प्राणायाम करते समय डायफ्राम और पेट की मांसपेशियां बारी-बारी से खूब सिकुड़ती और फैलती हैं जिससे पाचन अंगों का अच्छी तरह व्यायाम हो जाता है।
-शारीरिक दृष्टि से प्राणायाम द्वारा इन मांसपेशियों और फेफड़ों का संस्कार होता है और कार्बन डाई ऑक्साइड गैस का भलीभांति निष्कासन हो जाता है।
-किसी भी मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि उसकी नाड़ियों में प्रवाहित होने वाले रक्त को प्रचुर मात्रा में आक्सीजन मिलती रहे।
-योगशास्त्र में बताई गई पद्धति के अनुसार प्राणायाम करने से रक्त को जितनी अधिक ऑक्सीजन मिलती है, उतनी अन्य किसी भी व्यायाम से नहीं मिलती।
-जो लोग अपनी श्वसन क्रिया को ठीक करने के लिए किसी प्रकार का अभ्यास नहीं करते, वे अपने फेफड़ों के कुछ अंशों से ही सांस लेते हैं, शेष भाग निकम्मा पड़ा रहता है।
-इस प्रकार निष्क्रिय रहने वाले अंश अधिकतर फेफड़ों के अग्र भाग होते हैं। इनमें वायु का संचार अच्छी तरह नहीं होता, फलतः टी. बी. के जीवाणु वहां आश्रय पाकर बढ़ने लगते हैं।
यदि प्राणायाम द्वारा फेफड़ों के हर भाग से काम लिया जाने लगे और उसका प्रत्येक कोष्ठक दिन में कई-कई बार शुद्ध हवा से धुल जाया करे तो फिर इन जीवाणुओं का आक्रमण असंभव हो जाएगा और स्वास्थ्य संबंधी इन रोगों से बचा जा सकता है।
रक्त संचार से संबंध रखने वाला प्रधान अंग हृदय है और प्राणायाम द्वारा उसके अधिक स्वस्थ हो जाने से समस्त रक्तवाहक अंग अच्छी तरह काम करने लगते हैं।
-आनन्द कुमार अनन्त (स्वा)