शरद ऋतु गर्मी से सर्दियों की तरफ बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है।
प्रकृति में परिवर्तन के साथ हमारे शरीर में कई शारीरिक और हार्मोनल बदलाव होते हैं। शरीर में मेलाटोनिन का उत्पादन बढ़ने से सुस्ती बढ़ती है। शरीर में विटामिन डी का स्तर गिरता हे जो हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रभावित करता है। शरद ऋतु में परिवर्तन की स्थिति केवल मनुष्य में ही नहीं जड़ चेतन सभी को प्रभावित करता है। इस ऋतु में वृक्षों-वनस्पतियों में भी कायाकल्प देखा जाता है। साग सब्जियों से लेकर फल फूलों तक में बदलाव की स्थिति आती है। इस बदलाव की स्थिति में शरीर का संतुलन भी बदलता है।
शरद ऋतु रोगों की माला
वर्षा ऋतु का संचित पित्त शरद ऋतु में प्रकुपित होने लगता है जो हमारे पाचन तंत्र को प्रभावित कर पित्तज रोगों से आक्रांत कर देता है। अत: हमें इसके प्रति जागरूक होने की जरूरत होती है । पाचन तंत्र के दूषित होने से हमारे शरीर के सभी तंत्र संस्थान अर्थात् श्वसन तंत्र रक्त संवहन तंत्र, मूत्र प्रणाली तंत्र, जनन तंत्र सभी प्रभावित होने लगते हैं । यही कारण है कि इस ऋतु में हम विशिष्ट रोगों से आक्रांत होने लगते हैं। इसी को देखते हुए हमारे आयुर्वेद के आचार्यों ने शरद ऋतु को रोगों की माला के नाम से वर्णित किया है, तथा इसके लिए कुछ सुरक्षात्मक उपायों के पालन का निर्देशन किया।
पित्त कुपित हो जाता है
स्पष्ट है कि वर्षा ऋतु के बाद ही शरद ऋतु का आगमन होता है। अत: वर्षा ऋतु में संचित पित्त ही इस ऋतु में प्रकुपित होता है। इसलिए हमें पित्त दोष से बचने की समस्त प्रक्रिया को अपनानी होगी। पित्त प्रकोप के कारण हमारे शरीर में संक्रमण की स्थिति उत्पन्न होने लगती है जिससे पाचन तंत्र सबसे पहले प्रभावित हो जाता हे। इससे यकृत (लीवर), पित्ताशय, अग्नाशय, आंतों से लेकर मलाशय तक के रोगों की उत्पत्ति देखी जाती है। कभी भी वमन, विरेचन, आमदोष, अपच से लेकर उदर विकार के पश्चात वायरल ज्वरादि भी उत्पन्न हो जाता है।
जठराग्नि मंद हो जाने से संक्रमण के पश्चात कफ एवं सर्दी की भी स्थिति देखने को मिलती है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि यह ऋतु गर्मी तथा सर्दी के बीच की एक संक्रमणकालीन अवधि है।
वायु जनित व्याधियों का शमन
शरद ऋतु में केवल पित्त का प्रकोप ही नहीं होता है बल्कि वायु का शमन भी देखा जाता है। अत: वायुजनित व्याधियों में शरीर में कमी भी देखी जाती है। इस कमी के कारण हमें इस ऋतु में उत्सव मनाने का भी अवसर प्रदान होता है। शरद ऋतु के आगमन का स्वागत करते हुए हम शरदोत्सव मनाते हैं। वातादि दोषों के हिसाब से इस ऋतु में कफ दोष का अल्प संचय होता है लेकिन प्रकोप नहीं केवल संक्रमण की स्थिति में ही हम कफ रोगों से आक्रांत होते हैं। श्वास कष्ट से आक्रांत रोगी अवश्य प्रभावित होते हैं।
आंवला चूर्ण या त्रिफला चूर्ण
आयुर्वेद के आचार्यों ने शरद ऋतु में पित्त नाशक उपाय को अपनाने के लिए निर्देशित किया है, क्योंकि पित्त प्रकोप के कारण पेचिश, वमन, दस्त, ज्वर तथा संक्रामक रोग, मलेरिया, डेंगू जैसी उष्णता संबंधी बीमारियों की आशंका बढ़ जाया करती है। पित्त के शमन के लिए आंवला चूर्ण अथवा त्रिफला चूर्ण लेना चाहिए। ध्यान रहे पित्त दोष को प्रकुपित करने वाला खट्टी एवं तिक्त द्रव्यों के सेवन का त्याग करना चाहिए। जीरा, धनिया, सौंफ तथा मिश्री युक्त छाछ का सेवन लाभप्रद सिद्ध होगा । शरद पूर्णिमा के बाद च्यवनप्राश का सेवन अवश्य करना चाहिए जो रोग प्रतिकारण शक्ति को शरीर में बढ़ाता है।
शरद ऋतु के आरम्भ होते ही आयुर्वेद का एक विशिष्ट योग रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए हमें अवश्य सेवन करना चाहिए। बहुत ही सरल तथा रोग प्रतिरोधक के साथ स्वास्थ्यवर्द्धक योग है । आप स्वयं बनाएं तथा सेवन कर लाभ प्राप्त करें। यह जीवनीय क्षमता में वृद्धि करता है। रसायन की तरह कार्य करता है । शरीर के हर्मोन्स को दुरुसत करता है शरीर को निरोग रखते हुए स्वस्थ बलवान बनाकर हृष्ट पुष्ट करता है।
आप इसका नाम ‘शरद ऋतु रसायन’ कह सकते हैं- इसमें चार द्रव्यों का प्रयोग है-
1.अश्वगंधा-50 ग्राम
2. शतावर-50 ग्राम,
3.विफारा -30 ग्राम,
4. बड़ी पीपल-30 ग्राम।
निर्माण विधि- इन चारों द्रव्यों को अच्छी तरह साफ करके थोड़ा धूप दिखाकर महीन कुटाई पिसाई करके छान लें। अब इसमें अलग से 150 ग्राम धागे वाली मिश्री को महीन पीसकर अच्छी तरह से मिला लें। मिलाने के पश्चात तुरंत शीशी या डब्बे में सुरक्षित कर दें , हवा बिल्कुल न लगे।
सेवन विधि - इस रसायन को एक चम्मच सुबह - शाम गरम जल से कम से कम चालीस दिन तक लगातार सेवन करें। मेरी तरफ से शरद ऋतु का यह उपहार है । आप सेवन करें तथा अपने को निरोग बनाएं । आयुर्वेद का यही संदेश है- आपको बीमार ही न होने दें। ‘आयुर्वेद अपनाएं-स्वास्थ्य बनाएं।’
वैद्य राधेश्याम श्रीवास्तव (आयुर्वेदाचार्य कायचिकित्सक)