नृत्य एक कला ही नहीं, मनुष्य के अच्छे स्वास्थ्य के साथ-साथ उसके भावनात्मक संतुलन, रोगमुक्ति, प्रभावशाली व्यक्तित्व के निर्माण व जीवन के अन्य क्षेत्रों में सफलता प्राप्ति में भी महत्त्वपूर्ण है। नृत्य में चाहे वे शास्त्रीय नृत्य हों अथवा लोक नृत्य, अंग संचालन एक महत्वपूर्ण तत्व है। अंग संचालन का अर्थ ही है व्यायाम और व्यायाम से भौतिक शरीर की जड़ता समाप्त होकर शरीर में लचीलापन उत्पन्न होता है जो हमारे अच्छे स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है। नृत्य में निहित अंग संचालन हमारे स्वास्थ्य के लिए अत्यंत उपयोगी तत्व है। आइए नृत्य को अपनी जीवन शैली का अनिवार्य अंग बना लेने के लाभों पर विचार करते हैं-
नृत्य के लिए शरीर को अधिक मात्रा में ऑक्सीजन की आवश्यकता पड़ती है अतः नृत्य को वातापेक्षी व्यायाम के समकक्ष माना गया है। इससे नृत्य करने वाले को प्राणायाम के लाभ भी स्वाभाविक रूप से प्राप्त हो जाते हैं।
योग एक संपूर्ण उपचार पद्धति है। व्यायाम योग में वर्णित तीसरे अंग आसन का ही एक रूप है। जड़ता चाहे भौतिक शरीर की हो अथवा मन-मस्तिष्क की, वह स्वयं में एक बहुत बड़ी व्याधि व अन्य अनेकानेक शारीरिक व मनोदैहिक व्याधियों का उद्गम है। नृत्य के अभ्यास अथवा प्रदर्शन के दौरान व्यक्ति का थकना भी स्वाभाविक है। उसकी साँसों का प्रवाह तीव्र हो जाता है। नृत्य के लिए शरीर को अधिक मात्रा में ऑक्सीजन की आवश्यकता पड़ती है अतः नृत्य को वातापेक्षी व्यायाम के समकक्ष माना गया है। इससे नृत्य करने वाले को प्राणायाम के लाभ भी स्वाभाविक रूप से प्राप्त हो जाते हैं।
जब नृत्य करने वाला व्यक्ति अपना सारा ध्यान अन्य चीज़ों से हटा कर नृत्य पर एकाग्र करता है तो वह वास्तव में माध्यम परिवर्तित करके प्रत्याहार व धारणा का अभ्यास ही कर रहा होता है जो क्रमशः योग के पाँचवें व छठे अंग के ही रूप हैं।
जब नृत्य करने वाला व्यक्ति अपना सारा ध्यान अन्य चीज़ों से हटा कर नृत्य पर एकाग्र करता है तो वह वास्तव में माध्यम परिवर्तित करके प्रत्याहार व धारणा का अभ्यास ही कर रहा होता है जो क्रमशः योग के पाँचवें व छठे अंग के ही रूप हैं। एकाग्रता तो ध्यान के समकक्ष है ही। इस प्रकार योग के सभी अंग नृत्य में समाहित हैं और एक अच्छा नृत्य करने वाला योगी से किसी भी तरह कम नहीं ठहरता । नृत्य रूपांतरण का साधन भी है। नृत्य में थकान के उपरांत विश्राम के क्षणों में शवासन के लाभ प्राप्त किए जा सकते हैं। शरीर व मन की शांत-स्थिर अवस्था में व्यक्ति जैसा सोचता है, वही जीवन की वास्तविकता में परिवर्तित हो जाता है अतः नृत्य के उपरांत इन महत्त्वपूर्ण क्षणों को जीवनोपयोगी रूपांतरण के लिए प्रयोग किया जा सकता है। नृत्य में अंग संचालन मनमाने तरीके से नहीं किया जाता। उसमें शरीर के विभिन्न अंगों की गति नियत व निश्चित होती है।
यदि मस्तिष्क सक्रिय नहीं तो हमारा शरीर भी स्वस्थ नहीं रह सकता। मस्तिष्क द्वारा ही हमारी सारी गतिविधियों का संचालन व नियंत्रण होता है। नृत्य के द्वारा हमारे मस्तिष्क की सक्रियता व एकाग्रता का विकास होता है।
हर नृत्य एक चरणबद्ध तरीके से किया जाता है। कौन सा चरण कब करना है, कैसे करना है, कितनी देर करना है और कहाँ कितना रुकना है, सब पूर्व निर्धारित होता है। अतः नृत्य के दौरान शरीर के सभी अंग-उपांग ही नहीं, मस्तिष्क भी अत्यंत सक्रिय रहता है। मस्तिष्क की सक्रियता बहुत अनिवार्य है। यदि मस्तिष्क सक्रिय नहीं तो हमारा शरीर भी स्वस्थ नहीं रह सकता। मस्तिष्क द्वारा ही हमारी सारी गतिविधियों का संचालन व नियंत्रण होता है। नृत्य के द्वारा हमारे मस्तिष्क की सक्रियता व एकाग्रता का विकास होता है। एकाग्रता की अवस्था में हमारे शरीर में उपयोगी रसायनों का उत्सर्जन प्रारंभ हो जाता है जिससे न केवल हमारे शरीर को अच्छा अनुभव होता है अपितु हमारी रोगावरोधक क्षमता का विकास भी होता है। इससे हम विभिन्न व्याधियों से बचे रहते हैं और रोग की अवस्था में शीघ्र रोगमुक्त हो जाते हैं।
कई नृत्य ऐसे भी होते हैं जिनसे व्यक्ति अनेक घातक रोगों व मनोविकारों से मुक्त होकर भावनात्मक रूप से संतुलित व मजबूत बनता है। यही संतुलन व मजबूती उसके शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी अपेक्षित है क्योंकि भावनात्मक रूप से असंतुलित व्यक्ति अथवा एक मनोरोगी का शारीरिक स्वास्थ्य कभी भी अच्छा नहीं हो सकता ।
कई नृत्य ऐसे भी होते हैं जिनसे व्यक्ति अनेक घातक रोगों व मनोविकारों से मुक्त होकर भावनात्मक रूप से संतुलित व मजबूत बनता है। यही संतुलन व मजबूती उसके शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी अपेक्षित है क्योंकि भावनात्मक रूप से असंतुलित व्यक्ति अथवा एक मनोरोगी का शारीरिक स्वास्थ्य कभी भी अच्छा नहीं हो सकता । मोटापा अथवा स्थूलकायता आज पूरे विश्व में महामारी की तरह फैल रहा है। इससे हमारी चुस्ती-स्फूर्ति के स्तर में कमी आती है और जीवन में नीरसता व्याप्त हो जाती है अतः यह हमारे व्यक्तित्व को भी बुरी तरह से प्रभावित करता है। नृत्य द्वारा न केवल मोटापे से मुक्ति पाकर चुस्ती-स्फूर्ति पाई जा सकती है अपितु छरहरा शरीर व प्रभावशाली व्यक्तित्व भी प्राप्त किया जा सकता है। नृत्य की इन्हीं विशेषताओं अथवा प्रभावों के कारण ही पूरे विश्व में विभिन्न धार्मिक अथवा सामाजिक आयोजनों के अवसर पर विभिन्न प्रकार के विशिष्ट नृत्यों के प्रदर्शन की परंपरा का विकास हुआ है। मनुष्य के समग्र उपचार व रूपांतरण में नृत्य के महत्त्व की उपेक्षा संभव नहीं, अतः नृत्य को अपनी जीवन शैली का अंग बना लेना ही श्रेयस्कर होगा। -सीताराम गुप्ता(स्वास्थ्य दर्पण)