अब पारंपरिक चिकित्सा का उपयोग कर इलाज को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने एक ऐसी पहल की है जिसका लाभ दुनियाभर के करोड़ों लोगों को मिल सकेगा। भारत के लिए यह इस मायने में खास मानी जा सकती है क्योंकि यहां आज भी लोग इलाज पर ना बराबर पैसा खर्च करते हैं और बीमारियों का इलाज आधुनिक चिकित्सा पद्धति से कराने के बजाए पारंपरिक चिकित्सा पद्धति से इलाज कराना पसंद करते हैं। दरअसल दुनिया भर में पारंपरिक चिकित्सा का उपयोग करने वाले अरबों लोगों के बावजूद स्वास्थ्य शोध बजट का एक प्रतिशत से भी कम हिस्सा मिलता है। इस सबको ध्यान में रखते हुए (डब्ल्यूएचओ) ने पारंपरिक चिकित्सा पर वैज्ञानिक शोध बढ़ाने और सुरक्षित इलाज सुनिश्चित करने के लिए 2025 से 2034 तक की वैश्विक योजना जारी की। शोध में लकवा, मानसिक स्वास्थ्य, कैंसर, दर्द, हड्डियों की बीमारियों और प्रजनन स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण विषयों को प्राथमिकता देने की बात कही गई है। इस योजना का उद्देश्य पारंपरिक चिकित्सा की सुरक्षा, प्रभाव और उपयोगिता को समझना तथा स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाना है।
डब्ल्यूएचओ के अनुसार दुनिया भर में स्वास्थ्य शोध पर खर्च होने वाली कुल राशि का एक प्रतिशत से भी कम हिस्सा पारंपरिक चिकित्सा को समझने के लिए दिया जाता है। शोधकर्ताओं की संख्या भी बहुत कम है। योजना में कई ऐसी बीमारियों और स्वास्थ्य समस्याओं को प्राथमिकता दी गई है जिनका असर बड़ी संख्या में लोगों पर पड़ता है। इनमें लकवा, मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं, दर्द, हड्डियों और मांसपेशियों से जुड़ी बीमारियां, कैंसर संबंधी रोग और प्रजनन स्वास्थ्य शामिल हैं। इसके साथ ही बच्चों, बुजुर्गों और बीमारी से बचाव के उपायों पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा। शोध के माध्यम से यह पता लगाने का प्रयास होगा कि पारंपरिक चिकित्सा इन समस्याओं की रोकथाम, उपचार और बीमारी के बाद स्वास्थ्य सुधारने में कहां उपयोगी हो सकती है।
डब्ल्यूएचओ का कहना है कि पारंपरिक चिकित्सा के बारे में वैज्ञानिक प्रमाण जुटाना जरूरी है। इससे सरकारों को यह तय करने में मदद मिलेगी कि किन उपचारों को स्वास्थ्य सेवाओं में शामिल किया जा सकता है और किन तरीकों से मरीजों को नुकसान हो सकता है। शोध में वास्तविक जीवन से मिलने वाले स्वास्थ्य आंकड़ों, डिजिटल तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और नए वैज्ञानिक तरीकों का भी उपयोग किया जाएगा। इससे पारंपरिक चिकित्सा के अलग.अलग पहलुओं को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिल सकती है। योजना में आदिवासी समुदायों और पारंपरिक ज्ञान रखने वाले लोगों की भागीदारी को भी महत्वपूर्ण बताया गया है।
परंपरा, प्रमाण और वैश्विक स्वास्थ्य तक आयुर्वेद की पहुंच
भारत में बहुसंख्यक आबादी वैकल्पिक चिकित्सा के तौर पर आयुर्वेद को सदियों से अपनाती रही है। भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय द्वारा एक रिलीज में कहा गया है कि बढ़ती आयुष अर्थव्यवस्था, घरेलू स्तर पर बढ़ती स्वीकार्यता, चिकित्सा मूल्य यात्रा और अनुसंधान आयुर्वेद के वैश्विक विस्तार के नए अवसर खोल रहे हैं। आयुर्वेद वैश्विक स्वास्थ्य से जुड़ी चर्चाओं में हाशिए से निकलकर अब मुख्यधारा की ओर बढ़ रहा है। भारत की विस्तारित आयुष अर्थव्यवस्था पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के घरेलू स्तर पर बढ़ते उपयोग तथा वेलनेस और चिकित्सा मूल्य यात्रा में बढ़ती रुचि आयुर्वेद के लिए नए अवसर पैदा कर रही है। आयुष बाजार वर्ष 2014 में 2.85 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर वर्ष 2023 में 43.4 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया जबकि इसी अवधि में आयुष निर्यात 1.09 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2.16 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया।
घरेलू स्तर पर बढ़ती स्वीकार्यता
सरकार की पहलों में एमएसएमई और स्टार्टअप को सशक्त बनाने पर भी ध्यान केन्द्रित किया गया है जिससे इस क्षेत्र में उद्यमिता, नवाचार और निवेश के लिए एक व्यापक इकोसिस्टम विकसित करने में मदद मिली है। आयुष पद्धतियों की घरेलू स्तर पर बढ़ती स्वीकार्यता इस विस्तार के लिए एक और महत्वपूर्ण आधार प्रदान करती है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) द्वारा जुलाई 2022 से जून 2023 के दौरान आयुष पर किए गए पहले विशेष अखिल भारतीय सर्वेक्षण में 1,81, 298 परिवारों को शामिल किया गया जिनमें 1,04,195 ग्रामीण और 77,103 शहरी परिवार थे। सर्वेक्षण में ग्रामीण क्षेत्रों में 94.8 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 96 प्रतिशत आयुष जागरूकता दर्ज की गई। इसमें यह भी पाया गया कि पिछले 365 दिनों के दौरान 46.3 प्रतिशत ग्रामीण निवासियों और 52.9 प्रतिशत शहरी निवासियों ने उपचार या रोकथाम के लिए आयुष का उपयोग किया था। उपचार के लिए आयुर्वेद सबसे अधिक उपयोग की जाने वाली आयुष पद्धति के रूप में उभरा जो इसके मजबूत घरेलू आधार तथा निवारक स्वास्थ्य देखभाल और वेलनेस में इसके योगदान की संभावनाओं को दर्शाता है। (युवराज)पुनीत उपाध्याय