मनुष्य आदिकाल से ही प्रकृति की अद्भुत देन हिमाच्छादित पर्वतों की ओर आकर्षित
होता रहा है। हिमालय क्षेत्र दूर से देखने में जितना भव्य और आकर्षक है, नजदीक
से उतना ही दुर्गम और कठिन प्रदेश है । यहाँ की ठंडी हवा, ऑक्सीजन की कमी,
अत्यधिक ऊंचाई के कारण यहाँ पहुँचना कठिन है। शायद इसी वजह से देवी-देवताओं
की दृष्टि हिमालय पर पड़ी और उन्होंने इस पर्वतमाला पर अपना वास बना लिया
ताकि लोग उनकी तपस्या में बाधा न डालें। फिर भी साहसी श्रद्धालु सैकड़ों
किलोमीटर की यात्रा कर घने जंगल, नदी-नालों, पहाड़ों की ऊंची चढ़ाई को चढ़कर
देवताओं के दर्शन के लिए पहुँच ही जाते हैं।
उत्तरांचल में हरिद्वार से 328 किलोमीटर उत्तर में 10248 फुट की ऊंचाई पर नारायण पर्वत बद्रीनाथ धाम के नाम से जाना जाता है।
सदियों से देवभूमि अर्थात् उत्तरांचल हिन्दुओं के लिए तीर्थ स्थल रहा है। बद्रीनाथ धाम
की यात्रा की शुरुआत देवताओं की नगरी हरिद्वार से करते हैं। हरिद्वार में गंगा-
स्नान करके श्रद्धालु आगे की यात्रा प्रारंभ करते हैं। बद्रीधाम जाने के लिए हरिद्वार,
ऋषिकेश, श्रीनगर (गढ़वाल), पीपल कोठी तथा जोशीमठ होते हुए पहुँचा जा सकता
है।
जैसे-जैसे ऋषिकेश से आगे बढ़ेंगे, सड़क के दाहिनी ओर हजारों फुट नीचे बहती
गंगा की आवाज सुनाई देती है। चारों तरफ हरियाली, खूबसूरत नीला आकाश, फूलों
की खुशबू और पहाड़ की ताजा हवा आपको मंत्रमुग्ध कर देगी। बलखाती हुई सड़क
श्रीनगर (गढ़वाल) होते हुए आगे की ओर बढ़ती जाती है। कुछ और आगे बढ़ते ही
दृश्य बदला हुआ दिखता है। पेड़ छोटे होते जाते हैं और ठंड बढ़ती जाती है।
अलकनंदा और मंदाकिनी के संगम देवप्रयाग और उसके बाद रुद्रप्रयाग होते हुए हम
पीपल कोठी पहुंचे। पीपल कोठी से जोशीमठ की दूरी मात्रा 35 किलोमीटर है।
ज्यादातर तीर्थयात्री तथा प्रकृति प्रेमी पीपल कोठी में ही रुकना पसंद करते हैं। यहाँ
चारों ओर हरियाली, पहाड़ पर बने छोटे-छोटे घर, रंग-बिरंगे फूल आपका मन मोह
लेंगे। पीपल कोठी से जोशीमठ पहुँचकर बद्रीधाम की यात्रा आरंभ होती है। तीर्थ
यात्रियों के लिए जोशीमठ का भी अत्यधिक महत्व है।
हिन्दुओं के चारों धाम में से एक महत्त्वपूर्ण श्री बद्रीशाला का मंदिर सामने पूर्व में नर
पर्वत के दर्शन करते हुए स्थापित है। मंदिर के ठीक पीछे में खूबसूरत हिमाच्छादित
नीलकंठ पर्वत श्री बद्रीविशाल के मंदिर को और अलौकिक सौंदर्य प्रदान करता है। नर
और नारायण पर्वत के बीच से अलकनंदा नदी गरजती हुई बहती नजर आती है।
मंदिर के सामने सीढ़ियों से नीचे एक तप्त पानी का कुंड है जिसमें स्नान करने के
बाद ही श्रद्धालु मंदिर में पूजा करने जाते हैं।
पुजारियों ने बताया कि चीनी डाकुओं के डर से उनके पूर्वजों ने श्री बद्रीविशाल की मूर्ति को पास के एक कुंड में छिपा दिया था। उसके बाद बहुत खोजने पर भी वह मूर्ति पुजारियों को नहीं मिली।
कहा जाता है कि आदिशंकराचार्य जी लगभग तीन महीने की दुर्गम यात्रा कर अपने अनुयायियों के साथ बद्रीनाथ धाम पहुँचे तो उस समय इसी तप्त कुंड में स्नान करने के बाद जब वे पूजा करने के लिए पहुंचे तो पाया कि पुजारी श्री बद्रीविशाल की मूर्ति की जगह एक शालिग्राम की शिला को पूजते थे। उन्होंने वहाँ के पुजारियों से श्री बद्रीविशाल की मूर्ति के बारे में पूछा तो पुजारियों ने बताया कि चीनी डाकुओं के डर से उनके पूर्वजों ने श्री बद्रीविशाल की मूर्ति को पास के एक कुंड में छिपा दिया था। उसके बाद बहुत खोजने पर भी वह मूर्ति पुजारियों को नहीं मिली।
शंकराचार्य आगे बढ़े और तप्त कुंड में डुबकी लगाई और एक काले रंग के पत्थर की मूर्ति को लेकर बाहर निकले। तभी आकाशवाणी हुई कि कलियुग में इसी मूर्ति की पूजा होगी।
यह सुनकर शंकराचार्य आगे बढ़े और तप्त कुंड में डुबकी लगाई और एक काले रंग के
पत्थर की मूर्ति को लेकर बाहर निकले। तभी आकाशवाणी हुई कि कलियुग में इसी
मूर्ति की पूजा होगी। यह सुनकर शंकराचार्य ने विधिवत् श्री बद्रीनारायण की मूर्ति को
मंदिर में स्थापित कर दिया और अपने साथ गये अनुयायियों में से एक नांबूदरी
ब्राह्मण को भगवान की पूजा का भार सौंप दिया। इस तरह से श्री बद्रीनारायण की
मूर्ति की स्थापना आदिगुरु शंकराचार्य के द्वारा की गई। तब से आज तक दक्षिण
भारत के नंबूदरी ब्राह्मण ही इस मंदिर के मुख्य पुजारी होते हैं।
श्री बद्रीनारायण मंदिर के तीन भाग हैं, सिंह द्वार, सभा मंडप तथा गर्भगृह । मंदिर के
मुख्य द्वार को सिंह द्वार कहते हैं । सिंह द्वार तक सीढ़ी चढ़कर पहुंचा जाता है।
उसके बाद हम सभा मंडप में पहुंचते हैं। गर्भ गृह प्राचीन स्थिति में है, यहीं पर श्री
बद्रीविशाल की मूर्ति स्थापित है। मंदिर की परिक्रमा में अनेक देवी-देवताओं के छोटे-
छोटे मंदिर हैं।
हर साल दीपावली के दिन बद्रीनाथ मंदिर के कपाट को विधिवत ढंग से बंद कर अक्षय तृतीया के दिन खोला जाता है।
बद्रीनाथ धाम में नवंबर माह से बर्फबारी शुरू हो जाती है और अप्रैल मध्य तक होती है।
इसी वजह से हर साल दीपावली के दिन बद्रीनाथ मंदिर के कपाट को विधिवत ढंग से
बंद कर अक्षय तृतीया के दिन खोला जाता है। जोशीमठ से आगे बढ़ते ही अगर
मौसम साफ हो तो भव्य हिमालय के दर्शन होते हैं। सामने नंदा देवी पर्वतमाला
दिखती है। इसकी सुंदरता का बखान शब्दों में नहीं किया जा सकता। जोशीमठ से
बद्रीनाथ की दूर 44 किलोमीटर है तथा खतरनाक रास्ता होने की वजह से यहाँ वन
वे ट्रैफिक व्यवस्था है।
इस विश्व विख्यात गुरुद्वारे के कपाट प्रथम जून से तीर्थयात्रियों के लिए खुलते हैं। चमोली जिले में 15 हजार फुट से भी ऊंचाई पर स्थित इस स्थान पर शीतकाल में बर्फबारी से ढंके रहने के कारण जाने की अनुमति नहीं रहती है।
जोशीमठ से सड़क बलखाती हुई हजारों फुट नीचे उतरकर पांडुकेश्वर पहुँचती है।
पांडुकेश्वर से एक रास्ता फूलों की घाटी और विश्व प्रसिद्ध सिख तीर्थ स्थल हेमकुंड
साहिब की ओर जाता है। इस विश्व विख्यात गुरुद्वारे के कपाट प्रथम जून से
तीर्थयात्रियों के लिए खुलते हैं। चमोली जिले में 15 हजार फुट से भी ऊंचाई पर
स्थित इस स्थान पर शीतकाल में बर्फबारी से ढंके रहने के कारण जाने की अनुमति
नहीं रहती है। बद्रीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर गोविंदघाट से करीब 21 किलोमीटर की
खड़ी चढ़ाई चढ़ने के बाद घांघरिया से हेमकुंड साहिब तक करीब छह किलोमीटर के
बीच कई जगहों पर बर्फ को काटकर रास्ता बनाया गया है।
पांडुकेश्वर से ऊँची चढ़ाई शुरू होती है और धीरे-धीरे चढ़ते हुए हम बद्रीनाथ धाम
पहुंचते हैं। यहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य पर नजर दौड़ाते हुए कहा जा सकता है कि
विधाता ने इसे पूरे मनोयोग और धैर्य से बनाया होगा। एक तरफ नीले आसमान को
छूता हुआ नीलकंठ पर्वत, सामने नारायण पर्वत तथा अलकनंदा नदी की स्वच्छ धारा
और इन सबके बीच नर पर्वत पर श्री बद्रीविशाल के भव्य मंदिर की शोभा देखते ही
बनती है।
प्राचीन काल में बहुत कम लोग चारधाम की यात्रा का साहस किया करते थे लेकिन इधर यातायात के बढ़ते साधनों और धन के बढ़ते फैलाव के कारण बद्रीधाम जाने वालों की संख्या में तेजी से वृद्धि के कारण यहां होटल, मोटल, प्रदूषण बढ़ रहा है।
प्लास्टिक का बढ़ता प्रयोग, चहुंओर बिखरा कचरा यहां के वातावरण को प्रभावित कर रहा है। वैसे यहाँ के लिए उपयुक्त समय मई- जून का महीना है। इस समय यहां कम ठंड पड़ती है। जुलाई अगस्त में भारी बारिश होती है तथा भूस्खलन का खतरा बना रहता है और कई-कई दिन रास्ता बंद भी हो जाता है। सितम्बर, अक्टूबर और नवम्बर में दीपावली तक बारिश कम होती है तथा आकाश साफ रहता है लेकिन ठंड बहुत ज्यादा होती है।
विनोद बब्बर(उर्वशी)