में मौजूद ऑक्सीजन को श्वसन संस्थान तक पहुंचाते रहकर

मानव को जीवनदान देता रहता है। बच्चे के गर्भ में ठहर जाने

पर अगर उस बच्चे के अन्दर माता-पिता के द्वारा उचित मात्रा में हीमोग्लोबिन का अंश नहीं पहुंचता तो बच्चा थैलेसेमिया का शिकार हो जाता है।

इस बीमारी के शिकार बच्चों में रोग के लक्षण जन्म से 4-6 महीने में ही नजर आने

लगते हैं। बच्चे की त्वचा और नाखूनों में पीलापन आने लगता है, आंखें और जीभ

भी पीली पड़ने लगती है। उसके ऊपरी जबड़े में दोष आ जाता है और दांतों में

विषमताएं आने लगती हैं तथा दांत उगने में काफी कठिनाइयां होने लगती हैं।

बच्चे की त्वचा का रंग गहरा होने लगता है, चेहरे में भद्दापन आ जाता है, यकृत और

प्लीहा की लम्बाई बढ़ने लगती है तथा बच्चे का विकास एकदम रुक जाता है। कभी-

कभी चिकित्सक इन लक्षणों के आधार पर पीलिया (जॉन्डिस) रोग कायम करके

उपचार करना प्रारंभ कर देते हैं परन्तु बच्चे की हालत सही निदान न होने की वजह

से सुधरने की अपेक्षा और अधिक बिगड़ने लग जाती है।

अगर मां-बाप थैलेसेमिया माइनर रोग से ग्रस्त हैं, तब बच्चे को इस बीमारी की संभावना अधिक रहती है। अगर मां-बाप में से किसी एक को यह रोग है तो उनके बच्चे को मेजर होने की कोई संभावना नहीं रहती। माइनर का शिकार व्यक्ति सामान्य जीवन जीता है और उसे कभी इस बात का आभास तक नहीं होता कि उसके खून में कोई दोष है।

अगर मां-बाप थैलेसेमिया माइनर रोग से ग्रस्त हैं, तब बच्चे को इस बीमारी की

संभावना अधिक रहती है। अगर मां-बाप में से किसी एक को यह रोग है तो उनके

बच्चे को मेजर होने की कोई संभावना नहीं रहती। माइनर का शिकार व्यक्ति

सामान्य जीवन जीता है और उसे कभी इस बात का आभास तक नहीं होता कि

उसके खून में कोई दोष है। अगर उसकी पत्नी को यही विषमता हो, तब बच्चे को

थैलेसेमिया मेजर रोग हो सकता है लेकिन जब तक इस बात का पता चलता है तब

तक बहुत देर हो चुकी होती है। शादी से पहले अगर पति-पत्नी के खून की जांच हो

जाए तो शायद इस आनुवंशिक रोग से होने वाला बच्चा इससे बच जाए।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस रोग से ग्रसित बच्चे को बचाने के लिए औसतन तीन

सप्ताह में एक बोतल खून देना अनिवार्य हो जाता है। उसके शरीर को इतना खून

जिस समय मिलना बन्द हो जाता है, उसी समय उसके जीवन का अन्त हो जाता है।

लगातार खून चढ़ाे के कारण शरीर की मुख्य इन्द्रियों जैसे यकृत, प्लीहा, हृदय आदि में आवश्यकता से अधिक लौह तत्व इकट्ठे हो जाते हैं। यही लौह तत्व हृदय में विषमता पैदा कर देते हैं और हृदय काम करना बन्द कर देता है। परिणाम होता है रोगी की मौत।

अगर एक रोगी की औसत उम्र पचास वर्षों की ही मान ली जाए तो लगभग एक हजार

बोतल खून रोगी के जीवन काल में चढ़ाना आवश्यक हो जाएगा। अगर इतने भर से

ही परेशानी खत्म हो जाती तो भी बात अच्छी थी परन्तु लगातार खून चढ़ाने के

कारण शरीर की मुख्य इन्द्रियों जैसे यकृत, प्लीहा, हृदय आदि में आवश्यकता से

अधिक लौह तत्व इकट्ठे हो जाते हैं। यही लौह तत्व हृदय में विषमता पैदा कर देते

हैं और हृदय काम करना बन्द कर देता है। परिणाम होता है रोगी की मौत।

जब शरीर में आवश्यकता से अधिक लौह तत्वों की मात्रा हो जाती है तो उसे शरीर से

निकालने के लिए रोज एक इंजेक्शन देना आवश्यक हो जाता है। यह इंजेक्शन

‘इफ्यूजन पम्प’ की सहायता से दिया जाता है।

थैलेसेमिया के दो रूप होते हैं। एक को थैलेसेमिया मेजर और दूसरे को थैलेसेमिया

माइनर के नाम से जाना जाता है। मेजर की स्थिति में दो जीन खराब हो जाते हैं

जबकि माइनर में मात्रा एक जीन ही खराब होता है। वैज्ञानिक इस बीमारी पर

निरन्तर अनुसंधान कार्य कर रहे हैं और सस्ता से सस्ता उपचार भी खोजा जा रहा

है। अगर इस लौह तत्व के खत्म करने वाले तत्व पी.आई.एच. या फिरोजक्साल

आइसोनिकोटियाल हाइड्रोन पर अनुसंधान कार्य पूरा हो जाए तो रोगी की उम्र की

संभावनाएं अधिक बढ़ जाएंगी।

थैलेसेमिया से बचने के उपाय

रक्त परीक्षण करवाकर इस रोग की उपस्थिति की पहचान कर लेनी चाहिए।

शादी करने से पूर्व लड़का एवं लड़की के रक्त का परीक्षण अवश्य करवा लेना चाहिए।

नजदीकी रिश्ते में शादी-विवाह करने से परहेज रखना चाहिए।

माइनर थैलेसेमिया से बचने के लिए नीम के पत्तों का रस नियमित रूप से एक चम्मच

प्रातःकाल पीते रहना लाभदायक होता है।

हरी पत्तियों वाली सब्जी, विटामिन युक्त फल-सब्जियों का इस्तेमाल नियमित रूप से

भोजन में करते रहना चाहिए।

इस रोग के उन्मूलन के लिए सजगता एवं चेतना की आवश्यकता होती है अतः अपने

बच्चे को इन लक्षणों से युक्त पाते ही चिल्ड्रन हॉस्पिटल के चिकित्सकों से अतिशीघ्र

जाकर मिलना चाहिए। आनंद कुमार अनंत(स्वास्थ्य दर्पण)

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