बुढ़ापे का रोग है अल्जाइमर सांकेतिक चित्र इंटरनेट से साभार
संजीवनी

बुढ़ापे का रोग है अल्जाइमर्स

मानसिक स्वास्थ्य

वृद्धावस्था जीवन का आखिरी पड़ाव है। इस समय जिंदगी ठहरने लगती है और शरीर

थकने लगता है। यह प्रकृति का नियम है। इसे न टाला जा सकता है, न इससे बचने

की कोई सूरत होती है।

इस समय बहुत कम लोग ही स्वस्थ रह पाते हैं। तरह-तरह के रोग घेर लेते हैं।

भौतिकवादी सभ्यता के कारण अब बड़े बूढ़ों की समाज में न इज्जत है न जरूरत।

यही कारण है कि लोग इस अवस्था से खौफ खाने लगे हैं। हर बुजुर्ग के मुंह से आप

यही सुनेंगे कि भगवान, हाथ पैर चलते ही उठा लेना।

इस उम्र में केवल शारीरिक क्षमता ही नहीं घटती, कई लोगों की इस उम्र में बौद्धिक

क्षमता भी घट जाती है। उसमें कॉमन है भूलने की आदत। इसके साथ ही सोचने

समझने की क्षमता भी कम होने लगती है। ऐसी स्थिति को डिमेंशिया कहते हैं। यह

एक बहुत ही करुणाजनक त्रासद स्थिति है। अपने जमाने का बेहद स्मार्ट,

प्रतिभाशाली, बुद्धिमान, कर्मठ जुझारू व्यक्ति इस रोग से ग्रस्त होकर असहाय हो

जाता है। डिमेंशिया होने के कई कारणों में से एक कारण अल्जाइमर्स रोग है।

अल्जाइमर्स रोग आनुवंशिक भी हो सकता है और वातावरण में जटिल अंतःक्रिया होने के

कारण भी हो सकता है। इसके लिए जो गुणसूत्र कारण होता है, वह मेडिकल साइंस

ने ढूंढ निकाला है।

गुणसूत्रों में बदलाव होने पर, मानसिक बीमारियों में एनेस्थीसिया दिए जाने से,

मानसिक आघात लगने पर इस रोग की शुरुआत हो सकती है। उम्र के इस पड़ाव पर

जीवन साथी की मृत्यु होने पर दूसरा साथी इस रोग की चपेट में आ सकता है।

कारण डिप्रेशन मस्तिष्क को वल्नरेबल बना देता है। खोया-खोया-उदास व्यक्ति तेज

तर्रार नहीं रह पाता और इस तरह उसके लिए इस रोग की आशंका बढ़ जाती है।

यह रोग एकदम अटैक नहीं करता बल्कि धीरे-धीरे शुरू होता है। महिलाओं में यह रोग

पुरुषों से ज्यादा पाया जाता है। इस रोग के लक्षण हैं याददाश्त कम होना, डिप्रेस्ड

और चिड़चिड़ा रहना तथा धीमी गति से छोटे कदम रख कर चलना। दिमागी अवस्था

रोगी की कार्यक्षमता पर असर डालती है। इस रोग में रोगी को हालिया घटी घटनाओं

से ज्यादा पुरानी सुदूर अतीत की बातें याद रहती हैं। उन्हें समय तारीख और स्थान

याद रखने में दिक्कत पेश आती है। न दिशाओं का ज्ञान रहता है न अपना रूटीन

वर्क। निर्णय लेने की क्षमता भी नहीं रहती। मतिभ्रम की सी स्थिति रहती है।

उचित देखभाल, इलाज और अपनत्व के अभाव में मरीज की हालत बदतर होने लगती

है। वे अब खाना भी नहीं खा पाते। एक ही जगह बुत से बैठे रह जाते हैं। उनकी

कम्युनिकेशन पावर (संवाद की शक्ति) बहुत कम हो जाती है। धीरे-धीरे से खत्म सी

हो जाती है। तब वे केवल कुछ समझ न आने जैसी अनर्गल बातें करने का प्रयत्न

करते हैं। बाद में एक स्टेज ऐसी भी आती है जब उनकी बोलने की शक्ति बिल्कुल

खत्म हो जाती है, चेहरा भावशून्य हो जाता है। वे किसी को भी पहचान नहीं पाते।

अंतिम स्टेज में रोगी एक जीवित लाश बनकर रह जाता है। न वह स्वयं खा पी सकता

है, न अपने नित्यकर्म कर सकने की स्थिति में रह जाता है। यहां तक कि उसका

हिलना डुलना व बॉडी मूवमेंट्स भी खत्म हो जाते हैं। शरीर की इम्युनिटी खत्म हो

जाने पर किसी भी रोग की चपेट में आ जाने पर वो ठीक नहीं हो पाता और दम

तोड़ देता है।

कई वृद्ध नॉर्मल अवस्था में भी अल्जाइमर्स के शुरुआती दौर की तरह बिहैव करते हैं

जिसे लोग सठियाना समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, इसलिए इस रोग को शुरुआती

दौर में पहचान पाना मुश्किल होता है लेकिन व्यवहार में बदलाव आसानी से पता

लग जाता है। ऐसा होने पर मस्तिष्क की एम आर आई, पी.ई.टी. जांच करवाई जानी

चाहिए ताकि रोग के बारे में पता लग सके।

वैसे तो यह रोग लाइलाज है लेकिन इतना जरूर है कि कुछ दवाओं के द्वारा रोग के

बढ़ने की स्पीड कम की जा सकती है। मरीज के साथ होने वाले व्यवहार से भी

उसकी हालत पर बहुत असर पड़ता है। मरीज का हौसला बना रहे, उसकी जिजीविषा

बनी रहे तो वो ज्यादा समय तक जी सकता है।

परिवार वालों को घर के लिए किए गए उसके त्याग, श्रम व समर्पण को भुला नहीं देना

चाहिए। वो घर का बुजुर्ग है, सम्मानीय है, यह मानकर उसके प्रति सहृदय बने रहें।

मरीज का एक रूटीन तय करके रखें और उसे सुपाच्य संतुलित भोजन दें। उसकी

देखभाल का भार किसी एक पर न डालकर सभी इसमें अपना योगदान दें क्योंकि यह

काम आसान नहीं। रोगी को कभी यह महसूस न होने दें कि वो नॉर्मल नहीं है।

उसका मनोबल टूटने न पाये, यह देखना घरवालों की जिम्मेदारी है।

उषा जैन शीरीं(स्वास्थ्य दर्पण)

SCROLL FOR NEXT