श्रीरामचरितमानस की हर एक चौपाई एक ग्रंथ कहती जान पड़ती है। इसका अध्ययन व्यापक है, इसमें भक्ति की गहराई है, अध्यात्म का रंग है जो किसी पर एक बार चढ़ गया तो उतरने वाला नहीं है। मानस की ज्ञान गंगा में गोता लगाने के बाद जीव भवसागर से पार उतर जाता है। भगवान श्रीराम ने वनवास के समय उत्तर से दक्षिण की यात्रा करते हुए कितनी ही पवित्र नदियों में स्नान किया, उनके किनारे बैठ कर तप, भक्ति, साधना, तपस्या की और वहीं पर कुछ समय के लिए वास भी किया। इन नदियों के किनारे रहने वाले साधु, संत, महात्मा आदि के भगवान ने दर्शन किये, उनसे आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया। साथ ही इन नदियों के किनारे रहने वाले लोगों को भगवान श्रीराम ने स्वयं दर्शन दिए। सभी से मिलते हुए भगवान इन नदियों को पार करके आगे बढ़ते चले गए। इन नदियों का रामायण में और भगवान श्रीराम के जीवन में विशेष आध्यात्मिक और भौगोलिक महत्व है।
अयोध्या नगरी की बात करें तो यह सरयू नदी के तट पर बसी हुई है। रामचरितमान में गोस्वामी जी लिखते हैं कि,
बंदउँ अवध पुरी अति पावनि।
सरजू सरि कलि कलुष नसावनि॥
माना यह जाता है कि सरयू नदी हिमालय में मानसरोवर के पास से निकलती है। अयोध्या को सप्तपुरियों में से एक माना जाता है। चौदह वर्ष के वनवास के समय भगवान श्रीराम नेअयोध्या से निकलने के बाद सबसे पहले तमसा नदी के तट पर विश्राम किया।जब श्रीराम वनवास के लिए निकले तो अयोध्या के नगरवासी भी उनके पीछे-पीछे चल दिए। तब श्रीराम ने तमसा के तट पर रुकने का निर्णय लिया। गोस्वामी जी लिखते हैं कि
तब प्रभु तमसा तीर निवासा।
कयउ प्रथम बास सुभ पासा।।
नगरवासी श्रीराम को वापस ले जाने की प्रतीक्षा में वहीं सो गए थे। उन्हें सोते हुए छोड़कर जब प्रभु आगे बढ़े, तब का वर्णन इस प्रकार है-
तियँ अरु वृद्ध बिहाइ बिहान।
गए रामु तमसा तट जान।।
तमसा तीर त्यागि प्रभु गए।
रघुबर सखा सहित सिय भए।।
आध्यात्मिक दृष्टि से तमसा वह स्थान है जहाँ से प्रभु ने सांसारिक मोह (नगरवासियों का प्रेम) को पीछे छोड़कर अपने वनवास के कर्तव्य की ओर प्रस्थान किया था।
अयोध्या की सीमा पार करते समय श्रीराम ने वेदश्रुति और गोमती नदियों को पार किया। शृंगवेरपुर में केवट ने श्रीराम, लक्ष्मण और सीता जी को अपनी नाव से गंगा पार कराई थी। प्रयागराज में ऋषि भरद्वाज से ज्ञान, भक्ति आदि प्राप्त कर आगे बढ़े। वहीं से भगवानश्रीराम ने यमुना पार की और प्रयागराज पहुंचे। गोस्वामी जी ने मानस में प्रयागराज के लिए अनेक शब्दों का प्रयोग किया है, जिनमें एक शब्द तीरथराज भी है।
कहि सिय लखनहि सखहि सुनाई।
श्रीमुख तीरथराज बड़ाई॥
करि प्रनामु देखत बन बागा।
कहत महातम अति अनुरागा ॥
कहने का भाव यह है कि भगवान श्रीराम ने अपने श्रीमुखसे सीताजी, लक्ष्मणजी और सखा गुह को तीरथराज (प्रयागराज)की महिमा कहकर सुनायी।
प्रयागराज के बाद भगवान ने चित्रकूट की ओर प्रस्थान किया। मध्य भारत और दंडकारण्य की नदियों पर बात करें तो सबसे पहले मंदाकिनी नदी आती है। चित्रकूट में वनवास के दौरान भगवान श्रीराम मंदाकिनी नदी के किनारे कुटिया बनाकर रहे।
"नदी पुनीत सुहावनि पावन।
मज्जनु कीन्ह राम मन भावन॥
सुरसरि धार नाउँ मंदाकिनि।
जो सब पातक पोतक डाकिनि॥"
मंदाकिनी नदी अत्यंत पवित्र और सुंदर है, जो मन को भाने वाली है। जो पापों को नष्ट करने में डाकिनी (विनाशक) के समान है। यहीं रहते हुए भगवान ने कामदगिरि पर्वत की पूजा की। मध्य प्रदेश के जंगलों से गुजरते हुए भगवान श्रीराम ने जीवनदायिनी नर्मदा नदीके तटों पर भ्रमण किया। छत्तीसगढ़ (दक्षिण कौशल) के क्षेत्र में वनवास का एक बड़ा हिस्सा महानदी के जलग्रहण क्षेत्रों में बिताया।
दक्षिण भारत की प्रमुख नदियों की बात करें तो नासिक (पंचवटी) में श्रीराम ने गोदावरी नदी के तट पर रहे। रामायण की कई मुख्य घटनाएँ इसी नदी के किनारे घटी।
सुरसरि सरसइ दिनकर कन्या।
मेकलसुता गोदावरि धन्या॥
हम्पी (किष्किंधा) के पास तुंगभद्रा नदी के किनारे भगवान श्रीराम की भेंट हनुमान जी और सुग्रीव से हुई। रामायण में इसे 'पम्पा सरोवर' के क्षेत्र से भी जोड़ा जाता है।
पंपा सरहि जाहु रघुराई।
तहँ होइहि सुग्रीव मिताई॥
दक्षिण की ओर बढ़ते हुए श्रीराम ने कावेरी की सहायक धाराओं के निकटवर्ती क्षेत्रों को पार किया। विचार करें तो इन नदियों के किनारे आज भी कई प्राचीन मंदिर और आश्रम स्थित हैं, जो उस कालखंड की स्मृति दिलाते हैं। -डॉ. नीरज भारद्वाज (युवराज)